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चुनाव आयोग के साथ न्याय पालिका की साख संकट में ?

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के एक महत्वपूर्ण स्तंभ भारत निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न उठने लगे हैं। चुनाव परिणामों को लेकर राजनीतिक दलों, विशेषकर तृणमूल कांग्रेस, द्वारा घोषित  परिणाम स्वीकार नहीं किये हैं। इस बार का मामला केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहा। आम जनता के बीच भी आयोग की विश्वसनीयता को लेकर पंश्चिम बंगाल में संशय गहरा गया है। पिछले दो वर्षों से चुनाव आयुक्त की कार्य प्रणाली को लेकर कई आरोप सामने आ रहे हैं। उनमें  प्रमुख विवाद “गोपनीयता” का है। चुनाव आयोग पहले सभी राजनैतिक दलों से परामर्श करके, चुनाव की सारी व्यवस्था करता था। मतदाता सूची से लेकर मतदान तक की सभी जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध कराई जाती थी। पिछले कुछ वर्षों में जब चुनाव आयुक्त राजीव कुमार बने।  उसके बाद से चुनाव आयोग की यह व्यवस्थाएं बदल र्गइा जिसके कारण चुनाव आयोग पर संदेह लगातार गहराता जा रहा है।  मतदाता सूची, मतदान प्रतिशत और मतगणना से जुडी जानकारी को सार्वजनिक करने के स्थान पर चुनाव आयोग द्वारा गोपनीयता बरती जा रही है।उसने चुनाव आयोग की  पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगने लगा है। लोकतंत्र में सूचना का अधिकार नागरिकों का मूल अधिकार है। जब चुनाव जैसी संवेदनशील जानकारी को गोपनीयता के दायरे में लाया जा रहा है। उसके बाद संदेह स्वाभाविक रूप से बढ़ता जा रहा है।

इसके साथ ही चुनाव आयोग द्वारा नियमों में बार-बार मनमाने तरीके से बदलाव किया जा रहा है। जिसका अधिकार चुनाव आयोग को न होकर संसद के पास है।तब यह संदेह और भी गहरा जाता है। चुनाव अधिसूचना जारी हो जाने के बाद,  जिस तरह से चुनाव आयोग की मनमानी और पक्षपात शुरू हो जाती है। जहां डबल इंजन की सरकार हैं। उनके लिए अलग नियम जहां केंद्र सरकार से इतर  विपक्षी दलों की सरकारें हैं। वहां पर अधिकारियों की नियुक्तियों एसआईआर को लेकर भी विवाद सामने आए हैं। उसने चुनाव आयोग की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर बड़ा संदेह उत्पन्न कर दिया है। चुनाव आयोग का दायित्व केवल चुनाव कराना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है। हर पक्ष को समान अवसर तथा चुनाव लड़ने वाले सभी राजनैतिक दलों और उनके उम्मीदवारों के साथ बराबरी का निष्पक्षता के साथ व्यवहार हो। पश्चिम बंगाल के चुनाव में लाखों की संख्या में अर्धसैनिक बलों की तैनाती इस बार गंभीर विवाद का विषय बना है। भाजपा शासित राज्यों के अधिकारियों को बड़े पैमाने पर बंगाल की डियुटी में लगाया गया। सुरक्षा की दृष्टि से यह आवश्यक बताया गया। वहीं विपक्षी दलों द्वारा इसे “इच्छित परिणाम” की दिशा में चुनाव आयोग की मिली भगत बताया गया। भाजपा की शिकायतों पर त्वरित रूप से चुनाव आयोग द्वारा कार्रवाई की गई।  विपक्षी दलों द्वारा चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन को लेकर जो शिकायतें की गई।  उनका चुनाव आयोग ने कोई संज्ञान नहीं लिया। इस बात का आरोप टीएमसी से लेकर सभी विपक्षी दलों द्वारा सभी राज्यों में लगाया जा रहा है। महाराष्ट्र, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ इत्यादि के विधानसभा  और लोकसभा 2024 के चुनाव में राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव आयोग पर समय-समय पर गड़बड़ी किए जाने के आरोप भी लगाए गये हैं। चुनाव आयोग ने ना तो इस तरह के आरोपों एवं आपत्ति पर ना कोई सफाई दी ना जांच कराई। विपक्ष को इसका कोई उपयुक्त जवाब नहीं मिला, जिसके कारण अब  चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर आम जनता के मन में  भी शंका होने लगी। क्या कारण है, कि चुनाव आयोग सभी जानकारियों को छिपाना और गोपनीय रखना चाहता है। एसआईआर और चुनाव आयोग द्वारा समय समय पर नियमों में जो बदलाव किये। उसको लेकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने यह मामला हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भी उठाकर न्याय प्राप्त करने की चेष्टा की। सुप्रीम कोर्ट द्वारा  कहा गया, चुनाव आयोग को विशेष अधिकार प्राप्त हैं।  ऐसी स्थिति में वह अभी कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे।  जिसके कारण चुनाव आयोग की  भूमिका का  यह मामला तूल पकड़ता चला जा रहा है।  राजनीतिक दलों से उठकर एसआईआर में लाखों मतदाताओं के नाम कटने से  यह मामला आम जनता को सीधे प्रभावित कर रहा है। चुनाव को लेकर, यदि जनता के मन में यह बैठ जाए, कि चुनाव निष्पक्ष नहीं है। तो इसकी बड़ी तीव्र  प्रतिक्रिया हो सकती है।  लोकतंत्र व्यवस्था के लिए अत्यंत खतरनाक संकेत है। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कानून का मामला सुप्रीम कोर्ट में पिछले दो वर्षों से लंबित है। इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने अभी  सुनवाई शुरु की है। पिछले 10 महीने से चुनाव आयोग के निर्णय और  एसआईआर को लेकर मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही है।  इस मामले में अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं आया है। एसआईआर संवैधानिक है, या नहीं, इसको लेकर संवैधानिक विशेषज्ञों की अलग-अलग राय हैं। इसी बीच विधान सभाओं के भी चुनाव होते जा रहे हैं।  अभी तक एसआईआरे में 5 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से काटे गए हैं। इसका अधिकार चुनाव आयोग के पास नहीं है। इसके बाद भी राजनैतिक दलों और मतदाताओं को  सुप्रीम कोर्ट से न्याय नहीं मिल पा रहा है। उसको लेकर अब आम जनता के बीच में भी तीव्र प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। नागरिकता साबित करने के लिए आम गरीब मतदाताओं को चुनाव आयोग और ट्रिव्यूनल के चक्कर लगाने पड़े।  चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया वर्तमान में  विवादित है। ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग को  निर्णयों की निष्पक्षता पर संदेह होना स्वाभाविक है।

