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जवाबदेही के नए दौर में डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म

भारत तीव्र गति से डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। मनोरंजन, शिक्षा, व्यापार, पत्रकारिता और संचार का बड़ा हिस्सा अब ऑनलाइन माध्यमों पर निर्भर है। तकनीकी विकास ने रचनात्मक उद्योगों के लिए अभूतपूर्व अवसर पैदा किए हैं, वहीं डिजिटल पायरेसी जैसी चुनौती भी उतनी ही गंभीर होती गई है। कभी पायरेटेड सीडी और डीवीडी इस अवैध कारोबार का माध्यम थीं, फिर टोरेंट वेबसाइटों का दौर आया और अब एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफ़ॉर्म,क्लाउड स्टोरेज,निजी डिजिटल समूह तथा स्वचालित बॉट नेटवर्क पायरेटेड सामग्री के प्रसार के नए माध्यम बन चुके हैं। ऐसे परिदृश्य में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा ज्मसमहतंउ को जारी नोटिस केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं,बल्कि भारत की डिजिटल शासन व्यवस्था में उभर रहे नए दृष्टिकोण का स्पष्ट संकेत है।सरकार ने ज्मसमहतंउ से अपेक्षा की है कि वह केवल शिकायत मिलने पर सामग्री हटाने तक सीमित न रहे,बल्कि अपने प्लेटफ़ॉर्म पर पायरेटेड फिल्मों, ओटीटी सामग्री और अन्य कॉपीराइट संरक्षित ऑडियो- विजुअल कंटेंट की पहचान, रोकथाम और निष्कासन के लिए प्रभावी तंत्र विकसित करे तथा निर्धारित समय में विस्तृत कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करे।यह संदेश भी स्पष्ट है कि डिजिटल मध्यस्थ होने का अर्थ केवल तकनीकी मंच उपलब्ध कराना नहीं,बल्कि कानून के अनुरूप आवश्यक सावधानी और उत्तरदायित्व का पालन करना भी है।यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब भारत विश्व के सबसे बड़े फिल्म निर्माण देशों में शामिल होने के साथ-साथ सबसे तेज़ी से बढ़ते ओटीटी बाज़ारों में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा चुका है।भारतीय भाषाओं की फिल्में और वेब सीरीज़ आज वैश्विक दर्शकों तक पहुँच रही हैं। डिजिटल माध्यमों ने छोटे शहरों के कलाकारों,स्वतंत्र फिल्मकारों और नए रचनाकारों को भी विश्वस्तरीय मंच प्रदान किया है।यह परिवर्तन केवल मनोरंजन उद्योग तक सीमित नहीं, बल्कि भारत की उभरती हुई क्रिएटर इकोनॉमी का आधार बन चुका है।डिजिटल पायरेसी का सबसे बड़ा नुकसान केवल फिल्म निर्माता तक सीमित नहीं रहता। किसी भी फिल्म या वेब सीरीज़ के निर्माण में लेखक,निर्देशक, संगीतकार,गीतकार,अभिनेता, तकनीशियन,कैमरामैन,संपादक, ध्वनि विशेषज्ञ,ग्राफिक्स कलाकार, वितरक,प्रचार एजेंसियाँ और हजारों प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष कर्मचारी जुड़े होते हैं।किसी फिल्म की वैध आय में कमी का अर्थ इन सभी के श्रम और निवेश का अवमूल्यन है। यही कारण है कि विकसित देशों में बौद्धिक संपदा संरक्षण को आर्थिक विकास,नवाचार और निवेश की अनिवार्य शर्त माना जाता है।भारत में भी कॉपीराइट संरक्षण के लिए पर्याप्त कानूनी व्यवस्था उपलब्ध है।सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम,2000,सूचना प्रौद्योगिकी(मध्यस्थ दिशानिर्देश एवं डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021,कॉपीराइट अधिनियम, 1957 तथा सिनेमैटोग्राफ अधिनियम के विभिन्न प्रावधान डिजिटल माध्यमों पर होने वाले उल्लंघनों से निपटने का आधार प्रदान करते हैं। न्यायपालिका ने भी समय-समय पर जॉन डो अथवा अशोक कुमार आदेश तथा डायनेमिक इंजंक्शन जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से यह स्वीकार किया है कि डिजिटल अपराध स्थिर नहीं होते, इसलिए उनके समाधान भी तकनीक के अनुरूप गतिशील होने चाहिए।विश्व के अनेक देशों ने इसी अनुभव के आधार पर डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों की जवाबदेही बढ़ाई है।अमेरिका में डिजिटल मिलेनियम कॉपीराइट एक्ट,यूरोपीय संघ में डिजिटल सर्विसेज एक्ट तथा जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों की नीतियाँ इस दिशा में स्पष्ट संकेत देती हैं कि तकनीकी कंपनियाँ केवल निष्क्रिय माध्यम बनकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकतीं। भारत का वर्तमान दृष्टिकोण भी इसी वैश्विक प्रवृत्ति के अनुरूप दिखाई देता है।

हालाँकि यह विषय केवल कानून लागू करने का नहीं है।डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म आज शिक्षा,शोध, व्यापार,नागरिक संवाद और लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के भी प्रमुख माध्यम हैं।करोड़ों भारतीय ज्मसमहतंउ जैसे प्लेटफ़ॉर्मों का उपयोग पूरी तरह वैध उद्देश्यों के लिए करते हैं।इसलिए पायरेसी के विरुद्ध किसी भी कार्रवाई में यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि वैध उपयोगकर्ताओं की निजता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और डिजिटल अधिकारों पर अनावश्यक प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। लोकतांत्रिक शासन की सफलता इसी संतुलन में निहित है कि अपराध पर कठोरता हो, लेकिन नागरिक अधिकार सुरक्षित रहें।

आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्लाउड कंप्यूटिंग और एन्क्रिप्टेड संचार प्रणालियों ने डिजिटल पायरेसी को और जटिल बना दिया है।पहले किसी पायरेटेड फिल्म को बड़े पैमाने पर प्रसारित करने के लिए संगठित नेटवर्क की आवश्यकता होती थी,जबकि अब कुछ ही मिनटों में स्वचालित बॉट,निजी समूह और क्लाउड लिंक के माध्यम से वही सामग्री हजारों स्थानों तक पहुँच सकती है।परिणामस्वरूप केवल सामग्री हटाने की पारंपरिक व्यवस्था पर्याप्त नहीं रह गई है। दुनिया भर में अब रोकथाम, पूर्व पहचान और तकनीकी निगरानी आधारित मॉडल पर अधिक बल दिया जा रहा है।भारत के सामने भी यही चुनौती है।किसी एक प्लेटफ़ॉर्म पर कार्रवाई करके डिजिटल पायरेसी की समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।इंटरनेट की प्रकृति ऐसी है कि एक माध्यम बंद होने पर दूसरा सक्रिय हो जाता है। इसलिए सरकार ,डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म,इंटरनेट सेवा प्रदाता,फिल्म उद्योग,ओटीटी कंपनियाँ, साइबर विशेषज्ञ और कानून-प्रवर्तन एजेंसियों के बीच सतत समन्वय विकसित करना होगा।यह केवल कानूनी नहीं,बल्कि तकनीकी और प्रशासनिक सहयोग का भी विषय है।रचनात्मक उद्योगों को भी समय के अनुरूप अपनी रणनीति बदलनी होगी।अनेक देशों के अनुभव बताते हैं कि जब फिल्में और डिजिटल सामग्री उचित मूल्य पर,उच्च गुणवत्ता के साथ और समय पर वैध मंचों पर उपलब्ध होती हैं,तब पायरेसी स्वतः घटती है।इसलिए केवल दंडात्मक कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी।उपभोक्ता-अनुकूल डिजिटल पारिस्थितिकी,तेज़ वैध वितरण और किफायती सेवाएँ भी इस लड़ाई का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।इसके साथ-साथ समाज में बौद्धिक संपदा अधिकारों के प्रति सम्मान विकसित करना भी उतना ही आवश्यक है।हमारे यहाँ अक्सर बिना भुगतान के फिल्म या वेब सीरीज़ देखना गंभीर अपराध नहीं माना जाता,जबकि वास्तव में यह किसी रचनाकार के श्रम और अधिकार का अतिक्रमण है।जिस प्रकार भौतिक संपत्ति की चोरी सामाजिक रूप से अस्वीकार्य है, उसी प्रकार बौद्धिक संपदा की चोरी को भी नैतिक और सामाजिक स्तर पर अस्वीकार किया जाना चाहिए। यह परिवर्तन केवल कानून से नहीं, बल्कि जन-जागरूकता और शिक्षा से आएगा।ज्मसमहतंउ को जारी नोटिस का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि भारत में व्यापार करने वाली डिजिटल कंपनियों को भारतीय कानूनों के अनुरूप उत्तरदायी भी होना होगा।भविष्य में संभव है कि अन्य डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों के लिए भी इसी प्रकार के मानक विकसित किए जाएँ। यदि इनका क्रियान्वयन पारदर्शी, न्यायसंगत और तकनीकी रूप से सक्षम ढंग से किया जाता है,तो भारत अपनी रचनात्मक अर्थव्यवस्था को अधिक सुरक्षित बनाने के साथ-साथ वैश्विक डिजिटल शासन के क्षेत्र में भी संतुलित और उत्तरदायी मॉडल प्रस्तुत कर सकता है।वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की प्राप्ति केवल आधारभूत संरचना, विनिर्माण और निवेश से संभव नहीं होगी। ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था, फिल्म, संगीत, एनीमेशन, गेमिंग, डिजिटल पत्रकारिता,ऑनलाइन शिक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित रचनात्मक उद्योग भी भारत की भविष्य की आर्थिक शक्ति के प्रमुख स्तंभ होंगे।इन क्षेत्रों में निवेश तभी बढ़ेगा,जब रचनाकारों को यह विश्वास होगा कि उनके श्रम,प्रतिभा और निवेश की प्रभावी कानूनी सुरक्षा उपलब्ध है।

डिजिटल युग में यह केवल फिल्मों की पायरेसी का प्रश्न नहीं रह गया है।यह उस विश्वास की रक्षा का प्रश्न है,जिसके आधार पर कोई लेखक पुस्तक लिखता है,कोई संगीतकार धुन रचता है,कोई फिल्मकार करोड़ों रुपये का निवेश करता है और कोई युवा डिजिटल मंच पर अपने सपनों को आकार देता है।यदि तकनीक,कानून और नैतिक उत्तरदायित्व एक-दूसरे के पूरक बन सकें,तभी डिजिटल भारत वास्तव में नवाचार,सृजन और विश्वास पर आधारित ऐसी अर्थव्यवस्था का निर्माण कर सकेगा,जहाँ रचनाकार का अधिकार भी सुरक्षित हो और नागरिक की स्वतंत्रता भी।

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