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भगवान राम सबके हैं रावण राक्षस था ना कि ब्राह्मण

रावण जन्म से ब्राह्मण था और कर्म से राक्षस (असुर) था। प्रभु श्री राम और लंकापति रावण का युद्ध सत्य और असत्य का एक महाकाव्यीय युद्ध था, जिसका वर्णन वाल्मीकि रामायण में मिलता है। युद्ध से जुड़ी मुख्य बातें कारण रावण द्वारा माता सीता का अपहरण करना। सेना श्री राम की ओर से वानर सेना और सुग्रीव ने युद्ध किया, जबकि रावण की तरफ से राक्षसों की सेना लड़ी। अवधि वाल्मीकि रामायण के अनुसार राम और रावण का युद्ध मुख्य रूप से 84 दिनों तक चला था, जिसमें भगवान राम ने अंततः दसवें दिन रावण का वध किया। वध का रहस्य रावण की नाभि में अमृत था। विभीषण के बताने पर भगवान राम ने नाभि पर ब्रह्मास्त्र/दिव्य बाण चलाकर रावण का अंत किया।  विजजदशमी इसी जीत के उपलक्ष्य में विजय दशमी (दशहरा) का पर्व मनाया जाता है। 


 रावण हिंदू महाकाव्य रामायण का मुख्य प्रतिनायक और लंका का महापराक्रमी राक्षस राजा था। रावण का परिचय और वंश माता-पिता वह ऋषि विश्रवा और राक्षसी कैकसी का पुत्र था। वंशावली वह महर्षि पुलस्त्य (जो ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से एक थे) का पौत्र (पोता) था। कुल जन्म से ब्राह्मण होने के साथ-साथ माता की ओर से उसमें राक्षस (असुर) कुल के गुण भी थे। प्रमुख विशेषताएं और ज्ञान दशानन उसे दस सिरों और बीस भुजाओं वाला माना गया है, जो उसके छह शास्त्रों और चार वेदों के असीम ज्ञान का प्रतीक हैं। विद्वान व संगीतज्ञ वह चारों वेदों का ज्ञाता, महापंडित, आयुर्वेद का मर्मज्ञ और वीणा वादन में अत्यंत निपुण था। उसने प्रसिद्ध शिव तांडव स्तोत्र की रचना की थी। शिव भक्त वह भगवान शिव का परम भक्त था। जीवन और पतन का कारण लंका का आधिपत्य कठोर तपस्या से वरदान प्राप्त कर उसने सोने की लंका का साम्राज्य स्थापित किया। सीता अपहरण उसने भगवान श्री राम की पत्नी माता सीता का अपहरण कर लिया और उन्हें अशोक वाटिका में रखा। अंतरू इसी कारण श्री राम ने वानर सेना की सहायता से लंका पर आक्रमण किया और युद्ध में रावण का वध किया। उसके पतन का मुख्य कारण उसका अत्यधिक अहंकार और अधर्म था, जन्म से क़ोई भी किसी जाति का हो कर्म प्रधान होता है ऐ गीता में भी लिखा है श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 2, श्लोक 47 का यह अत्यंत प्रसिद्ध श्लोक है कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि संस्कृत श्लोक और हिंदी अर्थ श्लोक कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि। भावार्थ भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि मनुष्य को केवल अपना कर्तव्य (कर्म) करने का अधिकार है, उसके परिणामों या फलों पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है। तुम कभी भी अपने कर्मों के फलों के कारण (प्रेरक) मत बनो और न ही कर्म न करने (आलस्य या अकर्मण्यता) में तुम्हारी आसक्ति हो। मुख्य संदेश और शिक्षा कर्म पर ध्यान इंसान के वश में केवल प्रयास और कर्म करना है। परिणाम क्या होगा, यह परिस्थितियों और अन्य कई कारकों पर निर्भर करता है। फल की आसक्ति से मुक्ति यदि व्यक्ति पहले ही फल की चिंता करने लगे, तो उसका मन काम में पूरी तरह से नहीं लगता और तनाव पैदा होता है। अकर्मण्यता का त्यागरू फल न मिलने के डर से या निराशा में आकर कर्म छोड़ देना (अकर्मण्य होना) गलत है। कर्तव्य पथ पर डटे रहना ही कर्मयोग का मूल सिद्धांत है। यह संसार कर्म प्रधान है यहाँ निरन्तर कर्म करते रहना पड़ता है, बिना कर्म किये यहाँ कुछ भी नहीं प्राप्त किया जा सकता है। हर व्यक्ति को अपने अच्छे एवं बुरे कर्म का फल पाना ही होता है। स्वयं भगवान राम को बाली वध की सजा द्वापर युग में जरा नाम के बहेलिए ने उनके पैर पर तीर मारकर किया था। उन्होंने कहा कि नारायण के पैर में तीर मारने के बाद बहेलिए ने अपनी गलती स्वीकार भी किया था। मगर नारायण रूपी भगवान कृष्ण ने बहेलिए से कहा था कि यह उनके पूर्व के कर्मों का फल है। एक बार द्रौपदी ने अपने आंचल से एक महात्मा की लाज को बचाई थी। जिसका फल द्रौपदी को त्रेता युग में महाभारत के चीर हरण कांड के दौरान प्राप्त हुआ। उन्हें बचाने के लिए सीधे नारायण को आना पड़ा था। वही 10 हजार हाथी के बल वाला दुशासन अपनी मंशा में सफल नहीं हो पाया था। कर्म के ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं इतिहास में, जिनसे ये सिद्ध होता है कि कर्म ही श्रेष्ठ है ! जीवन बीतेगा यह, कर्मों के अनुकूल। तज मत अच्छे कर्म तू, होगी भारी भूल।। अच्छे अथवा बुरे कर्मों के द्वारा ही समाज में अपनी पहचान बनायीं जा सकती है बिना कर्म किये इस संसार में किसी को कुछ भी नहीं प्राप्त होता है। अतः दशहरा पर जाति पाती का भेदभाव मिटाना चाहिए क्योंकि भगवान राम तो ऐसे ईश्वर हैं लेकिन जब रावण का वध करने इस धरा पर जन्म लेते हैं तो क्षत्रिय होते हैं लेकिन उनके गुरूजी ब्राह्मण थे भगवान राम के मुख्य रूप से दो गुरु थे ऋषि वशिष्ठ वे अयोध्या के रघुवंश के कुलगुरु थे। उन्होंने भगवान राम और उनके भाइयों को वेदों, उपनिषदों, शास्त्रों और राजधर्म की प्रारंभिक शिक्षा दी। महर्षि विश्वामित्र वे राम को अपने साथ वन में ले गए थे। उन्होंने ही श्रीराम को धनुर्विद्या, शास्त्र विद्या और बला-अतिबला जैसी विशेष विद्याओं के साथ-साथ कई दिव्य अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान दिया था।


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