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रामलीला मैदान से लोकतंत्र की हुंकार

दिल्ली का रामलीला मैदान 1 नवंबर 2026 को एक बार फिर भारतीय राजनीति के केंद्र में था। इंडिया गठबंधन की महारैली केवल विपक्षी दलों का शक्ति प्रदर्शन नहीं थी, बल्कि मतदाता सूची, चुनावी पारदर्शिता, निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता और नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर उठे सवालों का राष्ट्रीय मंच भी थी। वोट बचाओ, देश बचाओ के नारे के साथ आयोजित इस रैली में उमड़ी भीड़ ने यह संकेत दिया कि विपक्ष चुनावी प्रक्रिया से जुड़े विवाद को संसद और राजनीतिक बयानबाजी से आगे ले जाकर जनांदोलन का रूप देना चाहता है।

रैली में राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव सहित विभिन्न राज्यों के नेताओं की मौजूदगी ने इसे व्यापक राजनीतिक स्वरूप दिया। अलग-अलग विचारधाराओं और क्षेत्रीय हितों वाले दलों का एक मंच पर आना अपने आप में महत्वपूर्ण था। इस आयोजन में बिहार कांग्रेस के नेताओं और पिछड़ा वर्ग विभाग के पदाधिकारियों की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही। रैली की प्रमुख तस्वीर राहुल गांधी की रही। भारी भीड़ के कारण पदयात्रा के बजाय वे खुले वाहन से रामलीला मैदान पहुंचे। उनके साथ प्रियंका गांधी और दूसरे विपक्षी नेता भी थे। सड़कों पर उमड़े कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच खुले वाहन से नेताओं का आगे बढ़ना जनसंपर्क और शक्ति प्रदर्शन का प्रतीक बना।

राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर कथित वोट चोरी के मुद्दे को लेकर तीखा हमला किया। उनका आरोप था कि मतदाता सूची में गड़बड़ियों के माध्यम से लोकतांत्रिक अधिकारों को कमजोर किया जा रहा है। राहुल गांधी का कहना था कि यदि योग्य नागरिकों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाते हैं तो चुनाव की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े होंगे।

उनके भाषण का राजनीतिक संदेश स्पष्ट था। कांग्रेस इस मुद्दे को केवल निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि इसे संविधान, नागरिक अधिकार और सत्ता की जवाबदेही से जोड़ रही है। हालांकि विपक्ष के आरोपों को प्रमाणित तथ्य मानने के बजाय उनकी स्वतंत्र जांच और आयोग के जवाब के संदर्भ में देखना जरूरी है।

इस महारैली का एक अलग और आकर्षक दृश्य पूर्णिया के निर्दलीय सांसद पप्पू यादव (राजेश रंजन) का तिरंगा मार्च रहा। वे हजारों साधु-संतों और समर्थकों के साथ रामलीला मैदान पहुंचे। हिमाचल भवन और कनॉट प्लेस से मिंटो ब्रिज होते हुए आगे बढ़े इस काफिले में साधु-संतों और कार्यकर्ताओं के हाथों में राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा था।

पप्पू यादव ने आंदोलन को लोकतंत्र, संविधान और आम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा से जोड़ते हुए केंद्र सरकार और भाजपा पर तीखे राजनीतिक हमले किए। उन्होंने कहा कि यह लड़ाई किसी एक राजनीतिक दल या व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था और आम लोगों के अधिकारों को बचाने के लिए है।

इस मार्च का महत्व केवल उसमें शामिल लोगों की संख्या में नहीं था। साधु-संतों की भागीदारी ने राजनीतिक विरोध को व्यापक सामाजिक स्वरूप देने का प्रयास किया। भारतीय राजनीति में धार्मिक-सामाजिक समूहों की सार्वजनिक भागीदारी का अपना इतिहास है। इस अवसर पर तिरंगा लेकर उनका मताधिकार और संविधान से जुड़े सवालों पर मार्च करना एक अलग संदेश दे रहा था। पप्पू यादव की इस पहल ने रैली में सामाजिक भागीदारी का एक नया पक्ष जोड़ा।

रामलीला मैदान की महारैली के संदर्भ में बिहार कांग्रेस की भागीदारी को विशेष महत्व देना चाहिए। बिहार की राजनीति में सामाजिक न्याय, पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व और राजनीतिक हिस्सेदारी हमेशा महत्वपूर्ण मुद्दे रहे हैं। ऐसे में बिहार प्रदेश कांग्रेस के ओबीसी विभाग के पदाधिकारियों की सक्रियता को केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम में भागीदारी के रूप में नहीं देखा जा सकता।

