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मनुष्य की आँखों में असमानता के आँसू

मनुष्य की आँखों में आए असमानता के ये आँसू केवल व्यक्तिगत पीड़ा के आँसू नहीं हैं; इनके पीछे सदियों की असमानता, अन्याय और वंचना की कहानी छिपी है। किसी की आँख में भूख का आँसू है, किसी की आँख में अपमान का, किसी की आँख में अधिकार छिन जाने का और किसी की आँख में उस समाज की पीड़ा है जिसने उसे जन्म के आधार पर छोटा कर दिया। सभ्यता आगे बढ़ती रही, लेकिन मनुष्य की आँखों से असमानता के आँसू पूरी तरह नहीं सूखे। प्रश्न यही है कि आखिर मनुष्य ने मनुष्य के लिए ऐसी दुनिया क्यों बनाई, जिसमें जन्म ही किसी की गरिमा और अवसर का निर्धारक बन गया ?  मनुष्य ने जब पहली बार आकाश की ओर देखा होगा, तब शायद उसके मन में यह प्रश्न उठा होगा कि इस विराट संसार में उसका स्थान क्या है। लाखों वर्षों तक भोजन एकत्र करते हुए खानाबदोश जीवन जीने के बाद, जब मनुष्य ने पहली बार आग जलाई होगी, नदी के किनारे अपना स्थायी बसेरा बनाया होगा और धरती में बीज डालकर अन्न उगाया होगा तब उसने शायद यह नहीं सोचा होगा कि एक दिन उसी धरती पर जन्म लेने वाले मनुष्यों के बीच कोई स्वामी होगा और कोई दास, कोई शासक होगा और कोई शासित, कोई ऊँचा कहलाएगा और कोई नीचा। प्रकृति ने मनुष्य को कहीं भी ऊँचा-नीचा लिखकर नहीं भेजा था। जन्म के समय किसी शिशु के माथे पर यह नहीं लिखा होता कि वह राजा बनेगा या प्रजा, पुरोहित होगा या श्रमिक, धनी होगा या निर्धन, पुरुष होगा तो स्वामी और स्त्री होगी तो अधीन। फिर यह विभाजन आया कहाँ से ? यही प्रश्न मानव समाज में असमानता की सबसे गहरी जड़ तक हमें ले जाता है।मानव सभ्यता का विकास जितना बाहरी संसार को जीतने की कहानी है, उतना ही यह मनुष्य द्वारा मनुष्य पर अधिकार स्थापित करने की कहानी भी है। प्रारम्भ में मनुष्य प्रकृति से संघर्ष करता था; बाद में उसने प्रकृति के संसाधनों पर अधिकार करना सीखा। भूमि उसकी आवश्यकता थी, फिर संपत्ति बन गई। अन्न जीवन का आधार था, फिर संचय का साधन बना। श्रम जीवन की स्वाभाविक क्रिया था, फिर किसी दूसरे की समृद्धि का साधन बन गया। धीरे-धीरे समाज में ऐसे लोग पैदा हुए जिनके पास अधिक भूमि थी, अधिक पशु थे, अधिक अन्न था, अधिक हथियार थे और अंततः अधिक सत्ता थी। दूसरी ओर ऐसे लोग भी थे जिनके पास अपना शरीर और अपना श्रम ही एकमात्र संपत्ति था।

यहीं से असमानता ने अपना पहला स्थायी घर बनाया।

लेकिन केवल धन और बल से कोई व्यवस्था सदियों तक कायम नहीं रहती। मनुष्य को यह विश्वास भी दिलाना पड़ता है कि जो व्यवस्था बनी है, वह उचित है, स्वाभाविक है और कभी-कभी तो स्वयं ईश्वर की इच्छा है। इसलिए सामाजिक असमानता के साथ-साथ उसे उचित ठहराने वाली कथाएँ, परंपराएँ, धार्मिक धारणाएँ और सामाजिक नियम भी विकसित हुए। कहीं जन्म को श्रेष्ठता का आधार बनाया गया, कहीं नस्ल को, कहीं वंश को, कहीं धर्म को, कहीं पुरुषत्व को और कहीं संपत्ति को। इस प्रकार असमानता केवल बाहर की व्यवस्था नहीं रही; वह धीरे-धीरे मनुष्य की चेतना में भी उतर गई।सबसे अधिक पीड़ा की बात यह है कि जिसने अन्याय को जन्म दिया, उसी ने कई बार उसके लिए नैतिकता भी गढ़ ली। जिसने किसी से उसका अधिकार छीना, उसने उसे उसका धर्म कह दिया; जिसने किसी को श्रम के लिए बाँधा, उसने उसे उसकी नियति कहा; जिसने स्त्री की स्वतंत्रता छीनी, उसने उसे मर्यादा का नाम दिया; जिसने किसी जाति या वर्ग को नीचे रखा, उसने उस दूरी को पवित्रता का रूप दे दिया। इस प्रकार असमानता केवल व्यवस्था नहीं रही—वह विश्वास बन गई। और जब अन्याय विश्वास बन जाता है, तब उसका विरोध केवल सत्ता से नहीं, मनुष्य की चेतना से भी करना पड़ता है।मनुष्य की इस लंबी यात्रा को समझने के लिए हमें धर्म, ईश्वर, संपत्ति, श्रम, सत्ता, स्त्री, जाति, वर्ग और ज्ञान—इन सभी को एक साथ देखना होगा। क्योंकि असमानता किसी एक व्यक्ति की बनाई हुई दीवार नहीं है; यह सदियों के अनुभवों, स्वार्थों, भय, विश्वासों और सत्ता-संबंधों से बनी हुई एक विशाल संरचना है।



