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मुखौटे - झूठी अच्छाई, सच्ची बुराई

रामायण का रावण युगों-युगों से अधर्म, अहंकार और बुराई के सबसे बड़े प्रतीक के रूप में देखा जाता रहा है। विजयादशमी की हर शाम जलते हुए रावण के पुतले के साथ समाज यह संदेश देता है कि अंततः सत्य की विजय होती है और असत्य का विनाश। लेकिन जब हम रावण के दस सिरों के प्रतीकात्मक अर्थ और उस पर कही गई इस पंक्तियाँ। चेहरे तो सबके पास बहुत हैं, बस एक रावण ही था जिसने छिपाए नहीं। पर विचार करते हैं, तो यह आधुनिक सभ्यता के मुंह पर एक करारा तमाचा जड़ती है। बेला में इस नवरात्र के दशहरा पर हम दशानन का दहन कर सच्चाई का विजय पर्व मनाने की इतिश्री करेंगे।

यह विचार रावण के दुष्कर्मों का महिमामंडन नहीं करता, बल्कि आज के समाज में व्याप्त पाखंड और छद्म आचरण की गहरी शल्य-चिकित्सा करता है। रावण के पास दस सिर थे, यानी दस अलग-अलग मनोवृत्तियां और विचार। लेकिन उसकी खासियत यह थी कि उसने कभी अपने किसी रूप को छिपाने की कोशिश नहीं की। वह जैसा भी था, अहंकारी, विद्वान, महाज्ञानी या क्रूर खुलेआम था। उसने अच्छाई का फर्जी आवरण पहनकर समाज को धोखा देने का प्रयास नहीं किया। उसका अधर्म भी सामने था और उसकी शत्रुता भी खुली थी।

इसके ठीक विपरीत, आज के आधुनिक इंसान को देखिए। आज व्यक्ति चेहरे पर चेहरा लगाए घूम रहा है। बाहर से बेहद सौम्य, आत्मीय और सदाचारी दिखने वाला व्यक्ति भीतर से ईर्ष्या, स्वार्थ और छल-कपट से भरा हो सकता है। आज का समाज बहु-चेहरा संस्कृति का शिकार है। हम सामने मित्र हैं और पीठ पीछे शत्रु, सार्वजनिक मंचों पर नैतिकता के उपदेशक हैं और व्यक्तिगत जीवन में स्वार्थी। आज के युग में सबसे बड़ा खतरा उस बुराई से नहीं है जो खुलकर सामने आती है, क्योंकि खुली बुराई से सावधान रहना आसान होता है। असली खतरा उस गुप्त अधर्म से है जो धर्म, अच्छाई और सहानुभूति का नकाब पहनकर आता है।

यह उक्ति वास्तव में हमें अपने भीतर झांकने और आत्मचिंतन करने का अवसर देती है। यह सवाल उठाती है कि दस सिरों वाले रावण की स्पष्टता बेहतर थी या एक सिर वाले आधुनिक मानव के वे दर्जनों छिपे हुए मुखौटे? यदि हम एक बेहतर और पारदर्शी समाज का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें दोहरे चरित्र की इस प्रवृत्ति को छोड़ना होगा। झूठी अच्छाई के सौ मुखौटे पहनने से कहीं अधिक सम्मानजनक है कि इंसान अपने वास्तविक रूप में निष्छल और पारदर्शी बनकर सच्ची बुराई करें।


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