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हिन्दी बचाने की नहीं, उसे जीने की जरूरत है

(हिन्दी दिवस विशेष)

’दृश्य-1’ सुबह के आठ बजे हैं। शहर के एक नामी निजी स्कूल के गेट पर बच्चों की भीड़ है। कंधों पर महंगे बैग, हाथों में पानी की बोतलें और गले में पहचान-पत्र। एक मां अपने बच्चे को स्कूल बस में बैठाते हुए कहती है-“आज से घर पर भी थोड़ा अंग्रेजी में बात करना, बेटा। तुम्हारी इंग्लिश अच्छी होनी चाहिए।”बच्चा सिर हिलाता है। ’दृश्य-2रू’ कुछ ही घंटे बाद उसी स्कूल के सभागार में हिन्दी दिवस का कार्यक्रम है। मंच पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है- “हिन्दी हमारी शान है, हिन्दी हमारी पहचान है।” बच्चे हिन्दी में कविता सुनाते हैं। कोई भाषण देता है, “हिन्दी हमारी मातृभाषा है, हमें इसका सम्मान करना चाहिए।” तालियां बजती हैं। विजेताओं को प्रमाण-पत्र मिलते हैं। शिक्षक बच्चों को हिन्दी के गौरव और उसके समृद्ध साहित्य की बातें बताते हैं। कार्यक्रम समाप्त होता है। बच्चे घर लौट जाते हैं। ’दृश्य-3रू’ अगली सुबह स्कूल फिर वही है अंग्रेजी में पढ़ाई, आपस में अंग्रेजी में संवाद और अंग्रेजी में भविष्य की तैयारी। यह दृश्य किसी एक स्कूल की कहानी नहीं है। यह हमारे समय का एक बड़ा भाषाई विरोधाभास है।

जरा सोचिए, हमारा दृष्टिकोण क्या है...हम हिन्दी से प्रेम भी करते हैं और उससे दूरी भी बनाते हैं। हम हिन्दी पर गर्व भी करते हैं और अपने बच्चों के भविष्य के लिए अंग्रेजी को जरूरी भी मानते हैं। हम हिन्दी दिवस मनाते हैं, लेकिन क्या हिन्दी को रोजमर्रा की जिंदगी में वह जगह देते हैं, जिसकी बात 14 सितंबर को मंच से करते हैं? यही वह सवाल है जिससे इस बार हिन्दी दिवस पर बचना मुश्किल है।

क्योंकि हिन्दी को लेकर सबसे आसान काम है-उसकी प्रशंसा करना। सबसे कठिन काम है-उसकी वास्तविक या कहें धरातल पर स्थिति को स्वीकार करना।

क्या हिन्दी सचुमच खतरे में हैं, तो मैं कहूंगा कि पहली बात तो यह साफ होनी चाहिए। हिन्दी कोई लुप्त होती भाषा नहीं है। करोड़ों लोग इसे बोलते और समझते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 52.8 करोड़ लोगों ने हिन्दी को अपनी मातृभाषा बताया था। हिन्दी का विस्तार भारत की सीमाओं से बाहर भी है। साहित्य, सिनेमा, टेलीविजन, पत्रकारिता और अब डिजिटल दुनिया ने इसकी पहुंच को और व्यापक बनाया है। तो सवाल है फिर समस्या कहां आ रही है, तो एक व्यापक खोच और दृष्टि के बाद यह जवाब मिलता है कि समस्या शायद हिन्दी के बोलने वालों की संख्या में नहीं, बल्कि उन क्षेत्रों में है जहां भाषा अवसर, ज्ञान, और प्रतिष्ठा से जुड़ती है। एक गरीब या निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार का बच्चा हिन्दी में बेहद मेधावी हो सकता है, लेकिन उच्च शिक्षा और रोजगार की दुनिया में अंग्रेजी उसकी राह आसान या कठिन कर सकती है। यही कारण है कि बहुत से माता-पिता अंग्रेजी माध्यम को अपने बच्चे के बेहतर भविष्य से जोड़ते हैं।