1. धर्म और ईश्वर  :

              धर्म मनुष्य की सबसे प्राचीन आध्यात्मिक यात्राओं में से एक है। मृत्यु के रहस्य से भयभीत मनुष्य ने ईश्वर की कल्पना की, प्रकृति की शक्तियों के सामने सिर झुकाया और जीवन के अर्थ को समझने के लिए अदृश्य सत्ता का सहारा लिया। धर्म ने उसे केवल पूजा की विधि नहीं दी; उसने उसे जीवन का अर्थ, नैतिकता का आधार और मृत्यु के बाद की आशा भी दी। इसीलिए धर्म मनुष्य की आत्मा के बहुत निकट है। लेकिन जहाँ धर्म मनुष्य की आत्मिक आवश्यकता बनता है, वहीं उसका सामाजिक रूप सत्ता और व्यवस्था से जुड़ जाता है। यहीं से उसकी भूमिका जटिल हो जाती है।

ईश्वर की अवधारणा ने मनुष्य को विनम्र बनाया, लेकिन इतिहास के अनेक चरणों में ईश्वर के नाम की व्याख्या करने वाले मनुष्य स्वयं अत्यंत शक्तिशाली हो गए। मंदिर, चर्च, मस्जिद, मठ और अन्य धार्मिक संस्थाएँ केवल प्रार्थना के स्थान नहीं रहीं; अनेक समाजों में वे ज्ञान, संपत्ति, सामाजिक अनुशासन और सामुदायिक अधिकार के केन्द्र भी बनीं। जब किसी सामाजिक नियम के पीछे राजा की शक्ति होती है, तब उसके विरुद्ध विद्रोह संभव है; लेकिन जब वही नियम ईश्वर की इच्छा कह दिया जाए, तब उसके विरुद्ध प्रश्न उठाना पाप, अधर्म या धर्मविरोध तक घोषित किया जा सकता है।

इसी बिंदु पर धर्म और असमानता का ऐतिहासिक संबंध दिखाई देता है। यह कहना गलत होगा कि सभी धर्म असमानता के निर्माता थे; पर यह भी इतिहास से आँखें मूँद लेना होगा कि विभिन्न धर्मों की सामाजिक व्याख्याओं का उपयोग कई बार असमान व्यवस्थाओं को स्थायी बनाने में किया गया। धार्मिक आदर्श और धार्मिक संस्थाओं का ऐतिहासिक व्यवहार हमेशा एक जैसा नहीं रहा।

इसका सबसे करुण अध्याय स्त्री की कहानी है। मनुष्य की आधी आबादी—जिसने उसे जन्म दिया, पाला और सभ्यता के निर्माण में श्रम किया—अनेक समाजों में स्वयं अपने जीवन की स्वामिनी नहीं बन सकी। उसके शरीर पर परिवार का अधिकार हुआ, उसकी कामना पर मर्यादा का पहरा बैठा, उसकी शिक्षा सीमित की गई, उसकी संपत्ति पर नियंत्रण रखा गया और उसके जीवन के निर्णय पिता, पति या पुत्र के हाथों में सौंप दिए गए। कहीं उसे धार्मिक नेतृत्व से दूर रखा गया, कहीं उत्तराधिकार में कम अधिकार मिला, कहीं विवाह की संस्था में उसे असमान स्थिति मिली और कहीं उसकी स्वतंत्र इच्छा को परिवार की प्रतिष्ठा के नीचे दबा दिया गया।

