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प्रयत्न में ऊब नहीं

संसार में ऊबना बाद में आता है, प्रयत्न में ऊब नहीं आती। इसलिए संसार में लोग गति करते चले जाते हैं। पर परमात्मा में प्रयत्न में ऊब आती है और प्रयत्न पहले ही उबा देगा, तो आप रुक जाएंगे। कितने लोग हैं जो प्रभु की यात्रा शुरू भर करते हैं, पर कभी पूरी नहीं कर पाते। कितनी बार तय किया कि स्मरण कर लेंगे प्रभु का घड़ीभर! एकाध दिन, दो दिन। फिर ऊब गए। फिर छूट गया। कितने संकल्प, कितने निर्णय, धूल होकर पड़े हैं चारों तरफ! लोग कहते हैं कि ध्यान से कुछ हो सकेगा?  मैं कहता हूं जरूर हो सकेगा। कठिनाई सिर्फ एक है, सातत्य! कितने दिन कर सकोगे? मुश्किल से कोई मिलता है, जो तीन महीने भी सतत कर पाता है। दस-पांच दिन बाद ऊब जाता है!  

आश्चर्य है कि मनुष्य जिंदगी भर अखबार पढ़कर नहीं ऊबता, रेडियो सुनकर नहीं ऊबता, फिल्म देखकर नहीं ऊबता, रोज वही बातें करके नहीं ऊबता। ध्यान करके क्यों ऊब जाता है? आखिर ध्यान में ऐसी क्या कठिनाई है! कठिनाई एक ही है कि संसार की यात्रा पर प्रयत्न नहीं उबाता, प्राप्ति उबाती है और परमात्मा की यात्रा पर प्रयत्न उबाता है, प्राप्ति कभी नहीं उबाती। जो पा लेता है, वह फिर कभी नहीं ऊबता। बुद्ध ज्ञान के बाद चालीस साल जिंदा थे। चालीस साल किसी ने एक बार उन्हें अपने ज्ञान से ऊबते हुए नहीं देखा। कोहनूर हीरा मिल जाता 2369?भूति खोकर गृह-कलह के बीज बो दिए। शक्ति के सहारे सत्ता का संचालन होता तो न रावण मारा जाता और न कौरवों को पराजय का मुंह देखना पड़ता। पिछली सदी तक भारत का शासन-सूत्र अंग्रेज संभाल रहे थे, शक्ति की उनके पास कमी नहीं थी। उनके सामने भारत छोड़ने की विवशता शक्ति की कमी से नहीं थी। ये प्रसंग प्रमाणित करते हैं कि प्रबुद्ध जनता केवल शक्ति के आधार पर शासित नहीं हो सकती।  

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