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जब आस्था की भीड़ में कुचल जाता है इंसान

सावन का तीसरा सोमवार था। भगवान शिव के जलाभिषेक के लिए लखीसराय के प्रसिद्ध अशोक धाम मंदिर में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ा था। सुबह-सुबह मंदिर की ओर जाने वाले रास्ते आस्था और उम्मीद से भरे थे। लेकिन कुछ ही क्षणों में वही भीड़ चीख-पुकार में बदल गई। लोग भगवान तक पहुंचने के लिए निकले थे, मौत के मुंह में पहुंच गए। लखीसराय के इंद्रदमनेश्वर महादेव मंदिर, अशोक धाम में सोमवार सुबह हुई भगदड़ ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि हमारे धार्मिक स्थलों पर आस्था की भीड़ के लिए सुरक्षा की तैयारी कितनी गंभीर है। शुरुआती खबरों में मृतकों की संख्या छह और सात बताई गई, जबकि बाद की प्रशासनिक जानकारी में आठ महिला श्रद्धालुओं की मौत और नौ लोगों के गंभीर रूप से घायल होने की बात सामने आई। घटना की अंतिम स्थिति आधिकारिक जांच और पुष्टि से ही स्पष्ट होगी। हादसे की वजह को लेकर भी शुरुआती सूचनाओं में अंतर रहा। पहले बिजली के तार या खंभे से करंट लगने की बात सामने आई। बाद में जिलाधिकारी शैलेंद्र कुमार और एडीएम नीरज कुमार के हवाले से बताया गया कि बिजली आपूर्ति बंद थी और तार ढका हुआ था। अशोक धाम हाल्ट पर एक साथ दो ट्रेनें आने से अचानक भीड़ बढ़ी। कुछ युवकों की भाग-दौड़ के दौरान बिजली का एक खंभा गिर गया। इसके बाद करंट फैलने की अफवाह ने श्रद्धालुओं में दहशत पैदा कर दी। लोग इधर-उधर भागने लगे। बैरिकेडिंग टूट गई और भगदड़ में लोग एक-दूसरे के ऊपर गिरते चले गए।

यही इस घटना का सबसे भयावह पक्ष है। भगदड़ में हमेशा कोई एक चीज नहीं मारती। कभी अफवाह, कभी संकरी जगह, कभी टूटी बैरिकेडिंग, कभी अचानक बढ़ा दबाव और कभी प्रशासन की तैयारी तथा वास्तविक भीड़ के बीच का अंतर मौत का कारण बन जाता है। सवाल केवल अशोक धाम का नहीं है। सवाल यह है कि जब किसी धार्मिक आयोजन में हजारों लोगों के आने की संभावना पहले से मालूम होती है, तो भीड़ को अचानक आई आपदा की तरह क्यों देखा जाता है?सावन का सोमवार कोई अनजान तारीख नहीं था। अशोक धाम में भारी भीड़ की संभावना पहले से थी। जिलाधिकारी के अनुसार वे रात तीन बजे के बाद से ही मौके पर मौजूद थे। सुबह छह बजे के बाद भीड़ तेजी से बढ़ रही थी। दो ट्रेनों के एक साथ आने से श्रद्धालुओं की संख्या अचानक बढ़ी। इसका अर्थ है कि संकट केवल भगदड़ के क्षण में पैदा नहीं हुआ। संकट धीरे-धीरे बन रहा था। भीड़ बढ़ रही थी, रास्ते भर रहे थे और लोगों का दबाव बढ़ रहा था। फिर एक छोटी-सी घटना हुई और सामूहिक भय ने सब कुछ अपने कब्जे में ले लिया। भीड़ के मनोविज्ञान की यही विडंबना है। एक व्यक्ति दौड़ता है तो वह भाग रहा होता है। सौ लोग दौड़ते हैं तो वह भगदड़ होती है। हजार लोग दौड़ते हैं तो रास्ता नहीं बचता। गिरा हुआ व्यक्ति उठ नहीं पाता, क्योंकि पीछे आने वाले को पता ही नहीं होता कि उसके पैरों के नीचे कोई जिंदगी पड़ी है। इसलिए भीड़ प्रबंधन का अर्थ केवल पुलिस की संख्या बढ़ाना नहीं है। भीड़ को चलाना, रोकना, मोड़ना, बांटना और सुरक्षित निकालना भी उतना ही जरूरी है।