सबसे विचित्र यह था कि इन व्यवस्थाओं को केवल पुरुषों की इच्छा के रूप में नहीं, बल्कि धर्म, परंपरा और पवित्र कर्तव्य के रूप में प्रस्तुत किया गया। स्त्री की अधीनता को कहीं उसकी मर्यादा कहा गया, कहीं उसका धर्म, कहीं उसकी पवित्रता। इस प्रकार सामाजिक असमानता धीरे-धीरे धार्मिक भाषा पहनती गई।कर्म-विभाजन भी इसी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बना। समाज में कामों का विभाजन स्वाभाविक आवश्यकता थी। कोई खेती करे, कोई धातु का काम करे, कोई वस्त्र बनाए, कोई शिक्षा दे, कोई व्यापार करे—यह अपने आप में असमानता नहीं है। असमानता तब जन्म लेती है जब काम करने वाले मनुष्य का मूल्य उसके काम से नहीं, उसके जन्म से तय किया जाने लगे। जब यह कहा जाने लगे कि अमुक व्यक्ति केवल इसलिए अमुक काम करेगा क्योंकि वह उसी परिवार या जाति में पैदा हुआ है, तब कर्म-विभाजन मनुष्य-विभाजन बन जाता है।

इस प्रकार जन्म ने योग्यता को पराजित किया और परंपरा ने स्वतंत्रता को। मनुष्य ने अपने हाथों से समाज बनाया, लेकिन उसी समाज ने उसके हाथों में जन्म की बेड़ियाँ डाल दीं।

फिर पवित्रता और अपवित्रता की धारणाएँ आईं। कुछ कार्य पवित्र हुए, कुछ अपवित्र; कुछ शरीर शुद्ध माने गए, कुछ अशुद्ध; कुछ मनुष्य धार्मिक अनुष्ठानों के अधिकारी बने और कुछ उनसे बाहर कर दिए गए। धर्म जब आत्मा का मार्गदर्शक था, तब वह मनुष्य को भीतर से जोड़ रहा था; लेकिन जब उसकी सामाजिक व्याख्या सत्ता की रक्षा करने लगी, तब वही धर्म मनुष्यों के बीच दूरी की दीवार भी बन सकता था।

फिर भी धर्म की पूरी कहानी अँधेरी नहीं है। लगभग हर महान आध्यात्मिक परंपरा के भीतर करुणा, न्याय, दया और मनुष्य की गरिमा की ऐसी धाराएँ भी मौजूद रहीं जिन्होंने असमानता को चुनौती देने की शक्ति दी। इसलिए प्रश्न धर्म के अस्तित्व का नहीं, बल्कि इस बात का है कि धर्म की व्याख्या मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है या उसे मनुष्य से दूर करती है।

2. संसाधनों का बँटवारा :

यदि धर्म ने असमानता को कई बार वैधता दी, तो उसके पीछे खड़ी सबसे ठोस शक्ति संसाधनों का असमान बँटवारा था। धरती सबकी थी, लेकिन भूमि पर अधिकार कुछ लोगों का हो गया। जल सबके लिए था, लेकिन जलस्रोतों पर अधिकार सीमित हुआ। जंगल सबके जीवन का आधार थे, लेकिन उन पर स्वामित्व स्थापित हुआ। अन्न सबकी आवश्यकता था, लेकिन उसके भंडार पर अधिकार रखने वाला व्यक्ति दूसरों के जीवन पर भी अधिकार रखने लगा।

संपत्ति ने मनुष्य को सुरक्षा दी, लेकिन संपत्ति के संचय ने समाज में शक्ति का असमान वितरण भी पैदा किया। जिसके पास अधिक था, वह अधिक खरीद सकता था; जो अधिक खरीद सकता था, वह अधिक श्रम खरीद सकता था; जो अधिक श्रम खरीद सकता था, वह अधिक संपत्ति अर्जित कर सकता था। इस प्रकार संपत्ति ने स्वयं को बढ़ाने की एक ऐसी व्यवस्था विकसित कर ली जिसमें गरीब की गरीबी और अमीर की समृद्धि दोनों पीढ़ियों तक चल सकती थीं।

भूमि से बँधा किसान, स्वामी से बँधा दास, सामंत से बँधा कृषक, कारखाने में कम मजदूरी पर काम करता श्रमिक—इतिहास में इनके रूप बदलते रहे, लेकिन मूल प्रश्न एक ही रहा: जो उत्पादन करता है, उसके पास उत्पादन के साधनों पर कितना अधिकार है?

प्राचीन दास-व्यवस्था ने मनुष्य को वस्तु तक बना दिया। सामंतवाद ने भूमि और राजनीतिक शक्ति को सीमित हाथों में केन्द्रित किया। औपनिवेशिक शासन ने महाद्वीपों की संपदा को साम्राज्यवादी शक्तियों की आर्थिक संरचना में प्रवाहित किया। आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था ने उत्पादन की शक्ति को कई गुना बढ़ाया, लेकिन पूँजी और श्रम के बीच नई दूरी भी पैदा की।

संसाधनों की असमानता केवल आर्थिक नहीं होती। शिक्षा पर अधिकार भी शक्ति है। ज्ञान पर अधिकार भी शक्ति है। कानून बनाने की शक्ति भी संसाधन है। शासन में भागीदारी भी संसाधन है। यदि किसी समाज में एक वर्ग पीढ़ियों तक शिक्षा से वंचित रहे और दूसरा वर्ग पीढ़ियों तक ज्ञान का स्वामी बना रहे, तो केवल यह कह देना कि दोनों कानून की दृष्टि से बराबर हैं, वास्तविक समानता नहीं पैदा करता।

