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20 जुलाई को संसद का मानसून सत्र शुरू हुआ। इसके साथ ही दिल्ली की राजधानी में भयंकर बवाल देखने को मिला। जंतर मंतर पर बैठे आंदोलनकारियों ने 20 जुलाई को संसद तक मार्च करने का आह्वान किया था। सरकार ने पुलिस भेज 18 तारीख को आमरण अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक को धरना स्थल से जवरिया उठवा लिया था। जंतर मंतर से लेकर संसद भवन तक पुलिस ने बड़ी मात्रा में बैरिकेट्स लगाकर कई लेयर की सुरक्षा व्यवस्था कर राजधानी को एक तरह से छावनी बना दिया। सबसे बड़े आश्चर्य की बात यह है, दिल्ली पुलिस द्वारा भारी मात्रा में पत्थर और क्षतिग्रस्त गाड़ियों को संसद मार्ग में रखा गया। इसकी बड़ी तीव्र प्रतिक्रिया हुई। आंदोलनकारियों को लगा सरकार शांतिपूर्ण आंदोलन को बदनाम करने के लिए साजिश रच रही है, इससे युवा और भी भड़क गए। 20 जुलाई को सुबह आंदोलनकारी उनके माता-पिता तथा बड़ी मात्रा में आंदोलन में शामिल होने के लिए जो लोग जंतर मंतर और संसद मार्ग की ओर पहुंच रहे थे, उनको पुलिस ने जगह-जगह पर रोका, कई मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए गए। इसके बाद भी आंदोलन की उग्रता में कोई कमी देखने को नहीं मिली। पुलिस की कार्रवाई को देखते हुए आंदोलनकारी भड़क गए। वह बेरीकेट्स को हटाकर संसद मार्ग की ओर जबरिया बढ़ने लगे। पुलिस को उन्हें रोकने के लिए काफी प्रयास करना पड़ा, इसके बाद भी जब प्रदर्शनकारी रुकने के लिए तैयार नहीं हुए, तो पुलिस ने आंदोलनकारी को गिरफ्तार करने, आंसू गैस के गोले छोड़ने तथा लाठी चार्ज करके आंदोलनकारियों को तितर-बितर करने की कोशिश की। संसद भवन में अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था की गई। इस सबके बावजूद प्रदर्शनकारी रेल भवन तक पहुंच गए। पुलिस आंदोलनकारियों को रोकने में सफल नहीं हो पाई। कई लेयर की सुरक्षा व्यवस्था होने के कारण बार-बार सुरक्षा व्यवस्था को तोड़ना आंदोलनकारियों के लिए एक बड़ी चुनौती था। इस सबके बावजूद भी जिस तरह से वह संसद भवन पहुंचने की कोशिश कर रहे थे। वह उनकी नाराजगी को प्रकट करने के लिए पर्याप्त है।
सरकार बार-बार दावा करती है, उसे 140 करोड़ लोगों का समर्थन प्राप्त है। वह बहुमत की चुनी हुई सरकार है। वह जनता के लिए काम कर रही है। प्रदर्शन स्थल पर आज जिस तरह से पुलिस और प्रशासन की कलई खुली है, उसको लेकर तरह-तरह की चर्चाएं देश भर में होने लगी हैं। पुलिस ने पत्थर क्यों एकत्रित कराए? क्षतिग्रस्त गाड़ियों को क्यों मार्ग पर लाकर खड़ा किया? जिस तरह से सोशल मीडिया में युवा मोबाइल के जरिए पल-पल के वीडियो बनाकर लाइव प्रसारण कर रहे थे। उसने पुलिस प्रशासन की परेशानियों को बढ़ा दिया है। इस प्रदर्शन की उग्रता को देखते हुए पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने की कोशिश की। जिस तरह का गुस्सा युवाओं में देखने को मिल रहा था, जैसे उन्हें अपनी जान की परवाह ना हो। उसके बाद यह कहा जा सकता है की सरकार को आंदोलनकारियों से बात करनी ही होगी। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफा पर युवा अड़े हुए हैं। जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में सरकार को गंभीरता से इस आंदोलन के संबंध में विचार करना होगा। नीट एग्जाम का जो परिणाम अभी आया है, उसमें भी गड़बड़ी होने से युवा गुस्से में है। युवाओं में आक्रोश लंबे समय से दबा हुआ था, वह आक्रोश अब खुलकर सड़कों पर आ गया है। पिछले एक सप्ताह में जंतर मंतर में जो भी लोग पहुंचे, उन्होंने खुलकर अपनी बात कही है। अब हर समस्या पर युवा और जनता बात करने लगी है। जिन लोगों के मन में डर और भय था, वह भी अब मुखर होकर बोल रहे हैं। इससे सरकार और पुलिस प्रशासन की चिंता बढ़ गई है। सरकार को लग रहा था, वह आंदोलन को किसी तरीके से मैनेज कर लेगी। लेकिन यह आंदोलन अब भीड़ तंत्र के पास चला गया है। भीड़ किसी से नियंत्रित नहीं है। न्यायपालिका पर भी अब लोगों को विश्वास नहीं रहा। जंतर मंतर में कहा जा रहा था, सरकार जब-जब संकट में आती है, पुलिस को आगे करती है। अब इसमें एक जुमला और जुड़ गया है। कहा गया है, कि जब-जब सरकार पर संकट आता है, न्यायपालिका मदद के लिए आगे आती है। संसद में विपक्ष ने यह मामला कई बार उठाने की कोशिश की। आसंदी ने बिना बात को सुने बार-बार संसद के सदनों की कार्यवाही स्थगित कर दी। इस मामले में यही कहा जा सकता है, जब तक लोग नियम-कानून को मानते है, तभी तक कानून का राज होता है। भीड़ के ऊपर कोई कानून और नियम प्रभावी नहीं होते है। सरकार बार-बार दम भरती है उसे 140 करोड़ लोगों का समर्थन प्राप्त है। अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी और छात्रों के इस आंदोलन से यह भ्रम टूट गया है। मौन जनता और मुखर होकर बोल रही है। सरकार को गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ जनता की बात सुननी चाहिये।
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