अशोक धाम केवल एक मंदिर नहीं है। यह लखीसराय की धार्मिक चेतना और स्थानीय आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र है। स्थानीय मान्यता के अनुसार इस स्थल का संबंध पाल काल से जुड़ा है। कहा जाता है कि आठवीं शताब्दी में पाल वंश के राजा नारायण पाल के समय यहां शिवलिंग की पूजा होती थी। एक अन्य परंपरा के अनुसार बारहवीं शताब्दी में राजा इंद्रद्युम्न ने यहां भव्य मंदिर का निर्माण कराया था। समय के साथ पुराना मंदिर नष्ट हुआ और उसके अवशेष धरती के नीचे दब गए। अशोक धाम की आधुनिक कहानी 7 अप्रैल 1977 से जुड़ती है। स्थानीय परंपरा के अनुसार उस दिन अशोक नाम का एक बालक गिल्ली-डंडा खेल रहा था। खेलते समय उसकी नजर जमीन के नीचे दबे एक विशाल काले पत्थर पर पड़ी। बाद में उसे शिवलिंग माना गया। शिवलिंग इतना विशाल था कि उसे बाहर निकालना संभव नहीं हुआ। उसी बालक के नाम पर यह स्थान अशोक धाम कहलाने लगा। मंदिर के पुनर्निर्माण का कार्य आगे बढ़ा और 11 फरवरी 1993 को जगन्नाथपुरी के शंकराचार्य ने नए मंदिर के निर्माण कार्य का उद्घाटन किया। बाद के वर्षों में श्री इंद्रदमनेश्वर महादेव मंदिर ट्रस्ट के माध्यम से मंदिर परिसर का विकास हुआ। आज सावन में यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इतिहास और आस्था से जुड़ा यह स्थल अब आधुनिक भीड़ प्रबंधन की बड़ी चुनौती के सामने है।

धार्मिक स्थलों की भीड़ का अपना अनुभव है। अजमेर शरीफ दरगाह में एक बार मुझे वीआईपी प्रवेश की सुविधा मिली। एक खादिम ने व्यवस्था कर दी थी और एक युवक चादर चढ़ाने में सहायता के लिए साथ था। फिर भी मुख्य द्वार तक पहुंचने में जिस भीड़ से गुजरना पड़ा, उसने समझा दिया कि वीआईपी प्रवेश भी भीड़ के भय को समाप्त नहीं करता। अंदर मजार पर चादर चढ़ाने की जगह छोटी और बंद थी। लगभग दो मिनट का वह समय बेहद परेशान करने वाला था। मेरी पोती भीड़ देखकर डर गई और रोने लगी। तब समझ आया कि धार्मिक आस्था व्यक्ति को भीतर से मजबूत करती है, लेकिन भीड़ का दबाव उम्र, शरीर और आस्था नहीं देखता। इसीलिए मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि बड़े धार्मिक आयोजनों में बच्चों, बीमारों और बहुत बुजुर्ग लोगों को अत्यधिक भीड़ से बचना चाहिए। युवा और शारीरिक रूप से सक्षम लोग जाएं, लेकिन भीड़ की प्रकृति और निकासी के रास्तों का ध्यान रखें। यह आस्था पर टिप्पणी नहीं, भीड़ के व्यवहार की व्यावहारिक समझ है। खाटू श्याम से लेकर वैष्णो देवी, अजमेर, काशी, उज्जैन, जगन्नाथ पुरी और कुंभ-महाकुंभ तक, जहां आस्था का समुद्र उमड़ता है, वहां सुरक्षा भी उसी अनुपात में मजबूत होनी चाहिए।

भारत का इतिहास ऐसी त्रासदियों से भरा पड़ा है। 1954 के प्रयाग कुंभ की भगदड़ देश की सबसे भयावह धार्मिक भीड़ त्रासदियों में गिनी जाती है। 2005 में महाराष्ट्र के मंधारदेवी मंदिर में तीन सौ से अधिक लोगों की मौत हुई। 2008 में जोधपुर के चामुंडा देवी मंदिर में दो सौ से अधिक लोग मारे गए। 2010 में प्रतापगढ़ के मनगढ़ आश्रम में 63 लोगों की मौत हुई। 2011 में सबरीमाला के पास पुलमेडु में सौ से अधिक श्रद्धालुओं की जान गई। 2015 में राजमुंदरी के गोदावरी पुष्करम में 27 लोगों की मौत हुई और उसी वर्ष देवघर के बैद्यनाथ धाम में भगदड़ में 11 श्रद्धालु मारे गए। ये केवल आंकड़े नहीं हैं। हर संख्या के पीछे एक परिवार है। किसी की मां, पत्नी, बेटी या पिता है। सवाल इसलिए यह नहीं होना चाहिए कि हादसा हुआ तो किसे दोष दें। सवाल यह होना चाहिए कि हादसा होने की स्थिति पैदा ही क्यों हुई?

