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जब अपनों के बीच ही असुरक्षित हो जाए बुढ़ापा

बुढ़ापा जीवन का वह पड़ाव है, जहां व्यक्ति को सबसे अधिक सहारे, सम्मान और अपनत्व की आवश्यकता होती है। जिस माता-पिता ने अपने बच्चों को पालने, पढ़ाने और उन्हें जीवन में आगे बढ़ाने के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया, उसी उम्र में यदि उन्हें अपने ही घर में उपेक्षा, अपमान या असुरक्षा का सामना करना पड़े तो यह केवल एक परिवार की समस्या नहीं रह जाती, बल्कि पूरे समाज के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा करती है। इसी संवेदनशील मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी ने देश का ध्यान बुजुर्गों की गरिमा और सुरक्षा की ओर खींचा है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और भरण-पोषण सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए कानून के तहत ट्रिब्यूनल जरूरत पड़ने पर बच्चों को माता-पिता की संपत्ति से बेदखल करने का आदेश दे सकता है। अदालत ने कहा कि बढ़ती उम्र का अर्थ असुरक्षा, उपेक्षा या अपमान नहीं होना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को जीवनभर गरिमा के साथ जीने का अधिकार है। यह टिप्पणी केवल कानूनी अधिकारों की व्याख्या नहीं है, बल्कि परिवार और समाज के लिए एक महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश भी है।

बुजुर्ग परिवार की जिम्मेदारी नहीं, अनुभव की विरासत हैं

आज के बदलते पारिवारिक ढांचे में बुजुर्गों को कई बार केवल देखभाल की जरूरत रखने वाले व्यक्ति के रूप में देखा जाने लगता है। यह सोच बेहद संकीर्ण है। बुजुर्ग परिवार के अनुभव, परंपराओं, संस्कारों और सामूहिक स्मृतियों के वाहक होते हैं। उन्होंने अपने जीवन के उतार-चढ़ाव से जो अनुभव हासिल किए हैं, वह किसी किताब में आसानी से नहीं मिल सकता।

एक समय था जब संयुक्त परिवारों में दादा-दादी और नाना-नानी बच्चों के जीवन का अभिन्न हिस्सा होते थे। घर के निर्णयों में उनकी राय को महत्व दिया जाता था। आज परिवार छोटे हो गए हैं, कामकाज का दबाव बढ़ा है और पीढ़ियों के बीच संवाद कम हुआ है। इसका असर बुजुर्गों पर भी पड़ा है। कई वरिष्ठ नागरिक आर्थिक रूप से सक्षम होने के बावजूद भावनात्मक अकेलेपन का सामना करते हैं और कई ऐसे भी हैं जिन्हें अपने ही घर में सम्मान के लिए संघर्ष करना पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट के सामने आया मामला लखनऊ के विकास नगर निवासी रवि कांत गुप्ता की अपील से जुड़ा था। गुप्ता ने अपने बेटे को मकान से बाहर करने के लिए जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन किया था। यह मकान उनकी स्वयं की खरीदी हुई संपत्ति थी। मामले की संवेदनशीलता इस तथ्य से भी सामने आती है कि उनकी 81 वर्षीय मां को घर छोड़कर वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा। एसडीएम ने नवंबर 2022 में बेटे की बेदखली का आदेश दिया था। इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट ने भी उस आदेश को बरकरार रखते हुए बेटे और बहू को मकान खाली करने का निर्देश दिया। हालांकि, बेटे और बहू ने इन आदेशों को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने बेदखली का आदेश रद्द करते हुए माना था कि 2007 का कानून बुजुर्गों को अपनी संपत्ति से बच्चों को बेदखल करने का अधिकार नहीं देता।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया और स्पष्ट किया कि बुजुर्गों की सुरक्षा और भरण-पोषण के लिए आवश्यक होने पर ट्रिब्यूनल बेदखली का आदेश दे सकता है। अदालत ने कानून के उद्देश्य को व्यापक रूप से देखते हुए कहा कि वरिष्ठ नागरिकों की गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित करना इस कानून की मूल भावना है। माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 का उद्देश्य केवल बुजुर्गों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना नहीं है। इसका व्यापक उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों को सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन प्रदान करना है। कानून के तहत माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक अपने भरण-पोषण के लिए संतान से सहायता मांग सकते हैं। जरूरत पड़ने पर वे मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल का सहारा ले सकते हैं। यदि किसी बुजुर्ग ने इस उम्मीद में अपनी संपत्ति बच्चों को दी है कि बच्चे उनकी देखभाल करेंगे, लेकिन बाद में उनकी उपेक्षा की जाती है, तो कानून उन्हें राहत पाने का रास्ता भी देता है। ऐसे मामलों में संपत्ति हस्तांतरण को रद्द कराने की व्यवस्था भी कानून में है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब बुजुर्ग की सुरक्षा और गरिमा का सवाल हो, तब संपत्ति से बच्चे को हटाना भी कानूनी संरक्षण का एक आवश्यक उपाय हो सकता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हर पारिवारिक विवाद में बच्चों को घर से बाहर किया जाएगा। मामला परिस्थितियों, बुजुर्ग की सुरक्षा और कानून के उद्देश्य के आधार पर देखा जाएगा।

