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केजरीवाल और आप नेताओं के लिए खुले हैं कई कानूनी विकल्प

नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की पीठ ने शराब घोटाला मामले में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और सौरभ भारद्वाज सहित अन्य नेताओं के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का आदेश दिया है। यह मामला कथित तौर पर अदालती कार्यवाही और जांच एजेंसियों के खिलाफ सोशल मीडिया पोस्ट व सार्वजनिक बयानों के जरिए न्यायपालिका की कथित छवि धूमिल करने से जुड़ा है। अदालत का मानना है कि इन नेताओं ने न्यायिक आदेशों को ऊपरी अदालत में चुनौती देने के बजाय सोशल मीडिया पर भ्रामक वीडियो और पत्रों के माध्यम से दुष्प्रचार किया। जस्टिस शर्मा ने स्पष्ट किया कि यह किसी जज पर निजी हमला नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्था को डराने का प्रयास था। कोर्ट के अनुसार, जजों की गरिमा को ठेस पहुंचाना और उन पर दुर्भावनापूर्ण अभियान चलाना गंभीर अवमानना की श्रेणी में आता है।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, संबंधित नेताओं के पास इस स्थिति में तीन मुख्य विकल्प मौजूद हैं। पहला विकल्प अदालत में जवाब दाखिल करना है, जिसमें वे यह तर्क दे सकते हैं कि उनके बयान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में थे और उनका उद्देश्य अवमानना करना नहीं था। दूसरा विकल्प बिना शर्त माफी मांगना है; अक्सर अदालतें बिना शर्त माफी स्वीकार कर कार्यवाही समाप्त कर देती हैं, हालांकि यह पूरी तरह अदालत के विवेक पर निर्भर है। तीसरा विकल्प सुप्रीम कोर्ट में अपील करना है। यदि हाईकोर्ट से कोई प्रतिकूल आदेश आता है, तो नेता इसे सर्वाेच्च न्यायालय में चुनौती दे सकते हैं। कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट, 1971 के तहत यदि कोई व्यक्ति न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने या अदालत की प्रतिष्ठा कम करने का प्रयास करता है, तो उसे दोषी माना जा सकता है। इसमें जुर्माना, माफी या अधिकतम छह महीने की जेल का प्रावधान है। पूर्व में वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना का दोषी पाते हुए उन पर एक रुपये का प्रतीकात्मक जुर्माना लगाया था। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आम आदमी पार्टी के नेता इस कानूनी संकट से निपटने के लिए किस मार्ग का चयन करते हैं।


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