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लाखों कमाने वाले कर्मचारियों को करना पड़ा कड़ा संघर्ष

नई दिल्ली। गूगल, मेटा, माइक्रोसॉफ्ट और इंटेल से निकाले गए कर्मचारियों को आर्थिक संकट के साथ अपनी पहचान और मानसिक स्थिति से भी जूझना पड़ा। मजबूत रिज्यूम होने के बावजूद कई महीनों तक नौकरी नहीं मिली और कुछ को सामान्य स्तर की नौकरियों के लिए भी आवेदन करना पड़ा। 

रिपोर्ट के मुताबिक 37 साल के ब्रिटनी बॉल ने मेटा में करीब पांच साल डॉक्यूमेंटेशन इंजीनियर के तौर पर काम किया। उनकी सालाना आय करीब 1.8 करोड़ रुपए थी। नौकरी जाने के बाद उन्होंने 8 हजार से ज्यादा कंपनियों में आवेदन दिए, लेकिन सफलता नहीं मिली। यहां तक कि टारगेट में कैशियर की नौकरी के लिए आवेदन किया, लेकिन रिटेल अनुभव नहीं होने से वहां भी चयन नहीं हुआ। खर्च चलाने के लिए उन्हें अपनी बचत इस्तेमाल करनी पड़ी और वॉशिंगटन डीसी छोड़कर दूसरी जगह जाना पड़ा। बाद में उन्होंने अपना स्टार्टअप शुरू किया। वहीं 25 साल के जेसन झांग गूगल में सॉफ्टवेयर इंजीनियर थे और सालाना करीब 1.9 करोड़ रुपए कमा रहे थे। नौकरी जाने के बाद करीब 30 जगह आवेदन दिए, लेकिन जवाब नहीं मिला। उन्होंने कंटेंट क्रिएशन और पर्सनल ब्रांडिंग शुरू की, जिसके बाद कंपनियां खुद उनसे संपर्क करने लगीं। माइक्रोसॉफ्ट में 23 साल काम कर चुके 62 साल के जो फ्रेंड करीब नौ महीने तक गहरे डिप्रेशन से जूझते रहे। नौकरी के बाद पहली बार उन्हें मेडिकल इंश्योरेंस का खर्च खुद उठाना पड़ा। उन्होंने बाद में रिटायरमेंट लेने का फैसला किया। इंटेल के पूर्व कर्मचारी रामकृष्ण को छह महीने में नई नौकरी मिलने की उम्मीद थी, लेकिन एक साल बाद भी सफलता नहीं मिली। उन्होंने खर्च घटाए और अंततः अपनी कंसल्टिंग फर्म शुरू की।

रिपोर्ट के मुताबिक इन कर्मचारियों का अनुभव बताता है कि नौकरी को ही आर्थिक सुरक्षा और पहचान का एकमात्र आधार नहीं बनाना चाहिए। विशेषज्ञों के मुताबिक एक से ज्यादा आय के स्रोत, पर्याप्त बचत, निवेश, स्वास्थ्य बीमा और पर्सनल ब्रांडिंग पर ध्यान देना जरूरी है। छंटनी के दौर में नौकरी का इंतजार करने के बजाय उद्यमिता और स्वतंत्र काम के विकल्प भी उपयोगी साबित हो सकते हैं।

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