Search

Shopping cart

Saved articles

You have not yet added any article to your bookmarks!

Browse articles
Advertisement
Advertisement Banner

आत्मिक पवित्रता की संजीवनी शौच धर्म है

मन की पवित्रता निर्मलता, उज्जवलता, धवलता, स्वच्छता का होना शौच धर्म है। शुचिः भावो शौच्यम शुचिता का धर्म है। आत्मा को गंदा करने वाला है लोभ, लोभ वह है जो लोक में भटघ्काता है। लोभ ही समस्त पापों का बाप कहा जाता है। लोभी सारे दुर्गुणों का खजाना होता है। दरिद्रों में भी दरिद्र लोभ होता है। लोभ का अंतिम परिणाम है- बेमौत मर जाना। लोभी व्यक्ति न तो खाता है और न ही खिलाता है। इच्छायें, अपेक्षायें, आवश्यकतायें यह सभी लोभ की जननी है इससे विमुक्त होना शौच धर्म है। 

जैसे-जैसे व्यक्ति को लाभ होता है वैसे-वैसे उसका लोभ बढ़ता जाता है। लोभ से इच्छा और इच्छा से तृष्णा बढ़ती जाती है। सूर्य ठण्डा हो जाए, चन्द्रमा प्रतापी हो जाए, आकाश स्तब्ध हो जाए, समुद्र नदियो के जल से तृप्त हो जाये, वायु स्थिर हो जाए, अग्नि दाह रहित हो जाए किन्तु लोभ रूपी तृष्णा कभी समाप्त नहीं होती। लोभ आसक्ति को जन्म देता है। आसक्ति मर सकती है पर लोभ नही। सतोषी परम सुखी- ब्वदजमदजउमदज पद म्दजमतजंपदउमदज चाह से दाह है और दाह से कभी राह नही मिल सकती। चाह तो चाह है दाह तो दाह है- चाह में मिल सकी कब यहाँ राहू है, गर तुम्हारे दिले चाह की दाह न, उसके दिल में यहाँ बन रही राह है। लोभ से क्रोध होता है, क्रोध से काम होता है। लोभ से मोह का नाश होता है लोभ पाप का कारण है। जिसने लोभ रूपी मल को समता के रस से खो दिया है और जो भोजन की गृद्धता से रहित है। ऐसे मुनिराज समता के धारी को ही उत्तम शौच धर्म होता है। 

एक-एक व्यक्ति की आशाओ का गड्घ्ढा इतना बडा है कि उससे सम्पूर्ण विश्व की विभूति भर जाए तो भी अणु के बराबर दिखेगी, न भूतो न भविष्यति इसलिए आकांक्षा करना व्यर्थ है, इच्छा करो तो परमात्मा के गुणों की इच्छा करो, जिससे उन जैसे बन सकें। आत्मिक गुणो की इच्छा करना लोभ नही है शौच धर्म है। हमे अपने जीवन को धर्ममय व सुखद, सुन्दर व आचरणमय बनाने के लिए लोभ लालच, इच्छा आदि को त्यागकर पवित्रता उज्जवलता को धारण करना चाहिए तभी वास्तव में शौच धर्म होगा और तभी जीवन मंगलमय बन सकेगा। जीवन का उद्धार होगा। 



Comments (0)

Leave a Comment