इसीलिए असमानता का प्रश्न केवल रोटी का प्रश्न नहीं है। यह सम्मान का प्रश्न है, अवसर का प्रश्न है, आवाज का प्रश्न है और निर्णय लेने के अधिकार का प्रश्न है।

जिसके पास भूमि नहीं, वह मजदूर बन सकता है; जिसके पास शिक्षा नहीं, वह दूसरों पर निर्भर हो सकता है; जिसके पास राजनीतिक शक्ति नहीं, उसकी आवाज कमजोर हो सकती है। इस प्रकार आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक असमानताएँ एक-दूसरे को जन्म देती रहती हैं।

3. असमानता का प्रतिरोध

मनुष्य केवल अन्याय सहने वाला प्राणी नहीं है। उसके भीतर प्रश्न करने की एक ज्योति भी है। जब व्यवस्था ने कहा—“यही तुम्हारी नियति है”, तब किसी ने पूछा—“क्यों?” जब समाज ने कहा—“तुम जन्म से छोटे हो”, तब किसी ने कहा—“मनुष्य जन्म से छोटा कैसे हो सकता है?” और जब पवित्रता के नाम पर दीवारें खड़ी की गईं, तब किसी ने उन दीवारों के पार मनुष्य को खोजा।

बुद्ध ने जन्माधारित श्रेष्ठता के स्थान पर आचरण और साधना को महत्व दिया। उन्होंने मनुष्य के आध्यात्मिक मूल्य को उसके जन्म से अलग करके देखने का रास्ता खोला। महावीर की अहिंसा और जीव-मात्र के प्रति संवेदना ने भी मनुष्य की चेतना को व्यापक बनाया।

भारत की संत परंपरा में कबीर की आवाज किसी मंदिर या मस्जिद की दीवार में कैद नहीं होती। उनका प्रश्न मनुष्य से था—तुम बाहर ईश्वर को क्यों खोजते हो, जब भीतर मनुष्य ही मनुष्य से अलग हो गया है? उन्होंने धार्मिक आडंबर और सामाजिक अहंकार दोनों पर प्रहार किया। गुरु नानक ने भी मनुष्य की एकता को धार्मिक जीवन के केन्द्र में रखा और संगत-पंगत के माध्यम से बराबरी को व्यवहार में उतारने का प्रयास किया।

राजा राममोहन राय ने स्त्री के अधिकार और सामाजिक सुधार का प्रश्न उठाया। ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने विधवा-विवाह और स्त्री-शिक्षा के लिए संघर्ष किया। ज्योतिबा फुले ने जन्माधारित सामाजिक वर्चस्व के विरुद्ध अपनी लेखनी और कर्म दोनों से आवाज उठाई। सावित्रीबाई फुले ने उस समय लड़कियों को शिक्षा देने का साहस किया जब स्त्री की शिक्षा स्वयं सामाजिक विद्रोह मानी जाती थी। नारायण गुरु ने मनुष्य की समानता को सामाजिक चेतना का आधार बनाया। पेरियार ने जाति और सामाजिक वर्चस्व के विरुद्ध तर्क तथा आत्मसम्मान को हथियार बनाया।

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने असमानता के प्रश्न को उसकी सबसे गहरी संरचना में देखा। उनके लिए केवल किसी व्यक्ति का सद्भाव पर्याप्त नहीं था; ऐसी सामाजिक व्यवस्था को बदलना आवश्यक था जो जन्म के आधार पर मनुष्य की स्वतंत्रता और सम्मान को सीमित करती है। उन्होंने समानता को संविधान, कानून और लोकतांत्रिक अधिकारों के माध्यम से संस्थागत रूप देने की दिशा में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।

महात्मा गांधी ने अस्पृश्यता को सामाजिक और नैतिक कलंक माना तथा उसके विरुद्ध व्यापक अभियान चलाया। लेकिन गांधी और आंबेडकर की जाति-व्यवस्था को लेकर दृष्टियाँ एक जैसी नहीं थीं। आंबेडकर जहाँ जाति की संरचना के उन्मूलन की आवश्यकता पर बल देते थे, वहीं गांधी का रास्ता नैतिक परिवर्तन और सामाजिक सुधार से अधिक जुड़ा था। इतिहास की गंभीरता इसी में है कि हम दोनों के योगदान को समझते हुए उनके मतभेदों को भी ईमानदारी से स्वीकार करें।

