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राष्ट्रीय पोषण माह शुरू, कुछ जरूरी सवाल
आज बुधवार 9 सितंबर से देश में नौवां राष्ट्रीय पोषण माह शुरू हो गया है। इस साल यानी 2026 की थीम है “हमारी आंगनवाड़ी, हमारी जिम्मेदारी”। थीम बहुत आकर्षक है। इस बार भी पूरे महीने पोषण को लेकर हंसते खिल-खिलाते बच्चों-महिलाओं के पोस्टर लगेंगे। पोषण मेले लगेंगे, आंगनबाड़ी सजेंगी, रैलियां होंगी, पोषण के सहज उपलब्ध स्थानीय खाद्य पदार्थों और प्रोटीन पर चर्चा होगी, लेकिन इसके साथ एक असुविधाजनक सवाल भी पूछा जाना चाहिए, पहला- हमारी आंगनवाड़ी-हमारी जिम्मेदारी है, तो जवाबदेही किसकी है? दूसरा- क्या पोषण का काम केवल ‘अभियान’ है या रोज का सार्वजनिक काम? आंगनवाड़ी हमारी जिम्मेदारी है तो उन महिलाओं यानी आंगनवाड़ी या आशा कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी किसकी है, जो गांव-गांव जाकर इस पूरी व्यवस्था को चलाती हैं और जिन्हें कई बार महीनों मानदेय नहीं मिलता और मजबूरन काम छोड़ आंदोलन के लिए सड़क पर उतरना पड़ता है?
इस साल सरकार ने आंगनवाड़ी केंद्रों में साप्ताहिक मेन्यू में विविधता, स्थानीय खाद्य पदार्थों, दालों, अनाज, मिलेट, मौसमी सब्जियों आदि पर जोर दिया है। सामुदायिक स्वाद-परीक्षण और भोजन की गुणवत्ता पर निगरानी की भी बात है। यह महत्वपूर्ण और सराहनीय कदम है, लेकिन इसके साथ ही सवाल हैकृक्या एक महीने की गतिविधियों से पोषण सुधरेगा, या इसके लिए पूरे साल काम करने वाली मजबूत स्थानीय व्यवस्था चाहिए?
मेरी नजर में कुपोषण किसी कैलेंडर का कार्यक्रम नहीं हो सकता। बच्चे को इस पोषण माह में यानी सितंबर में ही प्रोटीन की जरूरत नहीं होती। गर्भवती महिला को केवल पोषण माह में ही आयरन और उचित आहार की जरूरत नहीं होती। छह महीने के बच्चे को केवल अभियान के दौरान ही पूरक आहार की जानकारी नहीं चाहिए। समझने की बात है कि यह हर रोज, हर महीने की ज़रूरत है। इस साल यानी 2026 की थीम तो बहुत ही बढ़िया है, लेकिन यह सवाल तो बनता है कि ‘हमारी आंगनवाड़ी, हमारी जिम्मेदारी’, लेकिन जवाबदेही किसकी? वास्तव में अगर आप देखें तो इस वर्ष की थीम का सबसे महत्वपूर्ण शब्द शायद “हमारी” है।
सरकार चाहती है कि समुदाय आंगनवाड़ी को अपना माने। नए दिशानिर्देशों के तहत आंगनवाड़ी प्रबंधन समितियों को मजबूत करने, मेन्यू बोर्ड प्रदर्शित करने और समुदाय को भोजन एवं सेवाओं की निगरानी से जोड़ने पर जोर दिया गया है। पोषण माह के दौरान हर आंगनवाड़ी में कम-से-कम एक समिति बैठक का लक्ष्य रखा गया है। यह स्वागतयोग्य है, मगर “सामुदायिक जिम्मेदारी” को सरकारी जिम्मेदारी का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
समुदाय निगरानी कर सकता है, सवाल पूछ सकता है, नागरिक अधिकारों की मांग कर सकता है, स्थानीय संसाधन जुटा सकता है, लेकिन आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को मानदेय समय पर देना, पर्याप्त मानव संसाधन उपलब्ध कराना, प्रशिक्षण देना, पोषण सामग्री की गुणवत्ता और निरंतरता सुनिश्चित करना और स्वास्थ्य एवं महिला-बाल विकास विभागों के बीच समन्वय बनाना सरकार की संस्थागत जिम्मेदारी है।
