Shopping cart
Your cart empty!
Terms of use dolor sit amet consectetur, adipisicing elit. Recusandae provident ullam aperiam quo ad non corrupti sit vel quam repellat ipsa quod sed, repellendus adipisci, ducimus ea modi odio assumenda.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Sequi, cum esse possimus officiis amet ea voluptatibus libero! Dolorum assumenda esse, deserunt ipsum ad iusto! Praesentium error nobis tenetur at, quis nostrum facere excepturi architecto totam.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Inventore, soluta alias eaque modi ipsum sint iusto fugiat vero velit rerum.
Sequi, cum esse possimus officiis amet ea voluptatibus libero! Dolorum assumenda esse, deserunt ipsum ad iusto! Praesentium error nobis tenetur at, quis nostrum facere excepturi architecto totam.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Inventore, soluta alias eaque modi ipsum sint iusto fugiat vero velit rerum.
Dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Sequi, cum esse possimus officiis amet ea voluptatibus libero! Dolorum assumenda esse, deserunt ipsum ad iusto! Praesentium error nobis tenetur at, quis nostrum facere excepturi architecto totam.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Inventore, soluta alias eaque modi ipsum sint iusto fugiat vero velit rerum.
Sit amet consectetur adipisicing elit. Sequi, cum esse possimus officiis amet ea voluptatibus libero! Dolorum assumenda esse, deserunt ipsum ad iusto! Praesentium error nobis tenetur at, quis nostrum facere excepturi architecto totam.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Inventore, soluta alias eaque modi ipsum sint iusto fugiat vero velit rerum.
Do you agree to our terms? Sign up
देश के लगभग 21 लाख छात्रों का भविष्य पिछले दिनों उस समय फिर दांव पर लग गया जबकि नीट अर्थात नेशनल एलिजिबिलिटी एंट्रेंस टेस्ट की राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा, पेपर लीक हो जाने के कारण रद्द कर दी गयी। परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था एनटीए अर्थात नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने इस मामले में स्वयं को ज़िम्मेदार मानते हुये परीक्षा रद्द करने की घोषणा की। पेपर लीक होने के चलते देश में पहले भी नीट परीक्षाएं रद्द हो चुकी हैं। इसके लिए ज़िम्मेदार कोई भी हो परन्तु इससे सबसे बड़ा नुक़्सान उस मेहनतकश विद्यार्थी को हुआ है जिसने दिन रात एक कर परीक्षा दी और परीक्षा के परिणाम सुनने के बजाये उन्हें परीक्षा के रद्द होने जैसी मनहूस ख़बर सुनाई दी। इस घटना के बाद एक बार फिर हमारे देश की विद्या यहाँ के विद्यार्थियों तथा विद्यालयों के भविष्य को लेकर चर्चा छिड़ गयी है। एक तरफ़ तो नीट परीक्षा देने वाले जीव विज्ञान,वनस्पति विज्ञान,प्राणी विज्ञान,रसायन विज्ञान तथा भौतिक विज्ञान के वे छात्र जो भविष्य में डॉक्टर,वैज्ञानिक,इंजीनियर आदि बनकर देश की सेवा करना चाहते हैं,उनका भविष्य अधर में लटका दिखाई दे रहा है। तो दूसरी तरफ़ शिक्षा को लेकर सरकार का एजेंडा व उसकी प्राथमिकतायें भी कुछ और ही नज़र आ रही हैं।
आज देश के विभिन्न राज्यों के विद्यालयों में अब भारतीय ज्ञान प्रणाली के नाम पर धर्म,अध्यात्म,कर्म काण्ड व पंडितों की शिक्षा दी जाने लगी है। यहाँ सरकारी और कुछ निजी स्कूलों में हिंदू धर्म, अध्यात्म, नैतिक मूल्यों, भारतीय ज्ञान प्रणाली और संबंधित ग्रंथों (जैसे भगवद्गीता, रामायण, वेद) की शिक्षा दी जा रही है और इससे संबंधित गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा रहा है। यह मुख्य रूप से राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत,मूल्य-आधारित शिक्षा, नैतिकता और सांस्कृतिक जागरूकता के नाम पर हो रहा है। हालांकि भारतीय संविधान (अनुच्छेद 28) सरकारी फ़ंड वाले स्कूलों में धार्मिक शिक्षा पर रोक लगाता है, लेकिन धर्मों के बारे में शिक्षा की अनुमति है जिसे आधार बनाकर धार्मिक शिक्षा दी जा रही है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ समर्थित व अन्य हिंदू संगठनों द्वारा संचालित स्कूलों में यह पहले से अधिक प्रचलित है।
