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यूपी में दलित राजनीति का बदलेगा समीकरण

लखनऊ। बिहार की राजनीति में अपनी धाक जमाने के बाद केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) अब उत्तर प्रदेश के चुनावी मैदान में उतरने को तैयार है। राजधानी लखनऊ में मुख्यमंत्री आवास के बाहर लगे लोजपा के पोस्टरों ने सियासी सरगर्मी तेज कर दी है। इन पोस्टरों पर लिखा नारा- क्यों मांगे नेता उधार, जब अपना नेता है तैयारकृ सीधे तौर पर दलित समाज को एक नया विकल्प देने की कवायद माना जा रहा है। लोजपा (रा) के सांसद अरुण भारती ने संकेत दिए हैं कि पार्टी आगामी यूपी विधानसभा चुनाव में सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ने की रणनीति बना रही है। पार्टी केवल बिहार से सटे जिलों तक सीमित न रहकर पूरे प्रदेश में बूथ स्तर पर संगठन खड़ा कर रही है। चिराग की इस सक्रियता ने भाजपा, सपा और बसपा तीनों के लिए चिंता की लकीरें खींच दी हैं। चिराग की यह रणनीति एनडीए के अन्य सहयोगियों जैसे ओम प्रकाश राजभर और संजय निषाद के लिए भी चुनौती पेश करेगी, क्योंकि वे भी पिछड़ों और वंचितों की राजनीति करते हैं। गौरतलब है कि इससे पहले 2022 में बिहार के ही नेता मुकेश सहनी ने यूपी में चुनाव लड़ने की कोशिश की थी, जिसके बाद भाजपा ने कड़ा रुख अपनाते हुए उन्हें गठबंधन से बाहर कर दिया था। अब देखना यह होगा कि 2027 के महासंग्राम में भाजपा चिराग की इस प्रेशर पॉलिटिक्स से कैसे निपटती है।

सपा,बसपा और भाजपा का क्या होगा

मायावती के गिरते ग्राफ के बीच चिराग पासवान की एंट्री बसपा के कैडर वोट में बड़ी सेंध लगा सकती है। यदि दलित युवाओं को चिराग में भविष्य दिखा, तो बसपा के लिए अपनी जमीन बचाना मुश्किल होगा। सपा प्रमुख अखिलेश यादव के पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को भी इससे चुनौती मिल सकती है। लोकसभा चुनाव में सपा की ओर मुड़ा दलित वोट बैंक अब चिराग की ओर आकर्षित हो सकता है। जहां तक भाजपा का सवाल है तो चिराग केंद्र में भाजपा के सहयोगी हैं, लेकिन यूपी में उनके स्वतंत्र चुनाव लड़ने से भाजपा के पाले में आया गैर-जाटव दलित वोट बैंक छिटक सकता है।

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