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2024 के लोकसभा चुनाव भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कई मायनों में आश्चर्यजनक परिणाम देने वाले चुनाव साबित हुए। भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव के दौरान 400 पार का नारा दिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को लगातार तीसरी बार भारी बहुमत मिलने की उम्मीद जताई जा रही थी, लेकिन चुनाव परिणामों ने सत्ता पक्ष के तमाम राजनीतिक अनुमानों को बदल दिया। भाजपा 543 सदस्यीय लोकसभा में 240 सीटों पर सिमट गई। इसमें सूरत लोकसभा सीट पर निर्विरोध निर्वाचित उम्मीदवार भी शामिल है। वहां कांग्रेस प्रत्याशी का नामांकन रद्द होने और अन्य उम्मीदवारों के नाम वापस लेने के बाद भाजपा उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हुआ था।
भाजपा को 2024 के लोकसभा चुनाव में 36.56 प्रतिशत मत मिले, जबकि दूसरी सबसे बड़ी पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 21.19 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। उसने 99 सीटों पर विजय हासिल की। दोनों दलों के मत प्रतिशत में लगभग 15.37 प्रतिशत का अंतर था. लेकिन सीटों के मामले में भाजपा कांग्रेस से 141 सीट आगे रही। यह अंतर भारतीय चुनाव प्रणाली और विपक्ष की राजनीतिक स्थिति को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
क्षेत्रीय दलों ने दिखाई ताकत
लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने 37 सीटें जीतकर भाजपा और कांग्रेस के बाद तीसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। तृणमूल कांग्रेस को 29, डीएमके को 22, तेलुगु देशम पार्टी को 16 और जनता दल यूनाइटेड को 12 सीटें मिलीं। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने नौ और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) ने आठ सीटों पर जीत हासिल की। इसके अलावा शिवसेना, लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), वाईएसआर कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल, माकपा, आम आदमी पार्टी, झारखंड मुक्ति मोर्चा सहित अनेक दलों को भी प्रतिनिधित्व मिला। सात निर्दलीय उम्मीदवार भी संसद पहुंचने में सफल रहे। इस प्रकार लोकसभा में भाजपा और कांग्रेस के अलावा क्षेत्रीय एवं अन्य राजनीतिक दलों की महत्वपूर्ण उपस्थिति है। यह आंकड़ा स्पष्ट करता है कि भारतीय मतदाता केवल दो राष्ट्रीय राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं है। राज्यों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मुद्दे भी राष्ट्रीय सरकार के गठन में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
कांग्रेस की चुनौती अब भी बरकरार
2024 के चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश यह था, कांग्रेस का संगठन कमजोर होने और अनेक राज्यों में राजनीतिक जमीन खोने के बावजूद उसकी राष्ट्रीय उपस्थिति समाप्त नहीं हुई है। कांग्रेस को 21.19 प्रतिशत मत मिले, जो भाजपा के बाद सबसे अधिक थे। देश के अलग-अलग राज्यों में कांग्रेस का राजनीतिक आधार आज भी मौजूद है। कई राज्यों में वह क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन करके भाजपा को चुनौती देने की स्थिति में है।
राहुल गांधी ने संगठन को मजबूत बनाया
2024 के लोकसभा चुनाव के पश्चात राहुल गांधी ने इस कमजोरी को समझा और उन्होंने कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक पैदल यात्रा की। जनता के बीच जाकर वह मिले। इसके बाद से कांग्रेस लगातार मजबूत होती चली जा रही है। कांग्रेस का जनाधार सारे देश में एक बार फिर बढ़ता हुआ नजर आ रहा है। क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के बीच में भी कांग्रेस और राहुल गांधी की स्वीकार्यता पहले की तुलना में 2026 तक आते-आते बढ़ गई है। इंडिया गठबंधन में शामिल राजनीतिक दल अब भारतीय जनता पार्टी और एनडीए को कड़ी चुनौती देते हुए दिख रहे हैं। इसमें सबसे बड़ी भूमिका चुनाव आयोग की भी देखने को मिल रही है। 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए जाने के बाद भाजपा के विरोध में और कांग्रेस के पक्ष में नागरिकों का एक बड़ा समूह खड़ा होता चला जा रहा है। युवाओं के बीच में भी राहुल गांधी की लोकप्रियता काफी बढ़ गई है। राहुल गांधी की आक्रामकता को देखते हुए आम जनता को लगता है कि वह उनकी लड़ाई को लड़ सकते हैं। पिछले कुछ महीनों में राहुल गांधी और कांग्रेस की लोकप्रियता में जबरदस्त इजाफा हुआ है। इसने सबसे ज्यादा चिंतित भाजपा को किया है।
भाजपा के लिए राहुल चुनौती
