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शाहिद हाकिम की रही है अहम भूमिका

कोलकाता । भारत में फुटबॉल उम्मीद के अनुसार आगे नहीं बढ़ पाया है। हालांकि पूर्व में यहां कई दिग्गज खिलाड़ी हुए हैं। उन्हीं में से एक सैयद शाहिद हाकिम थे। हाकिम ने अपनी पूरी जिंदगी फुटबॉल को आगे बढ़ाने के लिए समर्पित कर दी। अपने करियर में एक खिलाड़ी, एक सफल प्रशिक्षक और एक अंतरराष्ट्रीय रेफरी के रूप में उन्हों भारतीय भारतीय फुटबॉल को पहचान दिलाने का प्रयास किया। इस दौरान उनहें कहीं से भी सहायता नहीं मिली। साल 1960 के रोम ओलंपिक में उन्होंने भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व किया। दिलचस्प बात यह है कि उस समय उनके पिता ही टीम के कोच थे। ओलंपिक में हालांकि भारतीय टीम ग्रुप चरण से आगे नहीं बढ़ पाई थी पर फ्रांस जैसी मजबूत टीम को उसने 1-1 से  ड्रॉ पर रोक दिया था। 

शाहिद ने सर्विसेज के लिए राष्ट्रीय स्तर पर खेलते हुए प्रतिष्ठित संतोष ट्रॉफी जीतने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने भारतीय वायु सेना की टीम का भी प्रतिनिधित्व किया। खेल से संन्यास लेने के बाद भी फुटबॉल से उनका जुड़ाव कम नहीं हुआ। उन्होंने एक अंतरराष्ट्रीय रेफरी के रूप में खेल के प्रति अपनी सेवाएँ जारी रखीं और 1988 के एएफसी एशियन कप में अंपायरिंग में अपनी सेवाएं दीं। हाकिम की सबसे बड़ी पहचान एक दूरदर्शी और सफल फुटबॉल कोच के तौर पर बनी। भारतीय टीम के सहायक कोच के रूप में उन्होंने कई युवा खिलाड़ियों को निखारा और उन्हें राष्ट्रीय मंच पर चमकने का अवसर दिया। घरेलू लीग में, उन्होंने महिंद्रा यूनाइटेड, सालगांवकर और बंगाल मुंबई जैसे प्रमुख क्लबों को कोचिंग दी। उनके कोच रहते ये टीम काफी सफल रहते हुए नई ऊंचाइयों पर पहुँची। वह  खिलाड़ियों को खेल की तकनीक ही नहीं सिखाते थे, बल्कि उन्हें अनुशासन और खेल भावना का भी पाठ पढ़ाते थे, जिससे भारतीय फुटबॉल को कई प्रतिभाशाली चेहरे मिले।

भारतीय फुटबॉल में उनके बहुआयामी और आजीवन योगदान के सम्मान में, भारत सरकार ने उन्हें 2017 में खेल क्षेत्र के सर्वाेच्च पुरस्कारों में से एक ध्यानचंद पुरस्कार से सम्मानित किया। उन्हें द्रोणाचार्य लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से भी नवाजा गया, जो कोचिंग के क्षेत्र में उनकी उत्कृष्टता का प्रमाण है।


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