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क्या भाजपा चीन के माओवाद से प्रभावित?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को दिमागी नक्सली को पहचान और उनसे मुक्ति पाने का जो आह्वान किया था, उसके बाद जो प्रतिक्रिया भाजपा के अंदर देखने को मिल रही है, उसको देखते हुए बरबस ही माओवाद और हिटलर की यादें ताजा होने लगी हैं। भारत सरकार और गृहमंत्री अमित शाह ने पिछले कुछ महीनो में बार-बार कहा है, कि भारत से नक्सलवाद समाप्त हो चुका है। जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी के सोशल मीडिया से जो रील, विपक्षी पार्टियों, छात्रों और कांग्रेस के खिलाफ जारी हो रही हैं। जिस तरह के आक्रामक विज्ञापन भारतीय जनता पार्टी अपने विपक्षियों से निपटने के लिए लाठी, तलवार और एके-47 राइफल का इस्तेमाल कर रही है, वह चिंताजनक है। भारतीय जनता पार्टी में सोशल मीडिया की नई टीम बनी है। उसने कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों के खिलाफ आक्रामक विज्ञापन की श्रृंखला जारी की है। यह सारे विज्ञापन भाजपा के प्रदेश हैंडल से भी जारी किए जा रहे हैं। इसमें तीन अलग-अलग दौर के हथियारों का उपयोग किया गया है। एक विज्ञापन में भाजपा की सारी प्रदेश इकाइयां लाठी के साथ कांग्रेस कार्यकर्ताओं की धुनाई कर रही हैं। एक घेरा है जिसमें कांग्रेस बीच में खड़ी है, चारों तरफ से उनके ऊपर लाठियां बरसाई जा रही हैं। दूसरे विज्ञापन की रील में रोम के गुलाम विद्रोह पर बनी फिल्म का दृश्य समाहित किया गया है, जिसमें सारे गुलाम योद्धा हाथ में तलवार लेकर हिंसक अंदाज में हमले के लिए तैयार दिख रहे हैं। तीसरे विज्ञापन में एके-47 और एके-56 राइफल हाथ में लेकर भाजपा समर्थक दिमागी नक्सलों पर हमला कर रही हैं। 

भारतीय जनता पार्टी के सोशल मीडिया ने विपक्षी दलों के लिए जिस तरह की आक्रामकता विज्ञापनों में दिखाई है और भाजपा के प्रदेश हैडिल से वह जारी हो रहे हैं। उसके बाद सारे देश में यह चर्चा होने लगी है, क्या भारतीय जनता पार्टी हिटलर और माओ के रास्ते पर चल पड़ी है? इन तीन विज्ञापनों का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। इसके अलावा भी बहुत सारे विज्ञापन सोशल मीडिया हैंडल से जारी किए गए हैं। इनमें ताकत का प्रदर्शन करते हुए सामान्य नागरिकों और विपक्षी दलों के लिए नफरत का भाव स्पष्ट रूप से देखने को मिल रहा है। इन विज्ञापनों के जरिए केवल कांग्रेस या विपक्षी दलों को निशाने पर नहीं लिया गया है। इसमें छात्रों और युवाओं को भी निशाने पर लिया गया है। एक विज्ञापन में मिर्जापुर सीरीज के एक दृश्य का इस्तेमाल किया गया है। जिसमें एक सामान्य विद्यार्थी कॉलेज में छात्र संघ का चुनाव लड़ना चाहता है। उसे खलनायक के गुंडे बेटे द्वारा जबरिया रोका जाता है। यह गुंडे का लड़का क्लास रूम में आकर छात्र की पिटाई करता है, वह कहता है, तुम क्यों चुनाव लड़ना चाहते हो। भाजपा ने पिछले कुछ दिनों से जिस तरीके से नई विज्ञापन सीरीज जारी की है, उसमें मारकाट और ताकत के बल पर सत्ता करने का जो मनसूबा दिखाई दे रहा है, वह काफी डरावना और भयभीत करने वाला है। भाजपा ने राजनीतिक लड़ाई में जिस तरह से विज्ञापनों के जरिए संदेश प्रसारित करने के लिए हिंसा और अराजकता का रास्ता चुना है, वह भारतीय संदर्भ में आश्चर्यजनक है। भाजपा के सोशल मीडिया ने जिस तरह से सोनिया गांधी, अखिलेश यादव एवं और अन्य नेताओं के खिलाफ अश्लील और अपमानजनक कंटेंट तैयार किए हैं, भारत की जनता उसे स्वीकार करेगी या नहीं, यह कहना भी बड़ा मुश्किल है। 

भारत में इस तरह की नफरत और हिंसा वाले विज्ञापन, जो भाजपा हैंडल से सीरियल के रूप में प्रकाशित हो रहे हैं, उसने आम लोगों की चिंता को बढ़ा दिया है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस तरह की मानसिकता का कोई स्थान नहीं है। अगले साल पांच राज्यों के चुनाव होने जा रहे हैं। युवा नाराज होकर सड़कों पर हैं। सारे विपक्षी दल सड़कों पर आकर आंदोलन और प्रदर्शन कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में भाजपा का सोशल मीडिया क्या करना चाहता है, भाजपा की मंशा क्या है, इसको लेकर अब आम आदमी में चिंता दिखने लगी है। भारत की संस्कृति इस तरह की नहीं है, जनता इस तरह से भय और दबाव में आकर कोई निर्णय लेगी? अंग्रेजों के शासन में जब भारत पूरा बंटा हुआ था। अंग्रेजों के पास बहुत बड़ी ताकत थी। उसके बाद भी भारत के गरीब आदिवासी, दलित और सामान्य वर्ग के लोग सड़कों पर आकर लाठी डंडे खाकर भी उन्होंने ना तो अपनी सभ्यता खोई और ना ही वह डरे, अंतोगत्वा अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना ही पड़ा। भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को इस परिस्थिति में विचार करने की जरूरत है। भाजपा का वर्तमान सोशल मीडिया जिस तरह से विज्ञापन प्रकाशित कर रहा है। उसकी प्रतिक्रिया होना भी शुरू हो गई है। कुछ लोग तो यह भी कहने लगे हैं, जिस तरह की स्थिति 1947 और 48 के बीच में देश में देखने को मिली थी। एक बार फिर वही यादें ताजा हो रही हैं। विपक्षी दलों एवं छात्रों ने भी जिस तरह की प्रतिक्रिया सोशल मीडिया एवं जवाबी तौर पर दी जा रही है, उससे चिंता बढ़ गई है। भारत में कभी भी सत्ता का सिंहासन बंदूक की गोली से नहीं निकलता है यदि ऐसा सिंहासन मिल भी जाता है तो यह ज्यादा दिन टिकता नहीं है। यह भारत की संस्कृति और भारत का इतिहास है। 

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