यह समझने की बात है कि यह हिन्दी के खिलाफ किसी षड्यंत्र की कहानी नहीं है। वास्तव में यह भाषा और सामाजिक अवसर के बीच संबंध की कहानी है। यही हिन्दी दिवस की सबसे बड़ी बहस होनी चाहिए। यह कोई हिन्दी बनाम अंग्रेजी की लड़ाई नहीं, बल्कि हिन्दी के साथ अवसर की बात है। हिन्दी के सम्मान का अर्थ अंग्रेजी का विरोध करना नहीं हो सकता। आज की दुनिया में अंग्रेजी का ज्ञान शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, रोजगार और वैश्विक संचार के अनेक क्षेत्रों में उपयोगी है। बच्चों को अंग्रेजी से दूर करना समाधान नहीं है, लेकिन दूसरा सवाल उतना ही महत्वपूर्ण है कि क्या अंग्रेजी जानना ही अच्छे अवसर पाने की शर्त होना चाहिए?

अगर कोई बच्चा अपनी बात हिन्दी में बेहतर ढंग से समझ और व्यक्त कर सकता है, तो क्या उसकी प्रतिभा सिर्फ इसलिए कम हो जाती है कि उसकी अंग्रेजी कमजोर है? अगर कोई नागरिक सरकारी योजना, कानून, स्वास्थ्य या शिक्षा से जुड़ी जानकारी अपनी भाषा में समझना चाहता है, तो क्या उसे कठिन भाषा की दीवार पार करनी ही होगी? इसलिए हिन्दी की लड़ाई अंग्रेजी के खिलाफ नहीं, बल्कि भाषा को लेकर असमानता के खिलाफ होनी चाहिए।

’संविधान को पढिए, इतिहास जानिएः’ हिन्दी दिवस पर एक तथ्य बार-बार स्पष्ट किए जाने की जरूरत है कि हिन्दी राजभाषा है। सबको मालूम होना चाहिए कि हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 343 के तहत संघ की राजभाषा है। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में हिन्दी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। 1953 से 14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाने की परंपरा शुरू हुई। इसीलिए इस तारीख को हिन्दी दिवस मनाया जाता है। 

भारत की पहचान एकभाषी नहीं है। हमारी भाषाई विविधता हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक वास्तविकता है। इसलिए हिन्दी का सम्मान दूसरी भारतीय भाषाओं को पीछे धकेलने का माध्यम नहीं होना चाहिए। हिन्दी बड़ी हो, लेकिन दूसरी भाषाओं की कीमत पर नहीं। अतीत पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि एक समय था जब हिन्दी के भविष्य को किताबों, अखबारों और स्कूलों से जोड़ा जाता था। आज कहानी बदल गई है। मोबाइल स्क्रीन पर हिन्दी है। सोशल मीडिया पर हिन्दी है। डिजिटल पत्रकारिता में हिन्दी है। यूट्यूब, पॉडकास्ट और मनोरंजन की दुनिया में हिन्दी की बड़ी उपस्थिति है। आपके स्रोत में भी डिजिटल माध्यमों को हिन्दी के विस्तार का महत्वपूर्ण क्षेत्र बताया गया है, 

लेकिन यहां भी हमें एक असहज सवाल पूछने की ज़रूरत है कि क्या हिन्दी इंटरनेट पर केवल मनोरंजन की भाषा बनेगी या ज्ञान की भी? क्या हिन्दी में उच्च स्तरीय विज्ञान उपलब्ध होगा? क्या चिकित्सा, कानून, अर्थशास्त्र, तकनीक और शोध की विश्वसनीय सामग्री सहजता से मिलेगी? क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में हिन्दी केवल उपभोक्ता की भाषा होगी या तकनीक बनाने की भाषा भी? यहीं हिन्दी का भविष्य तय होगा।

किसी भाषा की शक्ति केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि उसे कितने लोग बोलते हैं। यह भी देखना होगा कि उस भाषा में कितना ज्ञान पैदा होता है, कितना ज्ञान उपलब्ध है और उस ज्ञान तक कितने लोगों की पहुंच है। हिन्दी की एक बड़ी ताकत उसकी लचक है। कबीर से प्रेमचंद तक, लोकगीतों से सिनेमा तक, अखबारों से सोशल मीडिया तक हिन्दी लगातार बदलती रही है। वह दूसरी भारतीय भाषाओं से शब्द लेती है। उर्दू से समृद्ध होती है। अंग्रेजी के शब्दों को भी अपने ढंग से अपना लेती है। लोकभाषाओं से ऊर्जा लेती है। इसलिए हिन्दी को केवल कठिन, संस्कृतनिष्ठ और ‘शुद्ध’ शब्दों की भाषा बनाने की कोशिश उसकी पहुंच सीमित कर सकती है। जीवित भाषा वही है जो समय के साथ बदलती है।

