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रूस से बढ़ती नजदीकी से परेशान चीन

बीजिंग। मध्य एशिया और वैश्विक राजनीति में गहराए तनाव के बीच चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग उत्तर कोरिया की दो दिवसीय महत्वपूर्ण यात्रा पर जा रहे हैं। सोमवार को प्योंगयांग पहुंचने के बाद वह उत्तर कोरियाई सर्वाेच्च नेता किम जोंग उन से मुलाकात करेंगे। शी जिनपिंग की इस साल की यह पहली विदेश यात्रा है, जो पूरे सात साल के लंबे अंतराल के बाद हो रही है। इससे पहले बीते साल किम जोंग उन ने बीजिंग का दौरा किया था, जहां उनका भव्य सैन्य परेड के साथ स्वागत हुआ था और इसके बाद दोनों देशों के बीच हवाई सेवाएं भी बहाल हो गई थीं। हालांकि, जानकारों का मानना है कि समय के साथ दोनों देशों के बीच के समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं।

भू-राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, शी जिनपिंग की यह प्योंगयांग यात्रा केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता या दोस्ती का प्रदर्शन नहीं, बल्कि चीन की क्षेत्रीय मजबूरी का नतीजा है। साल 2019 में जब शी जिनपिंग वहां गए थे, तब अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच परमाणु निरस्त्रीकरण की वार्ता विफल हो चुकी थी और चीन-अमेरिका टकराव के चलते बीजिंग और प्योंगयांग करीब आए थे। लेकिन हालिया वर्षों में यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक परिस्थितियां तेजी से बदली हैं। उत्तर कोरिया और रूस के बीच बढ़ती रणनीतिक नजदीकी और आर्थिक सहयोग ने चीन की चिंताएं बढ़ा दी हैं। रूस से मिल रही आर्थिक मदद और संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों को दरकिनार कर अपनी परमाणु क्षमताओं को बढ़ाने से उत्तर कोरिया का रुख अब काफी आक्रामक हो चुका है। इस दौरे को कूटनीतिक हलकों में किम जोंग उन की एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है। हाल ही में उत्तर कोरिया के एक बड़े सरकारी कार्यक्रम में चीनी राजदूत की अनुपस्थिति से दोनों देशों के बीच उपजा तनाव खुलकर सामने आ गया था।

चीन हमेशा से चाहता रहा है कि उत्तर कोरिया अपने परमाणु परीक्षणों को सार्वजनिक न करे और हथियारों की होड़ से दूर रहे, जबकि उत्तर कोरिया किसी भी कीमत पर चीन पर अपनी पूर्ण निर्भरता नहीं चाहता। चीन के लिए सबसे बड़ी चिंता अपनी 1400 किलोमीटर लंबी सीमा पर शांति बनाए रखना है। रूस के प्रभाव के कारण इस क्षेत्र में चीन का दबदबा कम हो रहा है। बीजिंग चाहता है कि वह उत्तर कोरिया को आर्थिक सहायता देकर अपने प्रभाव में रखे और यह संदेश दे कि इस क्षेत्र के किसी भी बड़े फैसले से चीन को अलग नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही, चीन उत्तर कोरिया के आगामी पांच वर्षीय विकास कार्यक्रम और पर्यटन योजनाओं में भी हिस्सेदार बनना चाहता है, ताकि व्यापारिक संबंधों के बहाने प्योंगयांग को परमाणु कार्यक्रमों के मामले में संयमित रहने के लिए राजी किया जा सके।

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