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20 जुलाई दिन सोमवार को, कॉकरोच पार्टी ने जंतर मंतर से संसद तक मार्च करने का आह्वान किया था। इस प्रदर्शन ने सरकार को चिंता में डाल दिया है। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां भी इस प्रदर्शन से चिंतित हो गई हैं। इतनी बड़ी संख्या में युवा कैसे इकट्ठे हो गए। बिना किसी तैयारी के लोग अपने-अपने तरीके से इस विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए पहुंचे। जिस शांतिपूर्ण ढंग से युवाओं ने विरोध प्रदर्शन किया है, बिना किसी राजनीतिक या बिना किसी जान पहचान के इतनी बड़ी मात्रा में युवाओं का एकत्रित होना, उनका शांतिपूर्ण प्रदर्शन सभी को आश्चर्य में डाल रहा है। यह पीढ़ी गांधी के बारे में नहीं जानती हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में नहीं जानती है। इस हिंसक वातावरण में जिस अनुशासन और शांति के साथ युवा प्रदर्शन में शामिल हुए, उसने पुलिस और सुरक्षाबलों के दमन पर भी हिंसक नहीं हुए। गांधीवादी तरीके से पुलिस की लाठियों से पिटते रहे, भागे नहीं। इस प्रदर्शन का श्रेय ना तो सोनम वांगचुक को ना ही कॉकरोच पार्टी को दिया जा सकता है। यह प्रदर्शन पिछले एक दशक से सरकार ने जिस तरह से युवाओं को उपेक्षित करके रखा है। शिक्षा महंगी होती जा रही है, स्नातक-परास्नातक और प्रोफेशनल कोर्स की डिग्री लेने के बाद भी उन्हें नौकरी नहीं मिल रही है। हर साल 2 से 3 परीक्षाएं देने के बाद भी ना तो नौकरी मिल रही है, ना ही उनका कैरियर बन पा रहा है। हर जगह पर जिस तरह का भ्रष्टाचार हो रहा है। युवाओं को उनकी बात नहीं कहने दी जा रही है। हर जगह उनके साथ सख्ती की जा रही है। युवाओं को जिस तरह से मकड़जाल में फंसाकर उन्हें भयभीत किया जा रहा था। ऐसा लग रहा है, कि अब युवा अपने भविष्य के लिए बिना किसी डर और भय के मुखर होकर भविष्य की लड़ाई लड़ने के लिए सड़कों पर उतरे हैं।
दिल्ली पुलिस ने आंदोलनकारियों पर लाठियों से हमला किया। अश्रुगैस के गोले फोड़े गए। अज्ञात लोगों ने मुंह ढंक कर पत्थरबाजी की। पहिले से टूटी-फूटी गाड़ियों को संसद मार्ग पर पुलिस ने लाकर रखा था। इस सब साजिशों के बाद भी युवा उग्र नहीं हुआ। दिल्ली पुलिस आरोप लगा रही है, प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर हमला किया। सैकड़ों पुलिसकर्मी घायल हुई हैं। कितने प्रदर्शनकारी है, यह आंकड़ा दिल्ली पुलिस नहीं बता पा रही है। हर मोबाइल पर प्रदर्शन स्थल के सोशल मीडिया में जो वीडियो है, वह पुलिस बर्बरता को बता रहे हैं। इसके बाद भी युवाओं का शांतिपूर्ण आंदोलन चर्चाओं में है। युवाओं का डर और भय पूरी तरह से खत्म हो गया है। यह प्रदर्शन केवल दिल्ली में हुआ हो ऐसा नहीं है। देश के विभिन्न स्थानों में युवाओं ने सड़क पर उतरकर यह बता दिया है। अब उनकी उपेक्षा करना केंद्र एवं राज्य सरकारों के लिए संभव नहीं होगा। पिछले चार दशक से भारत में मंडल और कमंडल की राजनीति, 2014 के बाद से भारत में पूंजीवादी व्यवस्था में आम आदमी पूरी तरह से बेबस होता जा रहा है। पढ़ाई दिन-प्रतिदिन महंगी होती जा रही है। प्रतियोगी परीक्षाओं में पक्षपात और भ्रष्टाचार हो रहा है। शासन और प्रशासन जिस तरह की साजिश रचकर मध्यम वर्ग और गरीब वर्ग को पूंजीवादी व्यवस्था की ओर ढकेलना चाहता है। इस बात को युवा अच्छी तरह से समझ गए हैं। उन्हें इस बात का ज्ञान हो गया है, उन्हें अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ेगी। जेन-जी का युवा ना तो धर्म से प्रभावित है, ना ही किसी राजनीतिक विचारधारा को लेकर प्रतिबद्ध है। उसे भविष्य के जो सपने दिखाये गए थे, वह सपने पूरी तरह टूट गये हैं। उसने अनुभव में जो पाया है, उसका परिणाम 20 जुलाई को दिल्ली सहित कई राज्यों की सड़कों में देखने को मिला है। सरकार को समझना होगा, सपने और कोरे आश्वासन पर युवाओं को विश्वास नहीं रहा। सरकार को युवाओं की समस्या और उनके भविष्य को लेकर गंभीरता के साथ ध्यान देना होगा। जो सपने सरकारों ने दिखाए थे, उस पर युवा वर्ग को अब विश्वास नहीं है। वह अपनी लड़ाई स्वयं सड़कों पर लड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार है। 20 जुलाई के इस आंदोलन ने जेन-जी का जो नया रूप दिखाया है, उससे राजनीतिक दलों, शिक्षा माफिया तथा सरकार के पाखंड को युवा वर्ग की नई चुनौती मिल रही है। सरकार ने इस बात को जल्द नहीं समझा, तो सरकार के लिए आगे चलकर मुश्किलें बढ़ना तय हैं।
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