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धर्म का व्यापार और राजनीति का घालमेल

आज हमारे देश में धर्म का व्यापार और उसमें राजनीति का तड़का जोर-शोर से चल रहा है। यह गठजोड़ न सिर्फ फल-फूल रहा है, बल्कि समाज की जड़ों को भी कमजोर कर रहा है। वर्तमान दौर में धर्म, राजनीति और नौकरशाही का एक ऐसा ताना-बाना बन चुका है, जिसने आम जनता के विश्वास और देश के संसाधनों को गहरे संकट में डाल दिया है।

धर्म के नाम पर मायाजाल:

आज कोई भी धार्मिक संत, महात्मा, कथावाचक और धर्मगुरु इस विडंबना से अछूता नहीं है। जो बाबा और गुरु अपने सत्संगों और कथाओं में आम जनमानस को मोह-माया का त्याग करने का संदेश देते हैं, वे खुद इस मायाजाल में बुरी तरह फंसे हुए हैं।

विरोधाभास:

त्याग का उपदेश देने वाले इन गुरुओं की अपनी बड़ी महत्वाकांक्षाएं हैं सादगी का पाठ पढ़ाने वाले ये आधुनिक संत आज हजारों करोड़ की संपदा के मालिक बने बैठे हैं।

राजनीति और समाज सेवा का गिरता स्तर

रही बात राजनीतिज्ञों की, तो उनकी स्थिति और भी चिंताजनक है। समाज सेवा के पवित्र नाम पर राजनीति में कदम रखने वाले लोग आज देश और समाज को दोनों हाथों से लूटने में लगे हैं। जनसेवा का मुखौटा पहनकर सत्ता में आने वाले इन नेताओं का मुख्य उद्देश्य अब केवल अपनी तिजोरियां भरना रह गया हैष्।

भ्रष्ट नौकरशाही का साथ 

नेताओं और तथाकथित धर्मगुरुओं के इस खेल में देश की ब्यूरोक्रेसी (नौकरशाही) उनका पूरा साथ दे रही है। प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह से इस भ्रष्टाचार में शामिल हो चुका है। जहां भी दांव लगता है, नौकरशाह अपनी जेबें भरने से नहीं चूकते।

परिणाम:

आज देश का कोई भी बड़ा नौकरशाह, राजनेता या बाबा सिर्फ कुछ करोड़ नहीं, बल्कि हजारों करोड़ की बेहिसाब संपत्ति पर कुंडली मारकर बैठा है।

निष्कर्ष:

धर्म, राजनीति और प्रशासनिक तंत्र का यह त्रिकोण देश के विकास और सामाजिक ताने-बाने के लिए एक गंभीर खतरा बन चुका है। जब तक आम जनता इस छलावे को नहीं समझेगी और नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना नहीं होगी, तब तक समाज को इस दीमक से बचाना नामुमकिन है।

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