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1980 के दशक के अंत से लेकर 1992 के राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान, विभिन्न अभियानों जिसमें- राम रथ यात्रा, शिला पूजन, कार सेवा, रामशिला संग्रह, मंदिर आंदोलन की जनजागरण यात्राओं, बाद के वर्षों में मंदिर निर्माण, निधि समर्पण अभियान के माध्यम से देशभर से बड़ी मात्रा में धन, आभूषण और अन्य सामग्री एकत्र की गई थी। इन अभियानों का संचालन मुख्य रूप से विश्व हिंदू परिषद तथा उसके सहयोगी संगठनों और आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं द्वारा समय-समय पर किया गया था। देश भर के करोड़ों लोगों ने समय-समय पर हजारों करोड़ों रुपए का दान दिया है। समय-समय पर विपक्षी दलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और नागरिक संगठनों ने चंदा चोरी जैसे आरोप लगाए। इन अभियानों में एकत्र किए गए कुल चंदे, उसके उपयोग और राशि को सार्वजनिक नहीं किया गया। विश्व हिंदू परिषद और सहयोगी संगठनों ने इसका लेखा-जोखा कभी सार्वजनिक नहीं किया। इस मामले ने तब तूल पकड़ा था, जब निर्माेही अखाड़े ने 1400 करोड़ रुपए का आरोप लगाया, बाद में इसे दबा दिया गया। आलोचकों का कहना रहा, कि राम मंदिर आंदोलन और निर्माण के नाम पर जन सहभागिता से बार-बार जुटाया गया धन था, इसकी पारदर्शी ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक होनी चाहिए थी। दूसरी ओर, विश्व हिंदू परिषद और आंदोलन से जुड़े नेताओं ने इन आरोपों को कई बार खारिज किया। उनका कहना है, आंदोलन के दौरान प्राप्त सहयोग का उपयोग जनजागरण, संगठन विस्तार, कार्यक्रमों के संचालन, न्यायालयीन लड़ाई, कारसेवकों की व्यवस्थाओं तथा अन्य गतिविधियों में खर्च किया गया। उनका यह भी कहना था, प्रत्येक अभियान का स्वरूप अलग था। सभी दान मंदिर निर्माण के लिए ही नहीं थे।
वर्ष 2020-21 में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा चलाए गए निधि समर्पण अभियान के दौरान भी देश और विदेश के करोड़ों परिवारों से सहयोग राशि संघ के विभिन्न संगठनों द्वारा एकत्र की गई है। इस अभियान में ट्रस्ट ने समय-समय पर प्राप्त राशि के बारे में जानकारी दी है। राम मंदिर के चढ़ावे और दान की चोरी का जो मामला हाल में सामने आया है, जमीन खरीदी में बड़े-बड़े घोटाले के दस्तावेजी आरोप लगाए जा रहे हैं। इसके बाद से देश भर में राम मंदिर आंदोलन और राम मंदिर निर्माण के लिए जो राशि एकत्रित की गई है, जो राशि खर्च की गई है, उसका ऑडिट और मद-वार खर्च का विवरण सार्वजनिक करने की मांग देश भर में तेज होती जा रही है।
उल्लेखनीय है, अब तक किसी सक्षम न्यायालय या सरकारी जांच एजेंसी ने यह निष्कर्ष नहीं दिया है, जिसमे राम मंदिर आंदोलन के दौरान जुटाए गए चंदे का व्यापक स्तर पर संकलन अथवा दुरुपयोग के दस्तावेज सामने नहीं आए हैं, सिद्ध हुआ है।
यह तथ्य है, आंदोलन के शुरुआती वर्षों में विभिन्न अभियानों के माध्यम से प्राप्त कुल धनराशि का विवरण सार्वजनिक और विस्तृत लेखा-जोखा उपलब्ध कराया जाना चाहिए, समय-समय पर विवाद और सवाल उठते रहे हैं। राम मंदिर निर्माण के लिए जो ट्रस्ट बनाया गया है, उसके सभी पदाधिकारी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुवांशिक संगठन और विश्व हिंदू परिषद से जुड़े हुए हैं। मंदिर निर्माण के बाद से जो भी गतिविधियां हो रही हैं उसमें संघ से जुड़े लोगों की गतिविधियों के कारण अब इस मामले ने तूल पकड़ लिया है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में बड़े सार्वजनिक अभियानों के लिए पारदर्शिता और जवाबदेही विश्वास को मजबूत करती है। अब यह मामला संघ और उसके सहयोगी संगठन से जुड़ गया है। अयोध्या का राम मंदिर संघ परिवार का है, या जनता के चंदे और दान से बनाया गया है, इस पर भी सवाल उठने लगे हैं। समर्थकों और आलोचकों, दोनों के बीच यह मांग उठने लगी है। वर्तमान में जो स्थिति बन गई है उसको देखते हुए यह आवश्यक हो गया है। संघ परिवार के ऊपर जिस तरह से आरोप लगाए जा रहे हैं। राम मंदिर में डकैती और लूट जैसे शब्दों का उपयोग किया जा रहा है।
कर्नाटक में संघ के पंजीयन को लेकर एक अलग विवाद शुरू हो चुका है। ऐसी स्थिति में संघ को विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए सभी लेन-देन को सार्वजनिक करने और यदि उसमें कोई गड़बड़ी हुई है, तो गड़बड़ी करने वाले दोषियों को दंडित करने की दिशा में स्वयं आगे आना होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो आने वाले समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और सभी अनुवांशिक संगठनों के क्रियाकलाप पर प्रश्न चिन्ह लगना स्वाभाविक है। उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार इस मामले में किस तरह का रुख अपनाती है इसको लेकर भी आम जनता के बीच में तरह-तरह की चर्चा हो रही हैं। अयोध्या का राम मंदिर करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ा हुआ है। देश और विदेश के लोगों ने अपनी आस्था और विश्वास के कारण अरबों रुपए दान और चढावे के रूप में राम मंदिर को दिए हैं। इस तरह के भी आरोप सामने आ रहे हैं। राम मंदिर के दान और चढावे का पैसा विश्व हिंदू परिषद और संघ तक गया है। इस आरोप को मिटाने के लिए केंद्र सरकार राज्य सरकार और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ विचार करना होगा। यह राजनीतिक विषय नहीं है, यह आस्थाओं से जुड़ा हुआ धार्मिक मामला है। इसका दीर्घकालिक असर होना तय है।
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