अशोक धाम की घटना में अफवाह की भूमिका महत्वपूर्ण है। खंभा गिरा, लोगों ने करंट की आशंका समझी, डर फैला, लोग भागे, बैरिकेडिंग टूटी और लोग गिरते चले गए। इसलिए बड़े धार्मिक आयोजनों में केवल भजन और सामान्य घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं। अफवाह के मुकाबले सूचना की गति अधिक होनी चाहिए। किसी खंभे के गिरने पर तुरंत बताया जाए कि बिजली बंद है या चालू, लोगों को भागने के बजाय शांत रहने की सलाह दी जाए और वैकल्पिक रास्ते बताए जाएं। घबराई भीड़ को डंडे से नहीं, स्पष्ट सूचना और भरोसे से नियंत्रित किया जा सकता है।

धार्मिक आयोजनों की जिम्मेदारी केवल मंदिर प्रशासन की नहीं हो सकती। मंदिर प्रबंधन, जिला प्रशासन, पुलिस, रेलवे, बिजली विभाग, स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय निकायों को एक साझा सुरक्षा योजना बनानी होगी। अशोक धाम में दो ट्रेनों के एक साथ आने से भीड़ बढ़ी तो रेलवे स्टेशन से मंदिर तक का रास्ता भी सुरक्षा योजना का हिस्सा होना चाहिए था। धार्मिक स्थल का सुरक्षा नक्शा केवल प्रवेश द्वार तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसमें निकास द्वार, आपातकालीन मार्ग, चिकित्सा केंद्र, एंबुलेंस की पहुंच, बैरिकेडिंग, सीसीटीवी, सार्वजनिक उद्घोषणा और खुले सुरक्षित क्षेत्र शामिल होने चाहिए। प्रशासन को यह भी तय करना होगा कि किसी स्थान की सुरक्षित क्षमता कितनी है। क्षमता से अधिक भीड़ को भीतर जाने देना आस्था का सम्मान नहीं, जीवन को जोखिम में डालना है।

भगवान के दर्शन के लिए जीवन को जोखिम में क्यों डालें? यह सवाल धार्मिक नहीं, मानवीय है। भगवान कहीं भागे नहीं जा रहे। दर्शन कुछ देर से होगा तो धर्म समाप्त नहीं होगा। लेकिन एक बार किसी मां की सांस रुक गई, किसी बेटी की चीख निकल गई, किसी परिवार का सदस्य चला गया, तो कोई पूजा उसे वापस नहीं ला सकती। आस्था में धैर्य होना चाहिए, प्रशासन में दूरदृष्टि, आयोजन में अनुशासन और श्रद्धालुओं में यह समझ कि भीड़ में अपनी गति नहीं, सामूहिक सुरक्षा महत्वपूर्ण है। हर हादसे के बाद शोक, मुआवजा और जांच की घोषणा होती है। फिर कुछ दिनों बाद सब सामान्य हो जाता है। लेकिन सामान्य होना पर्याप्त नहीं है। हर ऐसी घटना के बाद सार्वजनिक सुरक्षा ऑडिट होना चाहिए। स्थल की सुरक्षित क्षमता, प्रवेश और निकास, बैरिकेडिंग, सूचना तंत्र, पुलिस और स्वयंसेवकों की संख्या, एंबुलेंस की पहुंच और आपातकालीन अभ्यास की समीक्षा होनी चाहिए। इन सवालों के जवाब फाइलों में बंद नहीं रहने चाहिए, अगली व्यवस्था में दिखाई देने चाहिए। लखीसराय में जिन महिलाओं ने जान गंवाई, वे किसी राजनीतिक सभा में नहीं जा रही थीं। वे अपने विश्वास के साथ भगवान शिव का जलाभिषेक करने गई थीं। किसी ने पूजा की थाली सजाई होगी, किसी ने गंगाजल उठाया होगा, किसी ने मनौती मांगी होगी। किसी ने नहीं सोचा होगा कि मंदिर तक पहुंचने से पहले ही जीवन की यात्रा समाप्त हो जाएगी। अशोक धाम की त्रासदी को केवल भगदड़ कहकर आगे बढ़ जाना पर्याप्त नहीं है। सदियों की आस्था से बने तीर्थ की गरिमा तभी बचेगी, जब वहां आने वाले हर श्रद्धालु की जिंदगी सुरक्षित होगी। आस्था की भीड़ को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसे सुरक्षित बनाया जा सकता है। श्रद्धालुओं की संख्या जितनी बड़ी होगी, प्रशासन की जिम्मेदारी उतनी ही बड़ी होनी चाहिए। मंदिर का सबसे बड़ा चमत्कार यह नहीं कि वहां लाखों लोग पहुंचें। सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि लाखों लोग आएं और एक भी जिंदगी न जाए। अशोक धाम की मौतें हमें यही सिखाती हैंकृभगवान के दरबार में जाने वाले रास्ते पर सबसे पहले इंसान की जान की रक्षा होनी चाहिए। क्योंकि जिस आस्था में जीवन की रक्षा नहीं, वह आस्था की नहीं, व्यवस्था की विफलता की कहानी बन जाती है।

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