नेहरू ने आधुनिक भारत में लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, शिक्षा और आधुनिक संस्थाओं के निर्माण को महत्व दिया। भारत के बाहर भी असमानता के विरुद्ध संघर्ष ने अनेक रूप लिए—दासता के उन्मूलन से लेकर श्रमिक अधिकारों तक और नागरिक अधिकार आंदोलनों से लेकर स्त्री के मताधिकार तक।

असमानता के विरुद्ध गैर-भुक्तभोगी आवाजें :

            असमानता की पीड़ा को केवल उन्हीं लोगों ने नहीं समझा, जिनके जीवन पर शोषण और भेदभाव के घाव थे। भारत के इतिहास में ऐसे अनेक लोग भी हुए जिन्होंने अपेक्षाकृत विशेषाधिकारपूर्ण सामाजिक पृष्ठभूमि से आने के बावजूद जाति, लिंग और सामाजिक ऊँच-नीच के विरुद्ध अपनी आवाज उठाई। राजा राममोहन राय उच्चवर्णीय ब्राह्मण परिवार से थे; फिर भी उन्होंने सती-प्रथा, स्त्री-वंचना और रूढ़ सामाजिक व्यवस्था को चुनौती दी। ईश्वरचंद्र विद्यासागर भी ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे, लेकिन उन्होंने विधवा-विवाह और स्त्री-शिक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित किया। महात्मा गांधी वैश्य (बनिया) परिवार में जन्मे थे; उन्होंने अस्पृश्यता के विरुद्ध व्यापक अभियान चलाया और उसे सामाजिक पाप कहा। जवाहरलाल नेहरू कश्मीरी ब्राह्मण परिवार से आते थे और अत्यंत सम्पन्न तथा शिक्षित वातावरण में पले-बढ़े, फिर भी उन्होंने आधुनिक भारत की कल्पना समान नागरिकता, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर की। इन उदाहरणों में विशेष महत्त्व इस बात का है कि उन्होंने अपनी सामाजिक स्थिति को दूसरों से श्रेष्ठ होने का अधिकार नहीं माना, बल्कि समाज में व्याप्त अन्याय को चुनौती देने का नैतिक दायित्व समझा।इसी परंपरा में डॉ. राममनोहर लोहिया, जो एक वैश्य (बनिया) परिवार में जन्मे थे, का नाम विशेष सम्मान से लिया जाना चाहिए। उन्होंने जाति-व्यवस्था और सामाजिक विषमता को भारतीय समाज की सबसे गहरी समस्याओं में माना और पिछड़े वर्गों तथा वंचित समुदायों की राजनीतिक और सामाजिक भागीदारी के लिए संघर्ष किया। उनका प्रसिद्ध आग्रह था कि सत्ता और अवसर समाज के उन वर्गों तक भी पहुँचने चाहिए जिन्हें सदियों से उनसे दूर रखा गया। इसी व्यापक परंपरा में आचार्य विनोबा भावे, जो ब्राह्मण परिवार से थे, ने भूदान और ग्रामदान के माध्यम से भूमि और संसाधनों के अधिक न्यायपूर्ण वितरण का प्रयास किया। स्वामी दयानंद सरस्वती, जो ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे, ने अनेक रूढ़ियों और सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया। विश्व इतिहास में अब्राहम लिंकन, जो स्वयं दास नहीं थे और श्वेत अमेरिकी समाज से आते थे, दासप्रथा के विरुद्ध संघर्ष के महान राजनीतिक प्रतीक बने; विलियम विल्बरफोर्स, जो ब्रिटिश अभिजात वर्ग से आते थे, उन्होंने दास-व्यापार के उन्मूलन के लिए वर्षों संघर्ष किया। इन लोगों ने दिखाया कि किसी अन्याय का विरोध करने के लिए स्वयं उसका भुक्तभोगी होना अनिवार्य नहीं है।मानव सभ्यता की यह परंपरा इसलिए महान है कि इसमें मनुष्य अपने जन्म की सीमाओं को पार करके विवेक का मनुष्य बनता है। शोषित व्यक्ति अन्याय को अपने अनुभव से पहचानता है, लेकिन जो व्यक्ति स्वयं शोषित न होते हुए भी शोषण के विरुद्ध खड़ा होता है, वह अपनी सुविधा, अपने वर्ग और कभी-कभी अपने ही समाज के विरुद्ध जाने का साहस करता है। उसने यह नहीं पूछा—“पीड़ित कौन है?” उसने पूछा—“क्या उसके साथ अन्याय हो रहा है?” यही प्रश्न मनुष्य को उसकी जाति, वर्ग, धर्म और राष्ट्रीयता से ऊपर उठाकर मानवता के धरातल पर ले जाता है। इतिहास के ये लोग हमें यह सिखाते हैं कि मनुष्यता का सर्वोच्च प्रमाण यह नहीं कि हमने अपने ऊपर हुए अन्याय का विरोध किया, बल्कि यह है कि हमने दूसरे के साथ हो रहे अन्याय को देखकर भी मौन रहने से इनकार कर दिया। दूसरे की आँख से निकला आँसू अपनी आत्मा पर महसूस करना और उसके अधिकार के लिए खड़ा हो जाना ही वह चेतना है, जिससे सभ्यता आगे बढ़ती है।

