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टोक्यो। एशिया को संकट एक साथ कई दिशाओं से घेरते नजर आ रहे हैं। एक तरफ मिडिल ईस्ट में जारी तनाव ने ऊर्जा आपूर्ति को झटका लग रहा है, तो दूसरी तरफ अब सुपर अल-नीनो का खतरा मंडरा रहा है। यह एक ऐसा संभावित झटका है जो करोड़ों लोगों की जिंदगी, अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। गर्मी की चरम स्थिति, सूखा, बाढ़ और ऊर्जा संकट ये सभी मिलकर एक बड़े क्षेत्रीय संकट का रूप ले सकते हैं।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक विशेषज्ञों की मानें तो अगर अल-नीनो मजबूत रूप में विकसित होता है, तो एशिया के कई देशों में तापमान रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकता है। इसका सीधा असर बिजली की मांग पर पड़ेगा, क्योंकि लोग कूलिंग के लिए ज्यादा ऊर्जा का इस्तेमाल करेंगे, लेकिन समस्या यह है कि पहले से ही ऊर्जा आपूर्ति बाधित है, खासकर तेल और गैस के मामले में। ऐसे में बिजली कटौती, महंगे ईंधन और आर्थिक दबाव का खतरा और बढ़ जाएगा। अल-नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है जो कुछ सालों में सामने आती है, लेकिन इस बार इसके सुपर होने की आशंका जताई जा रही है। यह घटना हवा के दबाव, समुद्र के तापमान और बारिश के पैटर्न को बदल देती है, इससे कुछ इलाकों में सूखा और कुछ में भारी बारिश होती है। यही असंतुलन एशिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है।
ऊर्जा क्षेत्र पर इसका असर सबसे पहले दिखाई देगा। मिडिल ईस्ट में तनाव के चलते पहले ही तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हो रही है। अगर तापमान और बढ़ता है, तो बिजली की मांग आसमान छू सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे ऊर्जा ग्रिड पर भारी दबाव पड़ेगा और कई देशों को बिजली कटौती या रेशनिंग करनी पड़ सकती है। इसका असर उद्योगों और आम लोगों दोनों पर पड़ेगा। जलविद्युत उत्पादन पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। एशिया के कई देश, खासकर दक्षिण-पूर्व एशिया और हिमालयी क्षेत्र, बिजली के लिए जलविद्युत पर निर्भर हैं, लेकिन सूखे की स्थिति में नदियों का जलस्तर गिर सकता है, इससे बिजली उत्पादन कम हो जाएगा। सूखा और अनियमित बारिश फसलों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। अगर उत्पादन घटता है और लागत बढ़ती है, तो खाद्य कीमतों में उछाल आएगा। इसका सीधा असर गरीब और मध्यम वर्ग पर पड़ेगा, जिससे भुखमरी का खतरा बढ़ सकता है।
कुछ इलाकों में इसके उलट भारी बारिश और बाढ़ का खतरा भी रहेगा। दक्षिणी चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया के हिस्सों में अल-नीनो के दौरान अचानक तेज बारिश देखी जाती है। इससे फसलें बर्बाद हो सकती हैं और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंच सकता है। एक तरफ सूखा और दूसरी तरफ बाढ़ दोनों ही स्थितियां आर्थिक नुकसान को बढ़ाएंगी। जलवायु परिवर्तन इस पूरे परिदृश्य को और जटिल बना रहा है। वैज्ञानिक अभी पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं कि ग्लोबल वार्मिंग अल-नीनो को कैसे प्रभावित करती है। ऐसे में विशेषज्ञ सलाह दे रहे हैं कि देश अपनी ऊर्जा व्यवस्था को विविध और टिकाऊ बनाएं। सौर और पवन ऊर्जा जैसे विकल्प भविष्य में ऐसे संकटों से बचाव का रास्ता बन सकते हैं।
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