भाजपा पिछले कई वर्षों से कांग्रेस और राहुल गांधी को अपनी राजनीतिक रणनीति के केंद्र में रखती आई है। भाजपा के रणनीतिकारों ने यह मान लिया था, राहुल गांधी के रहते हुए कांग्रेस उनके मुकाबले में कभी खड़ी नहीं हो पाएगी। राहुल गांधी को पप्पू बनाने की एक मुहिम चलाई गई थी। भारतीय राजनीति में राहुल गांधी को पहले कोई गंभीरता से नहीं ले रहा था। इसका एक कारण यह भी था, कांग्रेस की सत्ता अधिकांश राज्यों से जा चुकी थी। 2024 के लोकसभा चुनाव परिणाम ने यह बता दिया, कांग्रेस को किसी एक राज्य या क्षेत्र की पार्टी नहीं माना जा सकता है। उसकी राजनीतिक पहचान देशव्यापी है। क्षेत्रीय दल अपने-अपने राज्यों में प्रभावशाली हो सकते हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को चुनौती देने की क्षमता कांग्रेस के पास है। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सोच कांग्रेस के पास है। जिसके कारण कांग्रेस की भूमिका आज भी महत्वपूर्ण बनी हुई है।
औद्योगिक घरानों का राजनीतिक प्रभाव
भारतीय राजनीति में औद्योगिक समूहों और बड़े कारोबारी संस्थानों की भूमिका लगातार चर्चा का विषय रही है। राजनीतिक दलों को चुनाव लड़ने, संगठन चलाने और प्रचार अभियान संचालित करने के लिए भारी आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती है। इस परिस्थिति में बड़े उद्योगपतियों और कारोबारी समूहों से मिलने वाला राजनीतिक चंदा महत्वपूर्ण हो जाता है। कांग्रेस और भाजपा जैसे बड़े दलों के अलावा क्षेत्रीय दलों की आर्थिक निर्भरता भी राजनीतिक बहस का विषय है। उद्योग जगत के साथ राजनीतिक संबंधों का प्रभाव नीतियों, सरकारी ठेकों, संसाधनों के आवंटन और आर्थिक फैसलों में दिखाई देता है। प्रत्येक क्षेत्रीय दल को औद्योगिक घरानों के चंदे, सरकार के साथ उनके कारोबारी हितों के कारण राजनीति में औद्योगिक घरानों का बड़ा असर है। इसके साथ ही बड़े औद्योगिक समूह लोकसभा और राज्यसभा में अपने प्रतिनिधि भेजने के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रणनीति का उपयोग करते हैं। कहा जाता है, दोनों सदनो में औद्योगिक समूह के लगभग 50 ऐसे सांसद हैं जो औद्योगिक समूह से जुड़े हुए हैं। भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की आर्थिक स्वतंत्रता और चुनावी चंदे की पारदर्शिता अत्यंत आवश्यक है। आर्थिक रूप से शक्तिशाली औद्योगिक एवं कारोबारी समूह राजनीतिक निर्णयों को प्रभावित करने लगें, तो आम नागरिक, किसान, मजदूर और छोटे कारोबारियों के हित पीछे छूट सकते हैं। भारत में पिछले एक दशक में जिस तरह से कारपोरेट जगत के पक्ष में निर्णय लिए जा रहे हैं, उसको लेकर अब भारत में बड़ी कंपनियों के खिलाफ विरोध बढ़ रहा है। पूंजीवाद के खिलाफ एक नया माहौल भारत में भी बनने लगा है। पिछले कुछ महीनों से देश के सभी राज्यों में जो प्रदर्शन हो रहे हैं, वह इसका बड़ा संकेत है।
दुनिया में पूंजीवाद के विरुद्ध बदलता माहौल
1990 के दशक के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था में उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण का प्रभाव तेजी से बढ़ा। सोवियत संघ के विघटन और वैश्विक व्यापार विस्तार के बाद पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को दुनिया में अधिक स्वीकार्यता मिली। इसका असर समाजवादी और कम्युनिस्ट आंदोलनों पर भी पड़ा। अनेक देशों में वामपंथी राजनीतिक दल कमजोर हुए। निजी पूंजी तथा बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का बड़ी तेजी के साथ विस्तार हुआ। अब वैश्विक परिस्थितियों में फिर बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य की बढ़ती लागत, आर्थिक असमानता तथा संपत्ति का बड़ा हिस्सा, बड़े कारोबारी समूहों के पास पहुंच रहा है। मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग की आय वही सीमित है। महंगाई और कर्ज के कारण उनका जीना काफी मुश्किल हो गया है। पिछले एक दशक में भारत जैसे देश में शुल्क और टैक्स की एक नई बाढ़ आ गई है, जिसने आम आदमियों का जीना दूभर कर दिया है। जो आम लोगों की चिंता बढ़ा रहा है। अमेरिका और यूरोप सहित अनेक देशों में भी आर्थिक असमानता और कॉरपोरेट प्रभाव के विरुद्ध राजनीतिक आवाजें तेजी के साथ उठ रही हैं। जिसका असर अब भारत की राजनीति में भी देखने को मिल रहा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि दुनिया में पूंजीवाद समाप्त होने जा रहा है, या कम्युनिस्ट अथवा समाजवादी व्यवस्था फिर स्थापित होने जा रही है। बल्कि यह संकेत, बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के साथ सामाजिक सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, सस्ती शिक्षा और रोजगार की मांग फिर राजनीतिक विमर्श की प्राथमिकता में आ गई है। समाजवादी और सामाजिक लोकतांत्रिक विचारधाराओं को इसी कारण नया राजनीतिक अवसर मिल रहा है।
भारतीय राजनीति में परिवर्तन के संकेत?