इस प्रकार इतिहास में असमानता के विरुद्ध संघर्ष किसी एक धर्म, जाति, देश या व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह मनुष्य की आत्मा की वह बेचैनी है जो अन्याय को देखकर कहती है—“मनुष्य को मनुष्य से छोटा मत बनाओ।

4. असमानता की वर्तमान स्थिति

आज मनुष्य ने समानता को कानून का सिद्धांत बना दिया है, लेकिन जीवन का सत्य अभी भी पूरी तरह समान नहीं हुआ। आधुनिक संविधान नागरिकों को बराबर अधिकार देते हैं, मानवाधिकारों की घोषणाएँ मनुष्य की गरिमा को सार्वभौमिक मानती हैं और लोकतंत्र हर व्यक्ति के मत को समान मूल्य देता है। फिर भी संसार में जन्म लेने वाला प्रत्येक मनुष्य समान अवसर लेकर जीवन में प्रवेश नहीं करता।किसी बच्चे का जन्म एक ऐसे घर में होता है जहाँ अच्छी शिक्षा, पुस्तकें, पोषण और सुरक्षित वातावरण उपलब्ध हैं; किसी दूसरे बच्चे का जन्म ऐसे घर में होता है जहाँ आज का भोजन ही सबसे बड़ी चिंता है। दोनों बच्चे समान मनुष्य हैं, लेकिन उनके जीवन की शुरुआती सीढ़ियाँ समान नहीं हैं।आज असमानता ने अपना रूप बदल लिया है। वह हमेशा खुले भेदभाव के रूप में दिखाई नहीं देती। वह कभी अवसरों की कमी बनकर आती है, कभी शिक्षा की दूरी बनकर, कभी रोजगार की असुरक्षा बनकर, कभी जातीय या नस्ली पूर्वाग्रह बनकर, कभी स्त्री के अदृश्य श्रम के रूप में और कभी धन तथा राजनीतिक प्रभाव के अत्यधिक केंद्रीकरण के रूप में।तकनीक ने दुनिया को जोड़ा है, लेकिन उसने एक नई खाई भी पैदा की है। जिसके पास ज्ञान, डिजिटल साधन और तकनीकी क्षमता है, उसके सामने अवसरों की दुनिया विस्तृत है; जिसके पास ये साधन नहीं हैं, वह आधुनिक व्यवस्था में पीछे छूट सकता है। अर्थात पुरानी असमानताओं के ऊपर नई असमानताएँ भी निर्मित हो रही हैं।

सबसे गहरी विडंबना यह है कि आज मनुष्य कानूनी रूप से बराबर है, लेकिन जीवन की परिस्थितियों में बराबर नहीं। मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा का पहला अनुच्छेद कहता है कि सभी मनुष्य स्वतंत्र और समान गरिमा तथा अधिकारों के साथ जन्म लेते हैं।  लेकिन घोषणा और वास्तविकता के बीच की दूरी ही आज की सबसे बड़ी चुनौती है।

इसलिए आज असमानता का प्रश्न केवल यह नहीं है कि किसके पास कितना धन है। प्रश्न यह है कि किसके पास अवसर है, किसके पास ज्ञान है, किसके पास निर्णय लेने की शक्ति है, किसकी आवाज सुनी जाती है और किसका श्रम सम्मान पाता है।

मानव सभ्यता ने समुद्र की गहराइयाँ नाप लीं, आकाश की सीमाएँ पार कर लीं और चंद्रमा तक पहुँच गई। उसने ऐसी मशीनें बना लीं जो मनुष्य की भाषा समझने लगी हैं। लेकिन अभी तक वह मनुष्य के भीतर बैठी उस भावना को पूरी तरह पराजित नहीं कर पाई है जो दूसरे मनुष्य को छोटा समझती है।

शायद सभ्यता की सबसे बड़ी परीक्षा यही है।

क्योंकि सभ्यता की ऊँचाई उसकी इमारतों से नहीं, उसके सबसे कमजोर मनुष्य की गरिमा से मापी जानी चाहिए। यदि एक मनुष्य भूखा है और दूसरा अन्न के पहाड़ पर बैठा है, यदि एक बच्चे के हाथ में पुस्तक नहीं और दूसरे के पास ज्ञान के सारे द्वार खुले हैं, यदि एक स्त्री अपने जीवन का निर्णय स्वयं नहीं कर सकती, यदि कोई मनुष्य केवल जन्म के कारण अपमानित होता है—तो हमारी प्रगति अभी अधूरी है।