पिछले 75 वर्षों में भारत के चुनाव आयोग ने कई जटिल परिस्थितियों में सफलतापूर्वक चुनाव कराए हैं। चुनाव आयोग की साख अंतरराष्ट्रीय स्तर में सबसे बेहतर थी।  वर्तमान परिस्थितियों मे चुनाव आयोग को अपनी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाना, चुनाव से संबंधित सभी जानकारियों को सार्वजनिक करना, चुनाव प्रक्रिया को स्पष्ट और न्यायसंगत बनाना चुनाव आयोग के साथ-साथ न्यायपालिका के लिए भी जरूरी हो गया है। संसद में चुनाव आयुक्त के खिलाफ यदि महाभियोग प्रस्ताव आ जाता है। यह बहुत गंभीर स्थिति है। यह अलग बात है , दोनों सदनों ने महाभियोग प्रस्ताव को अस्वीकर  कर दिया है। इससे चुनाव आयोग पर  मिलीभगत और सरकार के दबाव में काम करने  के जो आरोप लग रहे है।  वह खत्म नहीं हुए।  बल्कि यह माना जाने लगा , चुनाव आयोग केंद्र सरकार के इशारे पर काम कर रहा है।  उसे सरकार और भाजपा  का संरक्षण प्राप्त है। भारत में संविधान और लोकतंत्र के प्रति आस्था बनाए रखना है। ऐसी स्थिति में चुनाव  आयोग को साख को फिर से मजबूत बनाना होगा। चुनाव आयोग केवल एक संस्था नहीं है। लोकतंत्र की आत्मा का प्रतिनिधित्व और नागरिक अधिकारों की स्वतंत्रता बनाए रखने का काम चुनाव आयोग करता है। उसकी निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं, तो यह एक संस्था का नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए एक बड़ा  संकट बन जाता है।इस मामले में न्यायपालिका की जिम्मेदारी है।  वह संविधान और कानून का पालन कराने में अपनी शक्ति और भूमिका का सही ढंग से पालन करे।  बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल इत्यादि पड़ोसी देशों में  जिस तरह की  प्रतिक्रिया आम जनता की देखने में आई है। समय की मांग है, चुनाव आयोग आयोग चुनौतियों का सामना और जवाबदेही के साथ चुनाव कराये।  जनता का विश्वास, चुनाव आयोग पर बहाल हो। न्यायपालिका को भी अपनी जिम्मेदारी को समझाना होगा। पिछले 10 महीने में न्यायपालिका की जो भूमिका देखने को मिली है। उसके बाद यह घारणा बनने लगी है,  अप्रत्यक्ष समर्थन कहीं ना कहीं न्यायपालिका से भी चुनाव आयोग को मिल रहा है।  यदि यह संदेश गया, तो स्थिति आगे चलकर खतरनाक हो सकती है। समय रहते न्यायपालिका को विवादों को  त्वरित रुप से सुलझाने के लिए आगे आना होगा। तारीख पर तारीख की आम जनता के बीच तीव्र प्रतिक्यिा देखने को मिल रही है। जो न्याय पालिका की साख को कमजोर कर रही है। 

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