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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम के 134वें एपिसोड में लोगों से गर्मी से बचाव करने हेतु सावधानी बरतने की अपील की थी। इस अपील में दोपहर के समय घर से बाहर नहीं निकलना और चक्कर आने पर छायादार जगह पर लेटना जैसे अनेक देसी उपाय शामिल थे। परन्तु इस अपील के बावजूद गत 6 जून को हज़ारों छात्रों व युवाओं को दिल्ली की चिलचिलाती धूप में जंतर मंतर पर इकठ्ठा होने के लिये मजबूर होना पड़ा। यह युवा व छात्र देश के शिक्षा मंत्री से इस्तीफ़े की मांग कर रहे थे। जेन ज़ी ने जंतर मंतर पर यह घोषणा की कि यदि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफ़ा नहीं देते तो इस तरह के प्रदर्शन देशभर में किये जायेंगे। ग़ौरतलब है कि धर्मेंद्र प्रधान विगत लगभग 5 वर्षों से लगातार भारत सरकार के शिक्षा मंत्री के पद पर आसीन हैं। उन्हीं के कार्यकाल के दौरान नीट-यूजी 2024 जिसकी परीक्षा 5 मई 2024 को निर्धारित थी,का पेपर बिहार में लीक हुआ था। इस मामले में कई आरोपी गिरफ़्तार भी हुए थे। अभी पिछले दिनों उन्हीं के कार्यकाल में नीट-यूजी का पेपर लीक हुआ। इस से दुखी होकर चार छात्रों ने आत्महत्या कर ली और लगभग 22 लाख छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया। हालांकि कांग्रेस ने 2014-2024 तक 25 परीक्षाओं की सूची जारी की है जिसमें बिहार ज्म्ज्, यूपीएससी तथा बिहार, उत्तर प्रदेश व राजस्थान आदि की राज्य स्तर की भर्ती परीक्षाओं में धांधली अथवा पेपर लीक की शिकायत है। इनमें से कई मामले धर्मेंद्र प्रधान के पिछले कार्यकाल यानी 2021-2024 में हुए। ऐसे में युवा बेरोज़गार छात्रों का आक्रोशित होना स्वाभाविक है।
अभी पेपर लीक पर युवाओं का आक्रोश सोशल मीडिया के माध्यम से सत्ता व व्यवस्था पर फूट ही रहा था की अचानक भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने गत 15 मई को एक मामले की सुनवाई के दौरान यह कह दिया कि कॉकरोच की तरह ऐसे देश के कई युवा हैं, जिन्हें रोज़गार नहीं मिल रहा है। ये युवा आगे चलकर मीडिया, सोशल मीडिया और आर टी आई कार्यकर्ता बन जाते हैं और फिर व्यवस्था पर हमला शुरू कर देते हैं । जस्टिस सूर्यकांत के इस बयान के सार्वजनिक होते ही पहले से ही बेरोज़गारी व अनिश्चितता के माहौल में जी रहे देश के युवाओं में स्वभाविक रूप से उबाल आ गया। हालांकि विवाद बढ़ने पर मौक़े की नज़ाकत को भांप मुख्य न्यायाधीश ने अपनी सफ़ाई देते हुये कहा कि उनकी बात को तोड़-मरोड़ के पेश किया गया है। उनका निशाना युवा नहीं थे, बल्कि फ़र्ज़ी डिग्रियों और ग़लत तरीक़ों से प्रतिष्ठित पेशों में घुसपैठ कर रहे लोग थे। उन्होंने कहा कि मुझे हर भारतीय युवा पर गर्व है और हर युवा मुझे प्रेरणा देता है और वह युवाओं को विकसित भारत के स्तंभ के तौर पर देखते हैं। परन्तु मुख्य न्यायाधीश का स्पष्टीकरण आने तक देश का बेरोज़गार युवा और व्यवस्था से नाराज़ नई युवा पीढ़ी जेन ज़ी आक्रोशित हो चुकी थी। अभिजीत दीपके जोकि पूर्व में आम आदमी पार्टी के साथ एक राजनीतिक संचार रणनीतिकार के रूप में भी काम कर चुके हैं, ने 16 मई 2026 को सोशल मीडिया पर आधिकारिक रूप से कॉकरोच जनता पार्टी के नाम से पहले एक मज़ाक़िया ऑनलाइन पेज शुरू किया बाद में यह इंस्टाग्राम, ग् (ट्विटर) जैसे प्लेटफ़ॉर्म पर तेज़ी से वायरल हुआ और देखते ही देखते मात्र चार दिन में इस पेज ने रिकार्ड 44 लाख से अधिक युवा समर्थक जुटा लिए। इंस्टाग्राम पर तो सिर्फ़ 5 दिन में 1.87 करोड़ फॉलोवर्स हो गये। इस अभियान से भयभीत सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर इसका ग् (ट्विटर) अकाउंट भारत में ब्लॉक करवा दिया।
