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मुंबई । दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ को ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटा दिया है। बताया जा रहा है कि इसे हटाने का फैसला समीक्षा के बाद लिया गया। सूत्रों के मुताबिक अधिकारियों को आशंका थी कि फिल्म के कुछ हिस्सों का भारत विरोधी तत्व दुरुपयोग कर सकते हैं। बताया गया कि फिल्म ने पहले थिएटर रिलीज के लिए आवेदन किया था, लेकिन उसे मंजूरी नहीं मिली। इसके बाद इसे सीधे ओटीटी पर रिलीज किया गया। मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित इस फिल्म का नाम पहले ‘घल्लूघारा’, फिर ‘पंजाब ’95’ और आखिरकार ‘सतलुज’ रखा गया था। सतलुज के ओटीटी पर रिलीज होने और फिर उसे हटाने के बाद मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा सुर्खियों में आ गए हैं।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब के चर्चित मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा का नाम उन लोगों में गिना जाता है, जिन्होंने पंजाब में उग्रवाद के दौर में अवैध हत्याओं और गोपनीय तरीके से अंतिम संस्कार करने के मामलों को उजागर कर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया था, उनकी जांच और बाद में रहस्यमय परिस्थितियों में हुई गुमशुदगी ने भारत के सबसे चर्चित मानवाधिकार मामलों में अपनी जगह बनाई। जसवंत सिंह खालड़ा का जन्म 1952 में पंजाब के अमृतसर जिले के खालड़ा गांव में हुआ था। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक बैंक कर्मचारी के रूप में की थी, लेकिन 1980 के दशक में सामाजिक और मानवाधिकार संबंधी मुद्दों से जुड़ते हुए सक्रिय रूप से इस क्षेत्र में काम करना शुरू कर दिया। पंजाब में उग्रवाद और आतंकवाद के दौर में लगातार सामने आ रही गुमशुदगी की घटनाओं ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक ऑपरेशन ब्लू स्टार, पूर्व पीएम इंदिरा गांधी की हत्या और उसके बाद हुए 1984 के सिख विरोधी दंगों के बाद पंजाब में बड़ी संख्या में ऐसे मामले सामने आए, जिनमें परिवारों ने आरोप लगाया कि उनके परिजनों को पुलिस पूछताछ के लिए ले गई, लेकिन वे कभी वापस नहीं लौटे। इन घटनाओं ने जसवंत सिंह खालड़ा को सच्चाई की तलाश के लिए प्रेरित किया। उन्होंने लापता लोगों से जुड़ी जानकारी एकत्र करनी शुरू की। जांच में उनकी पहुंच अमृतसर नगर निगम के रिकॉर्ड तक हुई, जहां उन्हें ऐसे दस्तावेज मिले जिनमें हजारों लोगों के नाम, उम्र और पते दर्ज थे। आरोप था कि इन लोगों की मौत के बाद पुलिस ने बिना परिजनों को सूचना दिए उनका अंतिम संस्कार कर दिया था। इन दस्तावेजों ने फर्जी मुठभेड़ों और गुप्त अंतिम संस्कारों के आरोपों को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
बताया जाता है कि 1995 में जसवंत सिंह खालड़ा स्वयं रहस्यमय ढंग से लापता हो गए। उन्हें आखिरी बार अपने घर के बाहर कार धोते हुए देखा गया था, जिसके बाद उनका कोई पता नहीं चला। इस घटना ने पूरे देश में सनसनी फैला दी और मामले की जांच की मांग तेज हो गई। 1996 में सीबीआई की जांच में ऐसे साक्ष्य सामने आए, जिनसे संकेत मिला कि खालड़ा को तरनतारन के एक पुलिस थाने में हिरासत में रखा गया था। जांच एजेंसी ने उनके कथित अपहरण और हत्या के मामले में पंजाब पुलिस के 9 अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने की सिफारिश की। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद 16 अक्टूबर 2007 को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मामले में अहम फैसला सुनाया। जस्टिस मेहताब सिंह गिल और जस्टिस एएन जिंदल की पीठ ने चार दोषी पुलिसकर्मियों पूर्व सब-इंस्पेक्टर सतनाम सिंह, सुरिंदर पाल सिंह, जसबीर सिंह और पूर्व हेड कांस्टेबल प्रीतिपाल सिंह की सजा बढ़ाकर आजीवन कारावास कर दी। जसवंत सिंह खालड़ा के परिवार में उनकी पत्नी परमजीत कौर खालड़ा, बेटी नवकीरण कौर और पुत्र जनमीत सिंह हैं। मानवाधिकारों के लिए उनके संघर्ष और उनकी जांच को आज भी पंजाब के इतिहास के सबसे अहम और चर्चित मामलों में गिना जाता है। सतलुज फिल्म ने उनका नाम एक बार फिर से सुर्खियों में ला दिया है।
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