इसी तरह आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं से चुनावों, वोटरलिस्ट अपडेशन से लेकर लगातार नए-नए काम लेने के साथ यह भी पूछना होगा कि उनके पास उन कामों को करने के लिए पर्याप्त समय, प्रशिक्षण, यात्रा सहायता, डिजिटल साधन और आर्थिक सुरक्षा है या नहीं।
पोषण की लड़ाई में ‘फ्रंटलाइन’ शब्द का इस्तेमाल बहुत आसान है। हम आशा- आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को अक्सर “फ्रंटलाइन वर्कर” कहते हैं। यह सम्मानजनक शब्द है, लेकिन इसमें एक खतरा भी है। फ्रंटलाइन पर वही व्यक्ति होता है जो व्यवस्था की हर कमी का सामना सबसे पहले करता है। जरा सोचिए, परिवार भोजन नहीं जुटा पाता...कार्यकर्ता समझाए। बच्चा टीका नहीं लगवाता...कार्यकर्ता घर जाए। गर्भवती महिला अस्पताल नहीं जाती...कार्यकर्ता समझाए। बच्चा कुपोषित है...कार्यकर्ता निगरानी करे। डेटा पोर्टल पर अपडेट नहीं हैकृकार्यकर्ता दर्ज करे। पोषण माह है...कार्यक्रम भी करे, लेकिन उसका वेतन कह लीजिए या मानदेय, वो देर से आए, तो किससे शिकायत करे। सरकार और तंत्र को यह भी देना होगा, कि जिससे वह पोषण का संदेश दिलवा रहा है, वास्तव में उसका पोषण कैसा है? यही विरोधाभास हमें इस पोषण माह में देखना चाहिए।
वास्तव में फोकस पोषण माह के मेलों, प्रदर्शनियों, आयोजनों की चकाचौंध पर नहीं, पोषण की व्यवस्था और उसके मिलने की निरंतरता पर होनी चाहिए। समुदाय हो या मीडिया उसे देखना होगा, कि क्या उस केंद्र पर नियमित रूप से गर्म पका भोजन मिल रहा है? मेन्यू बोर्ड पर जो लिखा है, क्या वही भोजन बच्चों को मिल रहा है? क्या बच्चे की वृद्धि की नियमित निगरानी हो रही है? क्या तीन साल से कम उम्र के बच्चों के परिवारों तक घर-भेंट के जरिए पहुंच बनाई जा रही है? आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के बीच वास्तविक समन्वय है या केवल बैठक के रजिस्टर में? कितने बच्चे, माताएं, दिव्यांग पोषण की सेवाओं से छूट रहे हैं और क्यों?
और सबसे जरूरीकृक्या इन कार्यकर्ताओं को उनका मानदेय समय पर मिल रहा है? क्योंकि इस साल की थीम “हमारी आंगनवाड़ी, हमारी जिम्मेदारी” तभी सार्थक होगी जब “जिम्मेदारी” का अर्थ केवल नागरिकों से और अधिक काम करवाना न हो, बल्कि सरकार की अपनी जवाबदेही को भी स्पष्ट करना हो। पोषण की थाली में दाल, अनाज, सब्जी और प्रोटीन जरूरी हैं। लेकिन उस थाली तक पहुंच बनाने वाली व्यवस्था में सम्मान, पर्याप्त संसाधन, प्रशिक्षित कार्यकर्ता और समय पर भुगतान भी उतने ही जरूरी हैं। एक कुपोषित बच्चे को केवल पौष्टिक भोजन की जरूरत नहीं होती; उसे ऐसी सार्वजनिक व्यवस्था चाहिए जो उस भोजन को उसके घर और आंगनवाड़ी तक लगातार पहुंचा सके।
इसलिए इस पोषण माह में शायद सबसे जरूरी सवाल यही है कि जब हम कहते हैं ‘हमारी आंगनवाड़ी, हमारी जिम्मेदारी’, तो क्या हम यह भी कहने को तैयार हैं कि उस आंगनवाड़ी तक पोषण पहुंचाने वाली आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की आजीविका भी हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है? यही सवाल इस बार पोषण माह को एक और सरकारी अभियान से आगे ले जाकर सार्वजनिक जवाबदेही का अभियान बना सकता है।
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