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इंदिरा गांधी के समय का टाइम कैप्सूल दफन हुआ

दिल्ली। भारत की आजादी के 25 साल पूरे होने के एक साल बाद, 15 अगस्त 1973 को, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लाल किले में अनूठा कार्यक्रम आयोजित किया था। आजादी की 26वीं सालगिरह के मौके पर उन्होंने लाहौरी दरवाजे के पास 32 फीट गहरे गड्ढे में तांबे और स्टील से बना काल पत्र नामक एक वैक्यूम-सील्ड टाइम कैप्सूल दफनाया। इसका उद्देश्य एक हजार साल बाद की पीढ़ी को आजाद भारत के पहले 25 वर्षों का इतिहास बताना था। उस समय इस पूरे प्रोजेक्ट पर 8 हजार रुपए खर्च हुए थे।

इसकी तैयारी की जिम्मेदारी इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च (आईसीएचआर) को मिली, जिसने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज के इतिहास प्रोफेसर एस. कृष्णस्वामी से दस्तावेज तैयार करवाए। हालांकि, जब इन दस्तावेजों का मसौदा जाने-माने इतिहासकार और तमिलनाडु के आर्काइव्स कमिश्नर टी. बद्रीनाथ तक पहुंचा, तब उन्होंने इस ऐतिहासिक तथ्यों को गलत ढंग से पेश करने वाला और कांग्रेस व इंदिरा गांधी की वाहवाही करने वाला बताया। उन्होंने सार्वजनिक तौर पर सवाल उठाए कि क्या वास्तव में अकाल का खतरा खत्म हो गया है और भूमि सुधारों से कृषि क्रांति पूरी हो चुकी है, जैसा कि दस्तावेजों में दावा हुआ था। इस पर देश में तीखी प्रतिक्रिया हुई और आरोप लगे कि यह एक राजनीतिक प्रचार का साधन है। खुद इंदिरा को कहना पड़ा कि उन्हें कैप्सूल की सामग्री की जानकारी नहीं है। सीपीआई(एम) के पोलित ब्यूरो सदस्य पी. राममूर्ति ने दस्तावेजों के ड्राफ्ट को सार्वजनिक इस भारत का इतिहास नहीं, बल्कि सत्ता में मौजूद कांग्रेस पार्टी की तथाकथित उपलब्धियों की जानकारी देने वाली कांग्रेस के महासचिव की रिपोर्ट करार दिया था। 1975-77 की इमरजेंसी के बाद देश का सियासी माहौल बदल गया। 1977 में इंदिरा गांधी की सरकार गिर गई और उनके धुर विरोधी मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी। जनता पार्टी ने अपने चुनावी वादे के तहत टाइम कैप्सूल को निकलवाने और उसकी सच्चाई जनता के सामने लाने की बात कही थी।

नवंबर 1977 के आखिर में इसकी जांच के लिए जनता पार्टी के सांसद यज्ञदत्त शर्मा की अध्यक्षता में एक संसदीय समिति बनाई। शर्मा ने सच्चाई उजागर करने और इतिहास से लीपापोती को रोकने की जरूरत पर जोर दिया। आखिरकार, दिसंबर 1977 में कड़ी सुरक्षा के बीच टाइम कैप्सूल की खुदाई शुरू हुई और 8 दिसंबर 1977 को बाहर निकाला गया। इस निकालने में 58,000 रुपए खर्च हुए, यानी दफनाने की लागत से करीब सात गुना ज्यादा।

हालांकि, कैप्सूल के भीतर क्या था, यह रहस्य आज भी बरकरार है। रिपोर्ट्स के अनुसार, देसाई और उनके कुछ मंत्रियों ने दस्तावेज देखे थे, और समिति के अध्यक्ष शर्मा ने इन्हें 20 दिसंबर 1977 को संसद में पेश करने की घोषणा भी की थी। लेकिन वे दस्तावेज अंततः संसद की लाइब्रेरी में रख दिए गए और उनकी सामग्री कभी सार्वजनिक तौर पर जनता के सामने नहीं आई। यह प्रकरण भारतीय राजनीति और इतिहास में एक विवादास्पद और अनसुलझी पहेली बनकर रह गया है।

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