शिक्षा को लेकर हमारा देश इस समय एक ऐसे दुर्भागयपूर्ण दौर से गुज़र रहा है जबकि देश के सर्वाेच्च संवैधानिक पदों पर बैठे अनेक लोगों की शिक्षा, उनकी डिग्रियां असली हैं या नक़ली, विधान निर्माता शिक्षित है या अशिक्षित,इसतरह के सवाल उठ रहे हैं। उधर उच्च शिक्षा हासिल करने के लिये संपन्न लोग अपने बच्चों को पहले भी विदेश भेजा करते थे और आज भी भेजते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री व दुनिया के जाने माने अर्थशास्त्री स्व डॉ मनमोहन सिंह ने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से 1957 में अर्थशास्त्र में प्रथम श्रेणी ऑनर्स डिग्री हासिल की थी और ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय से 1962 में डी.फ़िल. की उपाधि ग्रहण की थी। पंडित जवाहरलाल नेहरू व राजीव गाँधी भी कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं। इसी तरह वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण,ज्योतिरादित्य सिंधिया,राहुल गांधी,जयराम रमेश ,पी. चिदंबरम,कपिल सिब्बल,सुब्रमण्यम स्वामी,जयंत सिन्हा,रतन टाटा, आनंद महिंद्रा जैसे अनेकानेक राजनेता उद्योगपति व प्रतिष्ठित लोग हारवर्ड,कैम्ब्रिज,ऑक्सफोर्ड या अन्य प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से शिक्षा ग्रहण कर चुके हैं।
परन्तु हमारे प्रधानमंत्री की नज़रों में शायद इन विश्वविद्यालयों की डिग्रियों या यहाँ की पढ़ाई की उतनी अहमियत नहीं। तभी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मार्च 2017 को उत्तर प्रदेश में एक चुनावी रैली के दौरान कहा था कि एक तरफ़ वे लोग हैं जो हार्वर्ड की बात करते हैं, और दूसरी तरफ़ एक ग़रीब का बेटा है, जो अपनी कड़ी मेहनत (भ्ंतक ूवता) से अर्थव्यवस्था को सुधारने की कोशिश कर रहा है। इससे पहले 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान भी उन्होंने तमिलनाडु में एक सभा में कहा था कि देश को विकास के लिए हार्वर्ड की नहीं, हार्ड वर्क की ज़रूरत है। प्रधानमंत्री के अनुसार हार्वर्ड वालों से ज़्यादा दम हार्ड वर्क वालों में है। ज़रा सोचिये कि क्या पढ़ाई करना हार्ड वर्क की श्रेणी में नहीं आता ? जो बच्चा परीक्षा की तैयारी के लिये दिन रात एक किये रहता है,खाना पीना नींद आराम सब कुछ छोड़कर रोज़ 16 -18 घण्टे पढ़ाई करता है वह क्या हार्ड वर्क नहीं है ?
निश्चित रूप से शिक्षा के प्रति शीर्ष सत्ता के इसी मनोभाव की वजह से ही आज देश के विद्या मंदिरों पर घोर संकट छाया हुआ है। विगत 10 वर्षों के दौरान भारत में लगभग एक लाख सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं। यह कुल सरकारी स्कूलों में लगभग 8ः की कमी है। आज दुर्भाग्यवश देश में सरकारी स्कूल्स की संख्या बढ़ने के बजाये 11.07 लाख से घटकर क़रीब 10.17 लाख हो गयी है। जबकि शुद्ध व्यवसायिक मॉडल वाले मंहगे निजी स्कूलों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है। ग़ौरतलब है कि देश के सरकारी स्कूल्स में प्रायः साधारण परिवारों या ग़रीबों के बच्चे शिक्षा ग्रहण करते हैं जिनमें अधिकांश संख्या एस सी ,एस टी,ओ बी सी व अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की होती है। इनमें ज़्यादातर बच्चे किसानों,कामगारों व मेहनतकश मज़दूरों के होते हैं जो वास्तव में शिक्षा के हक़दार भी हैं और शिक्षा उनके भविष्य व जीविकोपार्जन के लिये बेहद ज़रूरी भी है। परन्तु सरकार की विद्या व विद्यालय विरोधी नीतियों के चलते देश में अब तक लगभग 65 लाख बच्चे स्कूल जाना छोड़ चुके हैं।
सरकार द्वारा इस संबंध में यह तर्क दिया जाता है कि छात्रों की अपेक्षित संख्या न होने,संसाधन बचाने और बेहतर शिक्षा के कारण,इंफ्रास्ट्रक्चर व अध्यापकों की कमी या पोस्ट-कोविड प्रभाव कारण अनेक विद्यालयों का विलय पास पड़ोस के गांव में कर दिया गया है। जबकि उनकी दूरी 2 किलोमीटर से 8 किलोमीटर तक है। इतनी दूर बच्चों के स्कूल जाने के लिये न तो सरकार ने कोई उपाय किया है न ही अभिभावकों के पास कोई सामर्थ्य है। ख़ासकर अपनी बच्चियों को वैसे भी कोई मां बाप इतनी दूर के स्कूल नहीं भेजना चाहेगा। ऐसे में इस शिक्षा विरोधी सरकारी नीति के चलते बच्चों के अंधकारमय भविष्य का कौन ज़िम्मेदार है? ज़ाहिर है जब यह प्राथमिक शिक्षा ही हासिल नहीं कर सकेंगे तो यह भला हार्वर्ड कैसे जा सकेंगे। और ऐसे में इन्हें प्रधानमंत्री की सलाह के अनुसार हार्ड वर्क यानी मेहनत मज़दूरी करके ही अपना जीवन यापन करना पड़ेगा।
उधर दावा यह भी है कि भारत विश्व गुरु बनेगा। कुछ अति उत्साही लोग तो कह रहे हैं कि भारत विश्व गुरु बन चुका है। परन्तु लगता है कि वर्तमान सरकार केरल की औसत शिक्षा दर से डरी हुई है ? शायद वह समझ रही है कि आज जो बच्चा पढ़ेगा वही कल सत्ता से सवाल करेगा,अपनी शिक्षित बुद्धि का इस्तेमाल करेगा,तर्क वितर्क करेगा और कुतर्कों के झांसे में नहीं आएगा,अन्धविश्वास विरुद्ध अपनी आवाज़ बुलंद करेगा। शायद इसी वजह से देश के विद्या मंदिरों में ताले लगते जा रहे हैं।
Leave a Comment