बिहार प्रदेश कांग्रेस ओबीसी विभाग की उपाध्यक्ष सोनी कुमारी, विभाग के अध्यक्ष अनुराग चंदन और मुंगेर जिला कांग्रेस कमेटी के ओबीसी प्रकोष्ठ अध्यक्ष राकेश कुमार मंडल की भूमिका इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। इन पदाधिकारियों के सामने चुनौती है कि राष्ट्रीय स्तर पर उठाए जा रहे लोकतांत्रिक अधिकारों और सामाजिक न्याय के सवालों को बिहार के गांवों, कस्बों और जिला मुख्यालयों तक पहुंचाएं।

सोनी कुमारी की भूमिका महिला प्रतिनिधित्व के सवाल से भी जुड़ती है। पिछड़े वर्ग की महिलाओं के सामने शिक्षा, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और राजनीतिक भागीदारी की अनेक चुनौतियां हैं। संगठन में महिलाओं की मौजूदगी तभी सार्थक होगी जब उन्हें निर्णय लेने और जनसंपर्क अभियान संचालित करने में वास्तविक भूमिका मिले। राजनीति में महिला प्रतिनिधित्व केवल पदों की संख्या नहीं, बल्कि नेतृत्व और अधिकार की भागीदारी भी है।

अनुराग चंदन के नेतृत्व में ओबीसी विभाग के सामने सामाजिक न्याय के मुद्दों को व्यापक राजनीतिक कार्यक्रम से जोड़ने की जिम्मेदारी है। जातीय जनगणना, आरक्षण, शिक्षा, रोजगार और आर्थिक अवसरों की समानता जैसे प्रश्नों पर संगठन को लगातार संवाद करना होगा। मतदाता सूची में किसी योग्य नागरिक का नाम छूटना भी सामाजिक न्याय से जुड़ा सवाल है, क्योंकि मताधिकार नागरिक की राजनीतिक पहचान और भागीदारी का आधार है।

मुंगेर जिला कांग्रेस कमेटी के ओबीसी प्रकोष्ठ अध्यक्ष राकेश कुमार मंडल की जिम्मेदारी भी इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय मंचों पर उठे सवालों को स्थानीय स्तर तक ले जाना जिला संगठनों का काम है। मतदाता सूची में नामों की जांच, नए मतदाताओं का पंजीकरण और नाम हटाए जाने से संबंधित शिकायतों में नागरिकों की सहायता जैसे कामों से ही यह अभियान व्यावहारिक रूप ले सकता है।

बिहार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजेश राम और बिहार प्रभारी कृष्णा अल्लावरू के नेतृत्व में प्रदेश संगठन के सामने भी यही चुनौती है। संगठनात्मक विस्तार के साथ पिछड़े, अति पिछड़े, दलित, महिला और युवा वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। बिहार कांग्रेस को गठबंधन की राजनीति के साथ अपनी स्वतंत्र संगठनात्मक पहचान और जमीनी सक्रियता भी मजबूत करनी होगी।विभिन्न प्रदेशों की भागीदारी और विपक्षी एकता

रामलीला मैदान की रैली की विशेषता विभिन्न राज्यों से आए नेताओं और कार्यकर्ताओं की भागीदारी थी। उत्तर प्रदेश से अखिलेश यादव, पश्चिम बंगाल से ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी, बिहार से तेजस्वी यादव, झारखंड से हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन, जम्मू-कश्मीर से फारूक अब्दुल्ला तथा महबूबा मुफ्ती और दक्षिण भारत के विभिन्न राज्यों से आए नेताओं ने इस आयोजन को राष्ट्रीय स्वरूप दिया। वामपंथी दलों की मौजूदगी ने भी विपक्षी एकजुटता को व्यापक बनाया।

इस भागीदारी के पीछे अलग-अलग राज्यों की राजनीतिक परिस्थितियां हैं। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर तृणमूल कांग्रेस की आशंकाएं हैं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने नाम हटाए जाने के सवाल उठाए हैं। बिहार में भी मतदाता अधिकार और चुनावी पारदर्शिता का मुद्दा राजनीतिक विमर्श का हिस्सा है। झारखंड सहित दूसरे राज्यों के नेताओं ने भी इस प्रश्न को लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़ा।

अखिलेश यादव ने अपने भाषण में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मुद्दे को उठाया। तेजस्वी यादव ने इसे मतदाताओं के अधिकारों की लड़ाई बताया। ममता बनर्जी ने निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। इस तरह अलग-अलग प्रदेशों की राजनीतिक चिंताएं एक साझा मंच पर सामने आईं।

हालांकि विपक्षी एकता की वास्तविक परीक्षा मंच साझा करने के बाद शुरू होती है। राज्यों में इन दलों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा है। सीटों का बंटवारा, नेतृत्व और साझा चुनावी रणनीति जैसे सवाल अभी भी मौजूद हैं। यदि यह एकता केवल केंद्र सरकार के विरोध तक सीमित रहती है तो उसका स्थायित्व कठिन होगा। उसे रोजगार, महंगाई, सामाजिक न्याय और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही जैसे मुद्दों पर भी साझा कार्यक्रम बनाना होगा।