घर में होने वाला अत्याचार हमेशा दिखाई नहीं देता

बुजुर्गों के साथ होने वाला घरेलू अत्याचार केवल मारपीट तक सीमित नहीं है। कई बार उन्हें लगातार अपमानित करना, उनकी बातों को महत्व न देना, आर्थिक रूप से निर्भर बनाना, संपत्ति के लिए दबाव डालना, घर से अलग कर देना या उनकी मूलभूत जरूरतों की उपेक्षा करना भी अत्याचार का स्वरूप ले सकता है। सबसे दुखद स्थिति तब होती है जब बुजुर्ग शिकायत करने से भी डरते हैं। उन्हें भय रहता है कि शिकायत करने से परिवार टूट जाएगा या समाज में उनकी बदनामी होगी। कई माता-पिता अपने बच्चों के खिलाफ कार्रवाई करने से इसलिए बचते हैं क्योंकि उनके मन में आज भी बच्चों के प्रति ममता और परिवार बचाने की इच्छा सबसे ऊपर होती है। लेकिन सम्मान और सुरक्षा किसी भी बुजुर्ग पर परिवार की कृपा नहीं, बल्कि उनका अधिकार है। बच्चों का कर्तव्य केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं होना चाहिए। बुजुर्गों को भावनात्मक सुरक्षा, सम्मान और निर्णयों में स्थान देना भी परिवार की जिम्मेदारी है।

सभ्य समाज की पहचान बुजुर्गों के व्यवहार से होती है

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एक बेहद महत्वपूर्ण सामाजिक दृष्टिकोण सामने रखा कि किसी सभ्य समाज का स्तर इस बात से भी तय होता है कि वह अपने बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करता है। यह बात केवल अदालत या कानून के लिए नहीं, बल्कि प्रत्येक परिवार के लिए आत्ममंथन का विषय है। जिस घर में बुजुर्गों को सम्मान मिलता है, वहां बच्चों को भी रिश्तों की कीमत समझ आती है। वहीं जिस घर में माता-पिता की उपेक्षा होती है, वहां अगली पीढ़ी भी वही व्यवहार सीख सकती है। आज जो बच्चे अपने माता-पिता को सम्मान देते हुए देखते हैं, कल वे भी उसी संस्कार को आगे बढ़ाते हैं। इसलिए बुजुर्गों का सम्मान केवल परंपरा निभाना नहीं है। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए सामाजिक संस्कार तैयार करना भी है।