भारतेंदु हरिश्चंद्र ने लिखा था- “निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।” आज इस पंक्ति को दोहराने से अधिक जरूरी है कि हम इसका अर्थ अपने समय में समझें। यदि अपनी भाषा में शिक्षा की गुणवत्ता नहीं होगी, यदि उसमें रोजगार और ज्ञान के अवसर सीमित होंगे, यदि उसमें नई पीढ़ी के सवालों के उत्तर नहीं होंगे, तो केवल गौरव के नारे किसी भाषा को मजबूत नहीं कर सकते। शायद इस बार हिन्दी दिवस पर हिन्दी की तारीफ थोड़ी कम और उससे सवाल थोड़े ज्यादा किए जाएं। क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था बच्चों को उनकी भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण ज्ञान देती है? क्या विश्वविद्यालय हिन्दी में मौलिक शोध को पर्याप्त जगह देते हैं? क्या सरकारी व्यवस्था नागरिक को उसकी समझ की भाषा में जानकारी देती है? क्या डिजिटल दुनिया में हिन्दी में विश्वसनीय ज्ञान उतनी ही तेजी से बढ़ रहा है जितनी तेजी से मनोरंजन की सामग्री?

और सबसे बड़ा सवाल- क्या हिन्दी हमारे लिए सिर्फ पहचान है या अवसर भी?

हिन्दी को बचाने की जरूरत शायद उतनी नहीं है, जितनी उसे जीने, विकसित करने और आधुनिक बनाने की जरूरत है। हमें अंग्रेजी सीखनी चाहिए, लेकिन हिन्दी खोकर नहीं। हमें हिन्दी पर गर्व करना चाहिएकृलेकिन दूसरी भारतीय भाषाओं को कमतर समझकर नहीं। हमें हिन्दी में लिखना चाहिए, लेकिन केवल हिन्दी दिवस पर नहीं। हमें हिन्दी में ज्ञान पैदा करना चाहिए, सिर्फ दूसरी भाषाओं से अनुवाद नहीं। और हमें ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिसमें किसी बच्चे की भाषा उसके सपनों की सीमा न बने। इसलिए बतौर लेखक मैं इस बात को पूरी सजगता से कह रहा हूं कि 14 सितंबर को फिर मंच सजेंगे। फिर भाषण होंगे। फिर कहा जाएगाकृ“हिन्दी हमारी पहचान है।”, लेकिन शायद इस बार मंच से उतरने के बाद एक सवाल घर तक जाना चाहिए। अगर हिन्दी सचमुच हमारी पहचान है, तो क्या हमारी शिक्षा, हमारी तकनीक, हमारा प्रशासन, हमारा ज्ञान और हमारे अवसर भी उस पहचान को जगह देते हैं? क्योंकि भाषा सिर्फ शब्दों का संग्रह नहीं होती। भाषा वह जगह है जहां मनुष्य सोचता है, सवाल करता है, अपने अधिकार समझता है और भविष्य की कल्पना करता है।

 इसलिए हिन्दी दिवस का सबसे सार्थक संकल्प शायद यह नहीं कि हम साल में एक दिन हिन्दी बोलेंगे। संकल्प यह होना चाहिए कि हिन्दी को समारोह की भाषा से आगे बढ़ाकर ज्ञान की भाषा बनाएंगे। भावना की भाषा से आगे बढ़ाकर अवसर की भाषा बनाएंगे। ऐसी हिन्दी बनाएंगे, जो अतीत पर गर्व करे, वर्तमान की सच्चाई को स्वीकार करे और भविष्य से आंख मिलाकर कह सके- “मैं सिर्फ तुम्हारी भाषा नहीं, तुम्हारे ज्ञान, तुम्हारे सवाल और तुम्हारे सपनों की भाषा भी हूं।


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