अंततः असमानता केवल समाज की समस्या नहीं, मनुष्य की आत्मा पर लगा हुआ प्रश्नचिह्न है।

हमने प्रकृति को जीतने का दावा किया है; अब समय है कि हम अपने भीतर की श्रेष्ठता, स्वार्थ और विभाजन की वृत्तियों पर विजय प्राप्त करें। जिस दिन मनुष्य दूसरे मनुष्य में अपना ही चेहरा देख सकेगा, जिस दिन जन्म किसी की गरिमा का निर्धारक नहीं होगा, जिस दिन श्रम को सम्मान और अवसर को न्याय मिलेगा, उसी दिन शायद सभ्यता वास्तव में सभ्य कहलाने योग्य होगी।

क्योंकि मनुष्य की सबसे बड़ी विजय यह नहीं कि उसने संसार को अपने अधीन कर लिया—सबसे बड़ी विजय तब होगी, जब वह मनुष्य को मनुष्य के अधीन करने की अपनी आदत से मुक्त हो जाएगा।

5. भविष्य का धर्म, ईश्वर में विश्वास और सामाजिक असमानता से मुक्ति

भविष्य के मनुष्य के सामने सबसे गहरा प्रश्न यह नहीं होगा कि ईश्वर है या नहीं, बल्कि यह होगा कि ईश्वर में विश्वास ने मनुष्य को कितना मनुष्य बनाया। विज्ञान ब्रह्मांड की दूरस्थ आकाशगंगाओं तक पहुँच जाएगा, मनुष्य पदार्थ के सूक्ष्मतम कणों को जान लेगा और संभव है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता उसकी अपनी बुद्धि को चुनौती देने लगे; फिर भी उसके भीतर वह पुरातन जिज्ञासा जीवित रहेगी—मैं कौन हूँ, यह जीवन क्यों है और इस अनंत सृष्टि में मेरे अस्तित्व का अर्थ क्या है? शायद ईश्वर की खोज भी इसी प्रश्न की छाया है। इसलिए भविष्य का मनुष्य यदि ईश्वर में विश्वास रखेगा, तो वह ऐसा ईश्वर खोजे जो मनुष्य को बाँटे नहीं, जोड़ता हो; जो किसी जाति, नस्ल, लिंग, भाषा या सम्प्रदाय की सीमा में कैद न हो। यदि एक ही सृष्टि ने हमें जन्म दिया है, तो किसी मनुष्य का जन्म उसे दूसरे मनुष्य से ऊँचा कैसे बना सकता है? तब धर्म की सार्थकता मंदिर की ऊँचाई, मस्जिद की भव्यता या चर्च की विशालता में नहीं, बल्कि उस क्षण में होगी जब मनुष्य किसी दूसरे मनुष्य के आँसू को अपना आँसू समझ सकेगा। ईश्वर में आस्था यदि मनुष्य में करुणा नहीं जगाती, तो वह केवल विश्वास है; और यदि वह करुणा को जन्म देती है, तभी वह दर्शन और अध्यात्म बनती है।

भविष्य का धर्म अपने सबसे कठिन प्रश्न का सामना राजनीति के द्वार पर करेगा। आस्था जब मनुष्य की अंतरात्मा में रहती है तो वह प्रकाश है; लेकिन जब उसे सत्ता की सीढ़ी बना दिया जाता है, तो वही प्रकाश धुआँ बन सकता है। इतिहास ने देखा है कि ईश्वर के नाम पर मनुष्य ने प्रार्थना भी की है और युद्ध भी; मंदिरों में सिर भी झुकाया है और उन्हीं पवित्र प्रतीकों के नाम पर मनुष्यों के बीच दीवारें भी खड़ी की हैं। इसलिए आने वाले समाज को धर्म से मुक्ति नहीं, धर्म के राजनीतिक दुरुपयोग से मुक्ति की आवश्यकता होगी। राज्य का काम यह तय करना नहीं होगा कि नागरिक किस ईश्वर को माने, किस पुस्तक को पवित्र समझे या किसी ईश्वर को माने भी या नहीं; उसका धर्म केवल इतना होगा कि हर मनुष्य की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करे। मंदिर में बजती घंटी, मस्जिद से उठती अज़ान, चर्च की प्रार्थना, गुरुद्वारे का कीर्तन और एक नास्तिक मनुष्य का मौन—इन सबके बीच लोकतंत्र को समान दूरी नहीं, बल्कि समान सम्मान का भाव रखना होगा। क्योंकि जिस क्षण सत्ता किसी एक आस्था को अपना हथियार बना लेती है, उस क्षण धर्म की आत्मा राजनीति की कैद में चली जाती है।

