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पर्यूषण पर्व पर विशेष- जीवन को तीर्थ बनाती है मन की तपस्या

तन की तपस्या जीवन को तमाशा बनाती है जबकि मन की तपस्या जीवन को तीर्थ बनाती है। तन की तपस्या को एक फुटपाथ का दुकानदार भी दिन भर कर लेता है। ना भोजन लेता, ना पानी लेता है, लेकिन उसकी तपस्या कर्मों को नष्ट नहीं कर पाती है। जबकि एक संयमी जीव अपने ज्ञान से क्षण में ही कर्मों का क्षरण कर लेते हैं। छहढालाकार ने लिखा है. 

 कोटि जन्म तप तपैं ज्ञान बिन कर्म झरैं जे

ज्ञानी के छिन माहि त्रिगुप्ति तैं सहज टरैं जे॥  

तप कुछ और नहीं बस अपने मन को विषय भोगों सेए संसार से मोड़ लेना ही तप है। कर्म क्षयार्थ तप्यते इति तपरू कर्म क्षय के लिए जो भी किया जाये वह तप है। जिस प्रकार पृथ्वी को खोदे बिना पानी नहीं निकलताए स्वर्ण को तपाये बिना चमक नहीं ला सकतेए सूर्य के बिना कमल को नहीं खिला सकतेए ठीक उसी प्रकार बिना तपस्या के मुक्ति को प्राप्त नहीं किया जा सकता।   

दुकानदार दुकान में, शिक्षक स्कूल में,  वकील कचहरी में, डॉक्टर अस्पताल में, महिलाएँ घर में तप करती हैं, मगर ये तप भौतिक सम्पदा तो दे सकता है लेकिन पारमार्थिक नहीं। यदि भोजन अनुकूल न मिले और संक्लेशता न हो वह तप है। अपेक्षा की उपेक्षा में साम्यभाव होना ही तप है। अपनी इच्छाओं कोए आकांक्षाओं को रोक लेना ही तप है।  

संसार में मनुष्य जन्म दुर्लभ है। उसमें पाण्डित्य पाना अति दुर्लभ हैए जैन धर्म मिलना महा दुर्लभ है और उसे पाकर तप करना तीनों लोकों से दुर्लभ है। अतः हमें सारी दुर्लभ वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं क्यों न इनके माध्यम से तप करके जीवन को ऊर्ध्वगामी बनाएँ। इसमें ही जन्म और जीवन की सार्थकता है।

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