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दो सरकारों की नींव हिलाने का साक्षी है रामलीला मैदान

नई दिल्ली। दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों की राजनीति में एक बार फिर रामलीला मैदान का नाम प्रमुखता से उभरा है। जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने के बाद दिल्ली पुलिस ने मध्य दिल्ली के रामलीला मैदान को तीन वैकल्पिक जगहों में से एक के रूप में तय किया है। यह फैसला मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं को लेकर जारी प्रदर्शनों के बीच आया है। हालांकि जंतर-मंतर लंबे समय से प्रदर्शनों का केंद्र रहा है, रामलीला मैदान का इतिहास भी आंदोलनों और बड़े राजनीतिक बदलावों का साक्षी रहा है।

दशकों के अंतराल में इस मैदान पर दो ऐसे बड़े जन आंदोलन हुए, जिन्होंने तत्कालीन कांग्रेस की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। इनमें पहला आंदोलन 1975 में समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण (जेपी) के नेतृत्व में उठा था। 25 जून 1975 को जेपी ने इसी मैदान से एक विशाल रैली को संबोधित करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ प्रतिरोध का आह्वान किया था। इसी रात देश में आपातकाल लगा दिया गया, जिसमें नागरिक स्वतंत्रताएं निलंबित हुईं और विपक्ष पर कार्रवाई हुई। आपातकाल के बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को केंद्र में पहली बार हार का सामना करना पड़ा और जनता पार्टी सत्ता में आई। इस तरह रामलीला मैदान में हुई यह रैली भारतीय राजनीति के एक बड़े ऐतिहासिक घटनाक्रम से जुड़ गई।

करीब 36 साल बाद 2011 में रामलीला मैदान एक बार फिर बड़े जन आंदोलन का केंद्र बना। इस बार मुद्दा भ्रष्टाचार था और नेतृत्व सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे कर रहे थे। अन्ना ने मजबूत लोकपाल कानून की मांग को लेकर देशव्यापी आंदोलन शुरू किया, जो जंतर-मंतर से चलकर रामलीला मैदान पहुंचा। यहां अन्ना हजारे की भूख हड़ताल ने पूरे देश का ध्यान खींचा। उस समय कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार पहले से ही भ्रष्टाचार के कई आरोपों से घिरी थी, और अन्ना आंदोलन ने सरकार पर राजनीतिक दबाव और बढ़ा दिया। इस आंदोलन ने आम आदमी पार्टी के उभार के लिए भी माहौल तैयार किया, जिसने बाद में दिल्ली में कांग्रेस और भाजपा दोनों को चुनौती दी और राजधानी की राजनीति का समीकरण बदल दिया। अन्ना आंदोलन के बाद कांग्रेस अपने सबसे निचले स्तर पर चली गई, और 2014 से लगातार तीन बार भाजपा केंद्र की सत्ता पर काबिज है।


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