रैली का केंद्रीय मुद्दा विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के दौरान मतदाता सूचियों से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने का आरोप था। विपक्ष का कहना है कि इस प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव है और बड़ी संख्या में योग्य मतदाता मतदान के अधिकार से वंचित हो सकते हैं।

विपक्ष ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी उठाई। उसका आरोप है कि निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल हैं। दूसरी ओर निर्वाचन आयोग का तर्क है कि मतदाता सूची को शुद्ध करने के लिए मृत, दोहरे और अपात्र मतदाताओं के नाम हटाना आवश्यक है।

दोनों पक्षों के दावों की निष्पक्ष जांच जरूरी है। यदि किसी योग्य नागरिक का नाम गलती से हटाया गया है तो उसे नाम वापस जुड़वाने की सरल प्रक्रिया मिलनी चाहिए। आयोग को राज्यवार आंकड़े, नाम हटाने के कारण और शिकायतों के निपटारे की जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए। संवैधानिक संस्था की प्रतिष्ठा पारदर्शिता और निष्पक्षता से ही कायम रहती है।

महारैली से एक दिन पहले विपक्षी नेताओं ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त के विरुद्ध प्रतीकात्मक सार्वजनिक महाभियोग की कार्यवाही आयोजित की थी। इस आयोजन के माध्यम से विपक्ष ने निर्वाचन आयोग की जवाबदेही का सवाल उठाया। यह वास्तविक संवैधानिक महाभियोग नहीं, बल्कि राजनीतिक विरोध दर्ज कराने का प्रतीकात्मक तरीका था।

दूसरी ओर भाजपा ने विपक्ष के आरोपों को राजनीतिक दुष्प्रचार बताया। भाजपा नेताओं का तर्क है कि चुनावी पराजय या राजनीतिक असफलता के बाद संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाना विपक्ष की रणनीति है। इस राजनीतिक टकराव का समाधान आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि पारदर्शी निर्वाचन प्रक्रिया और तथ्यों के सार्वजनिक परीक्षण से ही संभव है।

रामलीला मैदान की महारैली ने विपक्षी दलों को एक साझा मंच दिया है। लेकिन इस आयोजन की सफलता का आकलन केवल भीड़ से नहीं किया जा सकता। राहुल गांधी के नेतृत्व, पप्पू यादव के तिरंगा मार्च, क्षेत्रीय दलों की भागीदारी और बिहार कांग्रेस के ओबीसी नेतृत्व की सक्रियता को आगे ठोस संगठनात्मक कार्यक्रम में बदलना होगा।

बिहार में राजेश राम और कृष्णा अल्लावरू के सामने संगठन को जिला और प्रखंड स्तर तक मजबूत करने की चुनौती है। सोनी कुमारी, अनुराग चंदन और राकेश कुमार मंडल जैसे पदाधिकारियों की भूमिका सामाजिक न्याय और मताधिकार के सवालों पर जनसंवाद बढ़ाने में महत्वपूर्ण हो सकती है। संगठन को यह सुनिश्चित करना होगा कि पिछड़े वर्गों, महिलाओं, युवाओं और वंचित समुदायों की आवाज राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया में भी सुनी जाए। रामलीला मैदान भारतीय राजनीति के अनेक ऐतिहासिक आंदोलनों का साक्षी रहा है। यहां से उठी आवाजों ने समय-समय पर सत्ता और व्यवस्था को चुनौती दी है। 1 नवंबर की महारैली ने भी लोकतंत्र की विश्वसनीयता से जुड़े सवालों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में रखा है।

लोकतंत्र में सरकारें बदलती हैं, राजनीतिक दलों की भूमिका बदलती है, लेकिन मतदाता का अधिकार नहीं बदल सकता। योग्य नागरिक का नाम मतदाता सूची में होना, उसका वोट सुरक्षित रहना और निर्वाचन आयोग का निष्पक्ष बने रहना लोकतंत्र की बुनियादी शर्तें हैं। रामलीला मैदान से उठी आवाज का वास्तविक अर्थ तभी होगा जब वह गांवों, कस्बों और शहरों तक पहुंचे। लोकतंत्र की रक्षा केवल रैली और नारों से नहीं, बल्कि निरंतर जनसंवाद, संस्थागत पारदर्शिता और नागरिकों की जागरूकता से होती है। आखिरकार लोकतंत्र में सबसे बड़ा अधिकार मतदाता का है और सबसे बड़ी जवाबदेही सत्ता तथा संवैधानिक संस्थाओं की।



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