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नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 63वें सत्र में आयोजित कॉन्फ्रेंस में अंतरराष्ट्रीय वक्ताओं ने दिल्ली के सिंधु जल संधि को निलंबित करने को सही ठहराया। गुरुवार को इस कॉन्फ्रेंस में वक्ताओं ने कहा कि भारत का यह फैसला दशकों से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और उसकी बदनीयती के जवाब में जायज कदम था। यह पाकिस्तान के लिए एक झटका है क्योंकि उसकी कोशिश इस मुद्दे पर दुनिया का ध्यान खींचने की है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक सिंधु जल संधि पर भारत और पाकिस्तान के बीच 19 सितंबर 1960 को सिंधु प्रणाली की नदियों के पानी के इस्तेमाल को लेकर हस्ताक्षर किए गए थे। बीते साल पहलगाम में आतंकी हमले के बाद भारत ने इस संधि को निलंबित कर दिया था। भारत ने इस कदम के पीछे का मकसद पाकिस्तान के आतंक को समर्थन देना बताया है। सामुदायिक जल अधिकार और सिंधु जल संधि को स्थगित रखने की जरूरत विषय पर आयोजित कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए ब्रुसेल्स स्थित साउथ एशिया डेमोक्रेटिक फोरम के रिसर्च डायरेक्टर सीगफ्राइड वुल्फ ने कहा कि भारत को 1960 की संधि की समीक्षा की मांग करने का पूरा अधिकार है। ये जायज है क्योंकि पाकिस्तान के व्यवहार ने संधि की प्रस्तावना में बताए गए समझौते के मकसद, उद्देश्य और भावना को कमजोर किया है।
वुल्फ ने इस संधि को भारत की तरफ से दी गई एक स्वैच्छिक रियायत बताया जो एक संरचनात्मक असंतुलन पर आधारित थी। उन्होंने पाकिस्तान के उस दावे को इंजीनियरिंग मिथक करार दिया, जिसमें उसने कहा है कि भारत नदियों के बहाव को रोक रहा है। उन्होंने बताया कि पश्चिमी नदियों पर बनी भारतीय परियोजनाएं पानी की खपत नहीं करतीं और पानी को आगे भेजने से पहले बिजली पैदा करती हैं। उन्होंने कहा कि इस्लामाबाद का अभियान भारत के विकास में देरी करने, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसे बदनाम करने और पानी के उस संकट से ध्यान भटकाने की एक बड़ी कोशिश का हिस्सा है, जो पूरी तरह से खुद पैदा किया गया है। इसकी जड़ें पंजाब के दबदबे, सामंती जमींदारी व्यवस्था, शहरी झुकाव और नहरों के खस्ताहाल बुनियादी ढांचे में हैं।
लंदन में रहने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ता आरिफ आजकिया ने कहा कि पानी का अधिकार एक बुनियादी मानवाधिकार है। इससे पाकिस्तान के सैन्य तंत्र ने सिंध को वंचित रखा है। सिंध में कोट्री के पास सिंधु नदी का बहाव ऊपर की ओर नहरों के जरिए पानी मोड़े जाने के कारण बहुत कम हो गया है। भारत में हुए बड़े आतंकी हमलों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि भारत का 65 साल पुराने समझौते को निलंबित करने का फैसला सही था। एक भारतीय एनजीओ ने तर्क दिया कि इस क्षेत्र में पानी की सुरक्षा से जुड़ी बदलती स्थितियों को देखते हुए 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए समझौते का आज के मानवाधिकारों के नजरिए से फिर से मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
एनजीओ ने कहा कि सिंधु संधि लंबे समय से चले आ रहे अंतरराष्ट्रीय सहयोग का एक अहम उदाहरण होने के बावजूद छह दशक में पानी की सुरक्षा से जुड़े हालात बदल गए हैं। इसमें आबादी में बढ़ोतरी, जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों के पीछे हटने, भूजल के कम होने और नदियों के बहाव में लगातार अनिश्चितता जैसे कारण हैं।
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