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करवा चौथ व्रत की समपूर्ण व्रत कथा

यह पर्व सुहागिन महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य के लिए रखा जाता है।

करवा चौथ 2026: मुख्य तिथियां और मुहूर्त

व्रत प्रारंभ: सुबह 6ः31 बजे से

पूजा मुहूर्त: शाम 5ः38 बजे से 6ः56 बजे तक (अवधिः लगभग 1 घंटा 17 मिनट)

चंद्रोदय का समय: रात 8ः17 बजे

चतुर्थी तिथि समाप्त: 29 अक्टूबर को रात 10ः09 बजे


करवा चौथ की मुख्य परंपराएं

 सरगी: व्रत की शुरुआत सूर्याेदय से पहले सरगी खाकर होती है, जिसे सास अपनी बहू को देती हैं। इसमें फेनी, मिठाई, सूखे मेवे और सुहाग का सामान शामिल होता है।

निर्जला व्रत: महिलाएं पूरे दिन बिना अन्न और जल ग्रहण किए उपवास रखती हैं।

पूजा और कथा: शाम के समय शिव, माता पार्वती, गणेश और कार्तिकेय की पूजा की जाती है और करवा चौथ की कथा सुनी जाती है।

चंद्र दर्शन और पारण: रात को चांद निकलने के बाद, छलनी से चांद और पति का चेहरा देखकर उन्हें अर्घ्य दिया जाता है, जिसके बाद जल पीकर व्रत खोला जाता है।


करवा चौथ की पौराणिक व्रत कथा

प्राचीन समय की बात है। एक साहूकार के सात बेटे और एक बेटी थी, जिसका नाम वीरावती था। वीरावती अपने सातों भाइयों की बहुत लाड़ली बहन थी। विवाह के बाद जब वीरावती पहली बार करवा चौथ का व्रत रखने के लिए मायके आई, तो उसने अपने पति की लंबी आयु के लिए निर्जला व्रत रखा।

शाम होते-होते वीरावती भूख और प्यास से व्याकुल हो गई। उसके भाइयों से अपनी बहन की यह दशा देखी नहीं गई। उन्होंने अपनी बहन को भोजन कराने के लिए एक उपाय सोचा। एक भाई ने दूर पेड़ पर दीपक जलाकर छलनी की ओट से ऐसा दिखाया, मानो चंद्रमा निकल आया हो। दूसरे भाइयों ने वीरावती से कहा, “बहन, चंद्रमा निकल आया है। अब तुम अर्घ्य देकर भोजन कर लो।”

वीरावती ने भाइयों की बात पर विश्वास कर लिया। उसने चंद्रमा समझकर उस प्रकाश को अर्घ्य दिया और भोजन करने बैठ गई।

जैसे ही उसने भोजन का पहला कौर खाया, उसे अपने पति के बीमार होने का समाचार मिला। वह अत्यंत दुखी हुई और तुरंत अपने पति के पास पहुंची। वहां उसने देखा कि उसके पति की हालत बहुत गंभीर है।

वीरावती ने मन ही मन अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी और अगले वर्ष विधिपूर्वक करवा चौथ का व्रत रखने का संकल्प लिया। उसने श्रद्धा और विश्वास के साथ माता करवा की पूजा की तथा अपने पति के स्वस्थ होने की प्रार्थना की।

उसकी अटूट श्रद्धा और भक्ति से प्रसन्न होकर माता ने उसे आशीर्वाद दिया। उसके पति के स्वास्थ्य में सुधार हुआ और उसके घर में फिर से सुख-समृद्धि लौट आई।

तभी से मान्यता है कि करवा चौथ का व्रत श्रद्धा, विश्वास और विधिपूर्वक रखने से माता करवा तथा भगवान शिव-पार्वती की कृपा प्राप्त होती है और दांपत्य जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।

नोट: करवा चौथ की कथा के अलग-अलग क्षेत्रीय और पारंपरिक रूप प्रचलित हैं। पूजा के समय अपने परिवार में प्रचलित व्रत कथा का पाठ भी किया जा सकता है।

करवा माता की आरती और प्रार्थना

हे माता करवा, सभी सुहागिनों पर अपनी कृपा बनाए रखना। सभी के वैवाहिक जीवन में प्रेम, सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करना। सभी के परिवारों को स्वस्थ एवं खुशहाल रखना।

बोलिए करवा माता की जय! माता पार्वती की जय! भगवान शिव शंकर की जय! 🙏


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