 क्योकि संपत्ति रिश्तों से बड़ी नहीं हो सकती है।बुजुर्गों से जुड़े कई विवादों की जड़ में संपत्ति दिखाई देती है। घर, जमीन और विरासत को लेकर परिवारों में मतभेद बढ़ते हैं। कई बार संपत्ति पाने के बाद बच्चों का व्यवहार बदल जाता है और माता-पिता को यह महसूस होने लगता है कि उनकी उपयोगिता केवल संपत्ति तक सीमित थी। ऐसी परिस्थितियां परिवार के लिए बेहद चिंताजनक हैं। संपत्ति जीवन की सुविधा दे सकती है, लेकिन वह रिश्तों की जगह नहीं ले सकती। माता-पिता ने बच्चों को संपत्ति से अधिक महत्वपूर्ण चीज दी होती है, वह है जीवन, शिक्षा, संस्कार और संघर्ष से मिली सीख। कानून का हस्तक्षेप तभी सामने आता है जब पारिवारिक व्यवस्था बुजुर्गों को सुरक्षा देने में असफल हो जाती है। इसलिए बेहतर यही है कि विवाद अदालत या ट्रिब्यूनल तक पहुंचने से पहले परिवार के भीतर संवाद और संवेदनशीलता से हल किए जाएं।आज बुजुर्गों की सबसे बड़ी जरूरत हमेशा पैसा या महंगी सुविधाएं नहीं होतीं। कई बार उन्हें केवल कुछ समय बातचीत करने वाला अपना व्यक्ति चाहिए। उनकी बात सुनना, उनके अनुभव पूछना, उन्हें परिवार के निर्णयों में शामिल करना और यह एहसास कराना कि वे आज भी परिवार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, उनके जीवन में बड़ा बदलाव ला सकता है।

बुजुर्गों की भावनाओं को समझना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि उम्र बढ़ने के साथ सामाजिक दायरा सीमित हो सकता है। ऐसे समय में परिवार ही उनका सबसे बड़ा सहारा बनता है। यदि परिवार ही उनसे दूरी बना ले तो अकेलापन और असुरक्षा गहरी हो सकती है।सम्मान की शुरुआत घर से होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का फैसला कानून की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका सबसे बड़ा संदेश सामाजिक है। अदालतें अधिकारों की रक्षा कर सकती हैं, कानून सुरक्षा दे सकता है और प्रशासन शिकायत पर कार्रवाई कर सकता है, लेकिन बुजुर्गों को वास्तविक सम्मान परिवार ही दे सकता है। हमें यह समझना होगा कि बुढ़ापा जीवन का बोझ नहीं, जीवनभर के अनुभवों का परिणाम है। आज के युवा जिस उम्र में अपने भविष्य का निर्माण कर रहे हैं, उसी तरह उनके माता-पिता ने कभी उनके भविष्य के लिए अपना वर्तमान समर्पित किया था। इसलिए जब जीवन का अंतिम पड़ाव आता है तो उन्हें अकेला छोड़ देना मानवीय संवेदनाओं के विपरीत है। बुजुर्गों के साथ सम्मानजनक व्यवहार केवल उनका अधिकार नहीं, हमारी जिम्मेदारी भी है। यदि परिवार अपने बुजुर्गों का हाथ थामे रहे तो कई विवाद अदालत तक पहुंचने से पहले ही खत्म हो सकते हैं। कानून की जरूरत तब पड़ती है जब संवेदना कमजोर पड़ जाती है। इसलिए समाज को ऐसी स्थिति आने ही नहीं देनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का संदेश स्पष्ट है कि उम्र बढ़ने के साथ किसी व्यक्ति की गरिमा कम नहीं होती। बल्कि जीवन के अनुभवों के कारण उसका सम्मान और बढ़ना चाहिए। जिस समाज में बुजुर्ग सुरक्षित, सम्मानित और आत्मसम्मान के साथ जीवन जी सकें, वही वास्तव में संवेदनशील और सभ्य समाज कहलाने का अधिकारी है। आखिरकार, आज के बुजुर्ग कल के निर्माता हैं और आज की पीढ़ी का व्यवहार ही तय करेगा कि आने वाले कल में उसके साथ कैसा व्यवहार होगा।

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