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फोकस करने की क्षमता हो रही कम

नई दिल्ली। आजकल सोशल मीडिया पर घंटों शॉर्ट वीडियो देखने जैसे गंभीर मुद्दे पर चेतावनी जारी करते हुए मशहूर हैल्थ विशेषज्ञ ने बताया है कि लगातार शॉर्ट वीडियो देखने से दिमाग की फोकस करने और जानकारी को प्रोसेस करने की क्षमता कमजोर हो जाती है। विशेषज्ञ के अनुसार, हालांकि ब्रेन रॉट कोई वैज्ञानिक शब्द नहीं है, फिर भी यह स्पष्ट है कि स्क्रीन के सामने अत्यधिक समय बिताना और तेजी से डिजिटल जानकारी का सेवन दिमाग के लिए नुकसानदायक है। शॉर्ट वीडियो, अपनी चमकीली तस्वीरों, तेजी से बदलते ट्रांजीशन, आकर्षक संगीत और अंतहीन स्क्रॉलिंग के साथ, हर कुछ सेकंड में दिमाग को एक नया डोज देते हैं। दिमाग को इस तरह हर पल अपडेट पाने की आदत हो जाती है, जिसका सीधा असर हमारी एकाग्रता और सोचने की क्षमता पर पड़ता है। परिणामस्वरूप, ऐसे कार्यों पर ध्यान केंद्रित करना मुश्किल हो जाता है जिनमें गहन विचार और लंबे समय तक ध्यान देने की आवश्यकता होती है। छात्र या पेशेवर लोग अक्सर महसूस करते हैं कि पढ़ते या काम करते समय उनका ध्यान कितनी आसानी से भटक जाता है और वे बार-बार अपना फोन चेक करने लगते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि दिमाग को मिली जानकारी को प्रोसेस करने और उसे लॉन्ग-टर्म मेमोरी में स्टोर करने के लिए पर्याप्त समय की आवश्यकता होती है।

 हालांकि, लगातार स्क्रॉल करते रहने से इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया के लिए बहुत कम समय मिल पाता है। एक के बाद एक वीडियो आते रहते हैं, जिससे दिमाग के पास जानकारी को ठीक से सहेजने का मौका नहीं मिलता। इसी कारण अक्सर यह महसूस होता है कि आपने भले ही एक घंटा वीडियो देखने में बिता दिया हो, लेकिन आपको देखी गई कोई भी खास चीज याद नहीं रहती। अनुसंधान से पता चला है कि शॉर्ट वीडियो का बहुत अधिक उपयोग तनाव, चिंता, नींद की समस्याओं और काम करने की क्षमता में कमी का कारण बन सकता है। इसके अलावा, सोशल मीडिया पर अक्सर अत्यधिक फिल्टर किए गए और अवास्तविक जीवनशैली को देखने से दूसरों से अपनी तुलना करने की भावना बढ़ सकती है, जिससे असुरक्षा और आत्म-सम्मान में कमी जैसी मनोवैज्ञानिक समस्याएं पैदा होती हैं। 

देर रात तक रील्स स्क्रॉल करना विशेष रूप से हानिकारक हो सकता है, क्योंकि स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी और लगातार मानसिक गतिविधि नींद में बाधा डालती है, जो दिमाग के सही ढंग से काम करने और मूड को स्थिर रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है। अच्छी खबर यह है कि इन नकारात्मक प्रभावों को स्वस्थ ऑनलाइन आदतों को अपनाकर ठीक किया जा सकता है। इसमें स्क्रीन-टाइम की एक निश्चित सीमा तय करना, गैर-जरूरी नोटिफिकेशन को बंद करना और खाना खाते समय या सोने से पहले फोन का उपयोग न करना शामिल है। ईरान की दो टूक- अमेरिका अपनी कमजोरियां छिपाने बना रहा कहानी


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