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भारत पर आंतकी हमला होने पर क्या करेगा रियाद

भारत के लिए क्या हैं मायने?

नई दिल्ली। पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने 7 अगस्त को हुए मक्का रक्षा समझौते को अब संस्थागत रूप दे दिया है। 31 अगस्त को तुर्की के इस्तांबुल में तीनों देशों के रक्षा और विदेश मंत्रियों तथा सैन्य प्रमुखों की महत्वपूर्ण बैठक हुई, जिसमें संयुक्त रक्षा सहयोग को मजबूत करने और सैन्य साझेदारी को आगे बढ़ाने पर सहमति बनी। इस समझौते का मूल सिद्धांत है कि तीनों में से किसी एक देश पर हमला होने को तीनों पर हमला माना जाएगा, जो क्षेत्रीय सुरक्षा परिदृश्य में एक नई धुरी के उदय का संकेत देता है। बैठक में ठोस घोषणाओं से अधिक, भविष्य की रणनीतिक दिशा पर जोर दिया गया।

इस समझौते के तहत सऊदी अरब में एक नया सचिवालय स्थापित होगा, जिसकी शुरुआती तीन साल तक कमान पाकिस्तान के पास रहेगी। सचिवालय के पहले महासचिव भी पाकिस्तान से होगा। इसका उद्देश्य समझौते के प्रभावी क्रियान्वयन, सैन्य सहयोग और तीनों देशों के बीच बेहतर समन्वय के लिए संस्थागत ढांचा प्रदान करना है। इस्तांबुल बैठक में एक राजनीतिक और रक्षा रणनीतिक समिति के गठन पर भी सहमति बनी है, जिसमें तीनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्री तथा सैन्य प्रमुख शामिल होगा। आने वाले समय में मिस्र सहित कई मुस्लिम बहुल देशों को व्यवस्था में शामिल करने की संभावना जाहिर की है, लगभग छह से सात देशों ने इसमें रुचि दिखाई है। ईरान को भी आमंत्रित करने की खबरें हैं, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। विश्लेषकों के मुताबिक, यह समझौता क्षेत्रीय देशों को अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी अधिक उठाने के अमेरिका के आह्वान के अनुरूप हो सकता है।

हालांकि, पश्चिम एशिया में अमेरिका की सैन्य भूमिका तत्काल कम होने के संकेत नहीं हैं, क्योंकि ईरान और इजरायल के साथ उसके अपने रणनीतिक समीकरण हैं। समझौते की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठ रहे हैं। मक्का समझौते के तुरंत बाद सऊदी अरब के अरामको प्रतिष्ठान पर हुए हूती हमले ने इसकी व्यावहारिक क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं। यदि भविष्य में अन्य देश भी इसमें शामिल होते हैं, तब विविध हितों के कारण निर्णय लेने का ढांचा और अधिक जटिल हो सकता है।  भारत के लिए मुख्य चिंता यह है कि भविष्य में भारत-पाकिस्तान के बीच सैन्य टकराव की स्थिति में क्या तुर्की और सऊदी अरब पाकिस्तान के पक्ष में उतरेगा। हालांकि, उपलब्ध संकेतों के आधार पर ऐसी आशंका को फिलहाल बढ़ा-चढ़ाकर देखने की आवश्यकता नहीं है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने तुर्की से मिले हथियारों का इस्तेमाल किया था, लेकिन सऊदी अरब ने तब तटस्थ रुख बनाए रखा था। इसके अलावा, सऊदी अरब की अपनी सुरक्षा चुनौतियां भी बड़ी हैं, जैसे ईरान और हूती गुट की ओर से मिसाइल ड्रोन हमलों का खतरा। यमन संघर्ष में लंबे समय से सक्रिय रहने के बावजूद क्षेत्रीय स्थिरता हासिल नहीं हो सकी है।

इसके बाद रियाद के लिए भारत जैसे महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक साझेदार के साथ अपने संबंधों को जोखिम में डालना आसान नहीं होगा। भारत के सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात दोनों के साथ मजबूत आर्थिक और रणनीतिक रिश्ते हैं। इसलिए, मक्का पैक्ट को सीधे भारत विरोधी सैन्य गठजोड़ मानना फिलहाल उचित नहीं होगा। इसकी असली परीक्षा तब होगी, जब किसी सदस्य देश पर वास्तविक संकट आने और समझौते के तहत सैन्य प्रतिक्रिया की अपेक्षा होने पर होगी। भारत को इस घटनाक्रम पर सावधानीपूर्वक नजर रखनी होगी।

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