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उप-चुनाव परिणाम

 तीन अगस्त को तीन राज्यों के तीन नतीजे बहुत बड़े संकेत हैं। निश्चित रूप से बिहार का नतीजा जहाँ सत्ताधारी दल के लिए हैरान और परेशान करने वाला रहा। वहीं मध्यप्रदेश का नतीजा सत्ताधारी दल की अन्दरूनी गुटबाजी का परिणाम रहा। गुजरात में भाजपा की जीत स्वाभाविक कही जा सकती है। सबसे चर्चित जीत रही प्रशान्त किशोर उर्फ पीके की, क्योंकि राज्य की जनता को विकल्प के तौर पर एक नया दल जनसुराज जो मिल गया। पहले बिहार वासियों के पास दो ही विकल्प थे। राजद और भाजपा। राजद से मोहभंग हो गया था और पीके मतदाताओं के बीच अपनी जगह बनाने की कवायद कर रहे थे। हालाकि बीते विधानसभा चुनाव में उनका एक भी प्रत्याशी नहीं जीता और वो खुद चुनाव में खड़े नहीं हुए। लेकिन बिहार की नब्ज को टटोलते रहे। इसी बीच नितिन नबीन के भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद उनकी बांकीपुर सीट खाली हुई जो पीके लिए मौके पर चौका लगाने जैसा रहा। हाँ, उन्होंने छक्का जरूर जड़ दिया ये बात अलग है। बांकीपुर सीट पटना के शहरी इलाके की है जिसे शुरू से ही भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता रहा। इस नतीजे ने न केवल यह मिथक तोड़ा बल्कि भाजपा में खलबली मचा दी। माना जा रहा है कि पेपर लीक और परीक्षाओं में धांधलियों के चलते युवाओं की नाराजगी और जंतर-मंतर पर चले लंबे आन्दोलन ने भी भाजपा की छवि पर डेन्ट लगाया। इधर भाजपा अति आत्मविश्वास में थी और यह समझने में नाकाम रही कि हवा हमेशा एक ही दिशा में नहीं बहती। चंदा चोरी और जेन-जी आन्दोलन के बीच भाजपा ने अपने 40 स्टार प्रचारक उतार दिए। लेकिन राजद के चार सांसद तक बांकीपुर नहीं पहुंचे। इतना ही नहीं नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव तो विदेश चले गए जिन्होंने आखीर-आखीर में रोड शो किया। लेकिन तब तक बांकीपुर के मतदाताओं को यह समझना आसान हो गया कि तेजस्वी यादव और राजद अपने उम्मीदवार को लेकर गंभीर नहीं है। संकेत साफ रहा मतदाता को कहीं और शिफ्ट होना था। विकल्प के तौर पर पढ़ा लिखा, राजनीति को समझने-जानने वाले रणनीतिकार के रूप में पीके का नाम था इसलिए ज्याद सोचने-समझने के बजाए बिहार और देश के हालातों को देखते हुए मतदाताओं ने इस छोटे से चुनाव में बड़ा संदेश दे दिया। भाजपा को नुकसान पहुंचाने में भरत तिवारी एनकाउंटर मामला भी माना जा रहा है। इस एनकाउंटर ने न केवल युवाओं बल्कि खुल कर भाजपा के सवर्ण विरोधी होने को जबरदस्त हवा दी। भाजपा के तमाम जिम्मेदारों और रणनीतिकारों ने भाजपा विरोधी माहौल को थामने और बदलने की कोशिश की पर यह हो न सका। अंततः जीत भाजपा के हाथ से निकल गई और कई दशकों से भाजपा की परंपरागत कहलाने वाली बांकीपुर और राष्टीय अध्यक्ष नितिन नबीन के कारण अतिप्रतिष्ठत हुई सीट हाथ से निकल गई। अब बिहार की राजनीति को समझने वाले यह कह रहे हैं कि पीके भाजपा सरकार, विशेषकर सम्राट चौधरी के लिए सदन के अन्दर भी और बाहर भी मुश्किलें बढ़ाएंगे क्योंकि ब उनका मकसद सिर्फ विधायकी नहीं बल्कि अपनी पार्टी को बिहार में नया मुकाम जो देना है। 

कमोवेश यही स्थिति मध्यप्रदेश के दतिया में रही। 2023 में हुए विधानसभा चुनाव में दतिया से नरोत्तम मिश्रा की हार के बाद भाजपा के अन्दरूनी हलकों में कहीं खुशी, कहीं गम का माहौल था। लेकिन वहां से चुने गए कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती को बैंक धोखाधड़ी मामले में दोषी ठहराए जाने और सजा हो जाने के बाद अप्रैल में अयोग्य घोषित कर दिए जाने से हुए उपचुनाव में घनश्याम सिंह ने कांग्रेस से चुनाव लड़कर सीट को बरकरार रखा। लेकिन इसमें सबसे ज्यादा बिना चुनाव लड़े मुश्किल नरोत्तम मिश्रा की हुई। जिन्होंने चुनाव से काफी पहले ही प्रचार और जनसंपर्क बढ़ा दिया था। लेकिन ऐन वक्त पर उन्हें टिकट नहीं मिली। जिस कारण यह सीट बहुत ही बड़ी प्रतिष्ठा का कारण बन गई। नरोत्तम मिश्रा की स्थिति न उगल पाने, न निगल पाने जैसी हो गई। यदि यहाँ से भाजपा जीतती तो उनका राजनीतिक कद घटता और अब काँग्रेस जीत गई है तो भी उनके राजनीतिक भविष्य पर सवाल उठ रहे हैं। निश्चित रूप से नरोत्तम मिश्रा का कद देखते हुए उनकी मंशा और उनके समर्थक इस मतदान के दौरान किस निर्णय पर पहुंचे होंगे, कहने की जरूरत नहीं। लेकिन नरोत्तम मिश्रा की मुसीबतें तो बढ़ीं। कांग्रेस की जीत के बाद प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी की संगठन में स्थिति और मजबूत होगी। कांग्रेस के लिए भी यह चुनाव बेहद खास था क्योंकि करीब साल भर से संगठन को मजबूत करने और नए नेतृत्व को आगे बढ़ाने के लिए काँग्रेस जबरदस्त संघर्ष कर रही थी। अब यह जीत संजीवनी का काम करेगी।  हालाकि काँग्रेस ने चुनाव को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश कर आजाद समाज पार्टी ने दामोदर सिंह यादव को मैदान में उतारा था फिर भी मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही रहा।

सर्वविदित है कि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के नेतृत्व और पार्टी के चुनावी प्रबंधन के लिहाज से भी यह चुनाव भाजपा के लिए अग्नि परीक्षा माना जा रहा था, जिसमें वह विफल रही। मांजलपुर सीट से भाजपा की प्रचण्ड मतों से जीत ने पार्टी के लिए जश्न का मौका जरूर बरकरार रखा।  

हाँ, कोई माने या न माने भले ही सार्वजनिक न हो लेकिन अन्दरूनी तौर पर भाजपा भी गुटबाजी से उबर नहीं पा रही है। जेन-जी आन्दोलन, पेपर लीक और भी कुछ मुद्दों पर पार्टी में अलग-अलग विचार समझ आने लगे हैं। इन चुनाव नतीजों  के बाद स्थिति-परिस्थित क्या बनेगी, इसके लिए थोड़ा इंतजार करना होगा। 


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