और शायद भविष्य के धर्म की सबसे बड़ी क्रांति यही होगी कि वह मनुष्य की पहचान पूछने से पहले उसकी पीड़ा को पहचानेगा। वह यह नहीं पूछेगा कि तुम्हारा मंदिर कहाँ है, तुम्हारी मस्जिद कौन-सी है, तुम्हारी प्रार्थना किस भाषा में है; वह पूछेगा—क्या तुम्हारे भीतर दूसरे मनुष्य के लिए स्थान है? तब धर्म का अर्थ किसी दूसरे को पराजित करना नहीं, अपने भीतर के अहंकार को पराजित करना होगा। ईश्वर की खोज आकाश में दूर किसी अदृश्य सत्ता की खोज भर नहीं रहेगी; वह भूखे मनुष्य की आँखों में, पीड़ित की कराह में, स्त्री की स्वतंत्रता में, श्रमिक के पसीने में और उस हाथ में दिखाई देगी जो बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के दूसरे हाथ को थाम लेता है। तब शायद मनुष्य समझ सकेगा कि संसार में सबसे पवित्र वस्तु कोई पत्थर, भवन या प्रतीक नहीं, मनुष्य की गरिमा है। उस दिन धर्म असमानता की दीवारों का प्रहरी नहीं, समानता की राह का दीपक होगा; ईश्वर सत्ता का औजार नहीं, करुणा का आकाश होगा; और मनुष्य का सबसे बड़ा धार्मिक कर्म यही होगा कि वह दूसरे मनुष्य को कभी छोटा न समझे। शायद उसी दिन सभ्यता पहली बार यह कहने योग्य होगी कि उसने ईश्वर को नहीं पाया—उसने ईश्वर के अर्थ को मनुष्य में पा लिया।

भविष्य का मनुष्य शायद उस दिन की कल्पना कर सकेगा जब धरती पर खींची गई राष्ट्रीय सीमाएँ मनुष्यों के बीच दीवार नहीं, केवल प्रशासनिक रेखाएँ रह जाएँगी। आज जन्म का संयोग यह तय कर देता है कि कौन भारतीय है, कौन पाकिस्तानी, कौन चीनी, कौन अमेरिकी, कौन अफ्रीकी या यूरोपीय; जबकि पृथ्वी ने किसी मनुष्य के माथे पर कोई राष्ट्रीय मुहर लगाकर उसे जन्म नहीं दिया। नदियाँ सीमा नहीं जानतीं, हवाएँ पासपोर्ट नहीं माँगतीं, सूर्य किसी राष्ट्र के लिए अलग प्रकाश नहीं देता और मृत्यु किसी सीमा पर रुकती नहीं। फिर मनुष्य ने अपने ही ग्रह को टुकड़ों में बाँटकर उन टुकड़ों को अपनी अंतिम पहचान क्यों बना लिया? भविष्य की चेतना शायद यह समझेगी कि राष्ट्र आवश्यक राजनीतिक व्यवस्थाएँ हो सकते हैं, लेकिन मानवता उनसे कहीं बड़ी है। जिस प्रकार धर्म मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का माध्यम बन सकता है, उसी प्रकार राष्ट्र भी सहयोग और सामूहिक जीवन का साधन हो सकता है; लेकिन जब राष्ट्रवाद मनुष्य की सार्वभौमिक पहचान से बड़ा हो जाता है, तब सीमा सुरक्षा के नाम पर भय, घृणा और युद्ध जन्म ले सकते हैं। भविष्य की दुनिया को ऐसी राजनीति की आवश्यकता होगी जिसमें देश अपनी विशिष्टता और स्वतंत्रता बनाए रखते हुए भी यह स्वीकार करें कि पृथ्वी किसी एक राष्ट्र की संपत्ति नहीं है। जलवायु, समुद्र, वायु, महामारी, विज्ञान, तकनीक और मानव सुरक्षा—इनमें से किसी की कोई वास्तविक राष्ट्रीय सीमा नहीं होती। इसलिए आने वाले समय का मनुष्य शायद “मैं किस देश का हूँ” के साथ-साथ यह कहना सीखेगा—“मैं पृथ्वी का नागरिक हूँ।” शायद वह दिन मानव सभ्यता की सबसे बड़ी नैतिक उपलब्धियों में से एक होगा, जब सीमा की रक्षा से अधिक महत्व मनुष्य की रक्षा को मिलेगा; जब पासपोर्ट से पहले मनुष्यता पहचानी जाएगी; जब किसी दूसरे देश में जन्म लेना किसी मनुष्य को पराया नहीं बनाएगा। तब राष्ट्र समाप्त होना आवश्यक नहीं होगा, लेकिन राष्ट्रों के बीच वह मानसिक दीवार टूट सकती है जिसने सदियों तक मनुष्य को मनुष्य के विरुद्ध खड़ा किया। धरती एक होगी, आकाश एक होगा और मनुष्य की मूल पहचान—मनुष्य होना—उसकी सबसे बड़ी नागरिकता होगी।

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