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असहमति पर चुप्पी नहीं और सहमति का विरोध नहीं

आज इस देश में जो कुछ चल रहा है, उसके प्रति बहुत-से लोगों की असहमति होते हुए भी उनकी असहमति प्रायः चुप्पी के भीतर दबी रहती है। लगता है कि अनेक लोगों ने अपने विवेक से असहमति तो की है, पर उसे व्यक्त करने का साहस खो दिया है। उनके भीतर प्रश्न हैं, संशय हैं, पीड़ा है और असंतोष भी है, किंतु बाहर एक सुविधाजनक मौन दिखाई देता है। यह मौन केवल शब्दों का अभाव नहीं होता; कई बार यह उस भय, स्वार्थ, दबाव या सुविधा का परिणाम होता है, जिसके सामने व्यक्ति अपनी आत्मा की आवाज को भी अनसुना कर देता है . असहमति के बावजूद जब मनुष्य अपनी आत्मा को मौन के हवाले कर देता है, तब वह बाहर से भले ही किसी व्यवस्था, विचार या परिस्थिति के साथ खड़ा दिखाई दे, पर भीतर उसका विवेक उससे प्रश्न करता रहता है। आत्मा का समर्पण केवल किसी के पक्ष में बोलने से नहीं होता; कई बार गलत के सामने न बोलना भी धीरे-धीरे उसी समर्पण का रूप ले लेता है। इसलिए असहमति का वास्तविक अर्थ केवल मन में असहमत होना नहीं, बल्कि समय आने पर अपने विवेक के पक्ष में खड़े होने का नैतिक साहस रखना भी है। लेकिन असहमति पर चुप्पी से भी अधिक खतरनाक है अंधभक्ति और अंध-सहमति। असहमति में कम-से-कम विवेक जीवित रहता है, भले ही वह भय या सुविधा के कारण मौन हो; किंतु अंधभक्ति में विवेक स्वयं ही समर्पित कर दिया जाता है। अंध-सहमति व्यक्ति से सोचने, प्रश्न करने और सत्य को सत्य कहने की शक्ति छीन लेती है। जब किसी व्यक्ति, विचारधारा या सत्ता को सही-गलत की कसौटी से ऊपर रख दिया जाता है, तब वहाँ सहमति नहीं रहती, बल्कि चेतना का आत्मसमर्पण आरंभ हो जाता है। इसी कारण अंधभक्ति और अंध-सहमति, असहमति पर छाई चुप्पी से भी अधिक खतरनाक हो सकती हैं। असहमति और सहमति केवल “हाँ” और “ना” के शब्द नहीं हैं; वे मनुष्य की चेतना, विवेक और विचार की दो स्वाभाविक अवस्थाएँ हैं।

असहमति का अर्थ है—किसी विचार, निर्णय, कार्य या मत को अपने विवेक की कसौटी पर उचित न पाकर उसके प्रति अलग मत रखना। असहमति का अर्थ व्यक्ति से घृणा करना या शत्रुता रखना नहीं है। किसी व्यक्ति के विचार से असहमत होते हुए भी उसके व्यक्तित्व और सम्मान का आदर किया जा सकता है।सहमति का अर्थ है—किसी विचार, निर्णय या कार्य को अपने विवेक और अनुभव के आधार पर उचित मानकर उसे स्वीकार करना। सहमति का अर्थ अंध-समर्पण या बिना सोचे-समझे किसी के साथ चलना नहीं है। असहमति और सहमति सक्रिय होती हैं। असहमति मनसा, वाचा, कर्मणा होती है और सहमति भी मनसा, वाचा, कर्मणा होती है।दार्शनिक दृष्टि से कहें तो असहमति विवेक की स्वतंत्रता है और सहमति सत्य के प्रति स्वीकार्यता। असहमति वहाँ आवश्यक है जहाँ हमें असत्य, अन्याय या अनुचित दिखाई दे; और सहमति वहाँ आवश्यक है जहाँ हमें सत्य, न्याय और लोकहित दिखाई दे।

इसलिए स्वस्थ समाज के लिए दोनों आवश्यक हैं—असहमति मनुष्य को प्रश्न करने का साहस देती है और सहमति मनुष्य को सत्य स्वीकार करने की उदारता।किसी भी व्यक्ति को असहमति पर चुप नहीं रहना चाहिए और सहमति का विरोध भी नहीं करना चाहिए।

किसी व्यक्ति के लिए असहमति केवल किसी विचार का प्रतिवाद नहीं है, बल्कि सत्य की खोज का वह साहस है, जो मौन की सुविधा को अस्वीकार करता है। जहाँ उसे अन्याय, असत्य या विवेक के विरुद्ध कोई बात दिखाई देती है, वहाँ चुप रह जाना उसके अपने अंतःकरण से विश्वासघात जैसा है।

लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि कोई व्यक्ति केवल विरोध के लिए विरोध करे। जहाँ सहमति में सत्य है, जहाँ किसी विचार में समाज का हित है, जहाँ किसी व्यक्ति के कार्य में सद्भावना और न्याय है, वहाँ उसका विरोध करना भी उसके स्वभाव के विरुद्ध है। कोई व्यक्ति अपनी असहमति को अहंकार नहीं बनने देना चाहता और अपनी सहमति को आत्मसमर्पण नहीं बनने देना चाहता। मनुष्य का वास्तविक चरित्र शायद इसी संतुलन में प्रकट होता है—असहमति के समय बोलने का साहस और सहमति के समय स्वीकार करने की उदारता। असहमति का अर्थ संबंधों को तोड़ देना नहीं होता और सहमति का अर्थ अपनी चेतना को किसी के चरणों में रख देना भी नहीं होता। विचारों का मतभेद मनुष्यों के बीच हो सकता है, किंतु मनुष्यता का संबंध बना रहना चाहिए। कोई व्यक्ति किसी से असहमत होकर भी उसके सम्मान का अधिकार स्वीकार कर सकता है, क्योंकि विचार बदल सकते हैं, पर मनुष्य की गरिमा किसी विचार से छोटी नहीं होती।किसी व्यक्ति के लिए सबसे कठिन स्थिति तब होती है, जब कोई प्रिय व्यक्ति या अपना पक्ष ऐसी बात कहे, जिससे उसका विवेक सहमत न हो। उस समय चुप रहना सरल हो सकता है, क्योंकि मौन संबंधों को तत्काल बचा लेता है; परंतु भीतर का मन उस चुप्पी को लंबे समय तक स्वीकार नहीं कर पाता। संबंधों को बचाने के लिए सत्य को छोड़ देना अंततः न संबंधों को बचाता है और न आत्मा की शांति को।इसी प्रकार, जब कोई व्यक्ति या विचारधारा, जिससे किसी व्यक्ति की अनेक असहमतियाँ रही हों, कोई सही बात कहती है, तब केवल पुरानी असहमतियों के कारण उसका विरोध करना भी उचित नहीं लगता। सत्य का कोई स्थायी दल नहीं होता। वह जहाँ होता है, उसे वहीं स्वीकार किया जाना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति केवल अपने और पराए के आधार पर विचारों को सही या गलत मानने लगे, तो फिर वह सत्य का नहीं, अपने पूर्वाग्रहों का अनुयायी बन जाता है।आज देश के बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक और साहित्यकार वर्तमान विषम परिस्थितियों के प्रति अपनी असहमति पर चुप्पी साधे बैठे हैं। यदि किसी की ज़बान और कलम असहमति व्यक्त करने के लिए तनिक भी सक्रिय होती है, तो उन विचारों के जनक, जिन्होंने इस देश में ये हालात पैदा किए हैं और जो लोगों की असहमति के लिए उत्तरदायी होते हैं, कुछ ऐसे शब्दों से उनका गला पकड़ लेते हैं—जैसे “शहरी नक्सली”, “दिमागी नक्सली” और “टुकड़े-टुकड़े गैंग”।

इसका परिणाम यह होता है कि इन बुद्धिजीवियों का मन, मस्तिष्क और ज़बान निष्क्रिय हो जाते हैं। अब उन्हें आँखों से अंधा, कानों से बहरा और लिखने वाले हाथों से विकलांग कहें, तो शायद गलत नहीं होगा। गलत विचारधारा के प्रति असहमति व्यक्त करने का भी साहस होना चाहिए।

मनुष्य को अपनी बात कहने का अधिकार है, पर उससे भी बड़ा दायित्व यह है कि वह अपनी बात कहने से पहले अपने अंतःकरण की आवाज सुने। कभी-कभी किसी व्यक्ति का क्रोध असहमति का रूप ले लेता है और कभी उसका मोह सहमति का। इसलिए हर सहमति और असहमति के पीछे यह प्रश्न होना चाहिए कि कोई व्यक्ति वास्तव में सत्य के साथ खड़ा है या केवल अपने अहंकार के साथ।

अंततः कोई भी व्यक्ति यही चाहता है कि उसकी असहमति किसी के प्रति घृणा न बने और उसकी सहमति किसी के प्रति अंध-समर्पण न बने। जहाँ कोई व्यक्ति गलत देखे, वहाँ वह कह सके कि यह गलत है; और जहाँ सही देखे, वहाँ वह उतनी ही स्पष्टता से स्वीकार कर सके कि यह सही है। शायद अपने विवेक के प्रति ईमानदार रहने का अर्थ भी यही है।

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