जस्टिस सूर्यकांत द्वारा देश के युवाओं को काकरोच अथवा परजीवी कहे जाने के बाद व अपने इस बयान पर सफ़ाई दिये जाने के बावजूद कॉकरोच की परछाईं उनका पीछा नहीं छोड़ रही है। गत 4 जून को लंदन विश्वविद्यालय के बर्कबेक कॉलेज में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और अंतरराष्ट्रीय क़ानून विषय पर आयोजित एक व्याख्यान में कई प्रतिभागियों ने भारत में लोकतंत्र के रिकॉर्ड और असहमति के प्रति बढ़ती शत्रुता को लेकर जस्टिस सूर्यकांत के समक्ष सवाल उठाया। यह हंगामा भी जस्टिस सूर्यकांत के 15 मई के बेरोज़गार युवाओं को कॉकरोच बताने वाले बयान से जुड़ा है। गोया भारतीय युवाओं का आक्रोश अब भारत से बाहर भी नज़र आने लगा है। युवाओं का ग़ुस्सा केवल कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के रूप में दिल्ली में ही नहीं फूटा बल्कि कांग्रेस, युवा कांग्रेस व राष्ट्रीय छात्र संगठन ने भी राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन कर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा माँगा तथा पेपर लीक के दोषियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की मांग की।
ऐसा लगता है कि शिक्षा मंत्री की प्राथमिकता पारदर्शी व साफ़ सुथरी परीक्षाएं कराना नहीं बल्कि शिक्षा जैसे नाज़ुक व गंभीर क्षेत्र में भी अपना एजेंडा लागू करना है। इसी एजेंडे के तहत कहीं पाठ्यक्रमों में व्यापक बदलाव किया जा रहा है तो कहीं इतिहास को ही बदलने की कोशिश की जा रही है। कहीं सर्वधर्म समभाव व साम्प्रदायिक सौहार्द की सीख देने वाले अध्यायों को पाठ्यक्रमों से निकाला जा रहा है तो कहीं पाठ्यक्रमों में आधुनिक विज्ञान,प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के बजाय धर्म और संस्कृति की शिक्षा दी जा रही है। इसके अतिरिक्त विशेष विचारधारा के अनेक अयोग्य लोगों को वॉइस चांसलर जैसे पदों पर नियुक्त किया जा रहा है। मिसाल के तौर पर वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय (जौनपुर, उत्तर प्रदेश) के इसी तरह के एक पूर्व वाइस चांसलर का नाम डॉ. राजाराम यादव था। जिन्होंने छात्रों को भीख मांगने को रोज़गार बताया था। उन्होंने कहा था कि बेरोज़गार युवा ट्रेन में खंजरी बजाकर भीख मांग कर कमाई कर सकते हैं। यह बयान उस समय छात्रों में भारी आक्रोश पैदा कर गया था। छात्रों ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी थी कि बेरोज़गारी का समाधान भीख मांगना नहीं बल्कि सही रोज़गार सृजन है। इसी वाइस चांसलर ने छात्रों को हिंसा करने के लिये भी उकसाया था। गोया पूरी शिक्षा प्रणाली को ही साम्प्रदायिकता का कलेवर चढ़ा कर नए ढंग से परिभाषित करने का प्रयास किया जा रहा है। उधर ग़रीबों के बच्चों की शिक्षा का एकमात्र सहारा समझे जाने वाले देशभर के लाखों सरकारी विद्यालय बंद हो चुके हैं। जबकि नित नए निजी व मंहगे स्कूल कॉलेज व यूनिवर्सिटीज़ खुलते जा रहे हैं। जोकि आम लोगों की पहुँच से बाहर हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि सरकार की ऐसी ही नाकामी व अनदेखी की वजह से ही आज कॉकरोच केवल व्यवस्था के बाहर ही नहीं इस व्यवस्था के भीतर भी भरी पड़ी हैं।
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