भारत में बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की आय, आम आदमी पर कर्ज, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे राजनीतिक बहस में सर्वाेच्च प्राथमिकता में हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिलना, विपक्षी गठबंधन का बेहतर प्रदर्शन, सरकार के तमाम प्रयासों के बाद भी इंडिया गठबंधन का पहले की तुलना में अधिक मजबूत होना, बदलते राजनीतिक माहौल का बड़ा संकेत है। इस लड़ाई में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है, 2024 की लोकसभा चुनाव में भाजपा को 36.56 प्रतिशत मत मिले, जबकि कांग्रेस को 21.19 प्रतिशत। शेष मत अनेक राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों में विभाजित हुए। इसका मतलब है, देश का एक बड़ा मतदाता वर्ग भाजपा और कांग्रेस के अलावा अन्य राजनीतिक विकल्पों को भी समर्थन दे रहा है। मतदान भी केवल 64 फ़ीसदी हुआ था। 36 फ़ीसदी मतदाता मतदान केंद्र तक नहीं पहुंचे थे। निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार 2024 में लगभग 97.98 करोड़ मतदाता पंजीकृत थे। 64.64 करोड़ मतदाताओं ने मतदान किया। कुल मतदान लगभग 66.10 प्रतिशत रहा। नोटा को 0.99 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। 2024 का लोकसभा चुनाव वर्तमान राजनीति के लिए एक आईना है।
भाजपा के सामने बड़ी चुनौती
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा आज भी देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है। उसके पास मजबूत संगठन, व्यापक चुनावी नेटवर्क और संसाधन हैं। इसके बावजूद 2024 के चुनाव ने यह स्पष्ट कर दिया है। लोकप्रिय नेतृत्व और चुनावी प्रचार के आधार पर हर बार पूर्ण बहुमत हासिल करना आसान नहीं है। 2014 के पहले भाजपा ने जो वायदे किए थे, जो सपने दिखाए थे, वह पूरे नहीं होने से अब भारतीय जनता पार्टी की विश्वसनीयता और मतदाताओं को जो आशा थी, वह अब निराशा एवं अविश्वसनियता में बदल गई है, जिसके कारण मतदाताओं के बीच भाजपा को कड़ी चुनौती मिल रही है।
कांग्रेस के सामने अपने संगठन को मजबूत करने, राज्यों में नेतृत्व तैयार करने और जनता के आर्थिक एवं सामाजिक सवालों को प्रभावी ढंग से उठाने की चुनौती है। क्षेत्रीय दलों की भूमिका आज भी केंद्र की राजनीति में महत्वपूर्ण है। पिछले 12 वर्षों में क्षेत्रीय दल पहले की तुलना में काफी कमजोर हुए हैं, लेकिन उनकी उपस्थिति को नकारा नहीं जा सकता है। भारतीय लोकतंत्र का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा। निष्पक्ष चुनाव को लेकर चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर जो स्थिति बनी है, लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक संस्थाओं में सरकार का दखल बढ़ा है। सरकार और संवैधानिक संस्थाओं में एक ही विचारधारा के लोगों की नियुक्ति, सरकार की नीतियों में उद्योगपतियों और आर्थिक रूप से शक्तिशाली वर्गों की प्रमुखता, संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक अधिकार को लेकर आम नागरिकों की उपेक्षा के कारण भारतीय राजनीति की दिशा और दशा तेजी के साथ बदल रही है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच यही सबसे बड़ी चुनौती है।
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