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नई दिल्ली । केंद्र की मोदी सरकार द्वारा महिला आरक्षण कानून को तेजी से लागू करने की तैयारी ने सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है, लेकिन कांग्रेस ने मुद्दे पर साफ कहा है कि बिना सर्वदलीय बैठक के कोई भी फैसला स्वीकार नहीं किया जाएगा।
दरअसल, मोदी सरकार अब इस कानून को लागू करने के लिए नया रास्ता खोज रही है। संकेत साफ हैं कि जनगणना और परिसीमन जैसी लंबी प्रक्रियाओं से कानून को अलग कर जल्दी लागू करने की रणनीति पर काम चल रहा है। यही वह बिंदु है जिस पर सियासत गर्म है। मोदी सरकार का मानना है कि परिसीमन में समय लगेगा और दक्षिणी राज्यों का विरोध भी झेलना पड़ सकता है, क्योंकि जनसंख्या के आधार पर सीटों के पुनर्वितरण से उनके प्रतिनिधित्व में कमी आ सकती है। लेकिन कांग्रेस इस पूरी कवायद को लेकर बेहद आक्रामक दिख रही है। कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में सर्वदलीय बैठक बुलाए बिना कानून के क्रियान्वयन पर कोई भी चर्चा अधूरी और संदिग्ध होगी। कांग्रेस अध्यक्ष खरगे ने सवाल उठाया है कि जब संसद ने करीब ढाई साल पहले इस ऐतिहासिक कानून को सर्वसम्मति से पारित किया था, तब अब अचानक इसके क्रियान्वयन के तौर तरीकों पर चर्चा की जरूरत क्यों पड़ रही है?
बता दें कि मोदी सरकार की ओर से संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष को साथ लाने की कोशिश जरूर की, लेकिन यह पहल फिलहाल बेअसर साबित होती दिख रही है। सूत्रों के मुताबिक, मोदी सरकार इस कानून में संशोधन कर सकती है, ताकि इस कानून को तुरंत लागू करा सके। इसके तहत सबसे अहम प्रस्ताव सीटों के घुमाव का है, यानी हर चुनाव में अलग अलग सीटों को महिलाओं के लिए आरक्षित किया जाएगा।
गीता मुखर्जी समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार फार्मूला राजनीतिक रूप से संतुलन बनाने की कोशिश जरूर है, लेकिन इसके अपने विवाद भी हैं। अगर हर चुनाव में सीटें बदलेंगी, तब कई नेताओं के राजनीतिक भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडराएंगे। इसकारण कई दल प्रस्ताव को लेकर भी पूरी तरह सहज नहीं हैं। सबसे बड़ा कानूनी पेच यहां है। मौजूदा कानून के अनुसार महिला आरक्षण लागू करने से पहले जनगणना और परिसीमन अनिवार्य है। इस कानूनी पेंच को बदलने के लिए मोदी सरकार को संविधान संशोधन करना होगा, जिसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत जरूरी है। यहां सरकार की असली चुनौती सामने आती है, क्योंकि उसके पास अपने दम पर इतना बहुमत नहीं है। लोकसभा में भाजपा के पास 240 सदस्य हैं, जबकि राज्यसभा में संख्या 103 के आसपास है। इसके बाद बिना विपक्ष के समर्थन के यह संशोधन पारित करना करीब असंभव है इसकारण मोदी सरकार विपक्ष को साथ लाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है, लेकिन कांग्रेस की शर्तें इस राह को कठिन बना रही हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह पूरा विवाद केवल महिला आरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे आने वाले चुनावों की रणनीति भी छिपी है। एक तरफ सरकार महिला सशक्तिकरण के बड़े एजेंडे को तेजी से लागू कर राजनीतिक लाभ लेना चाहती है, वहीं विपक्ष इस कानून को चुनावी चाल बताकर घेरने में जुटा है। इस बीच देश की महिलाओं की निगाहें इस पूरे घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं। वर्षों से लंबित इस कानून के लागू होने की उम्मीद बार बार जगी और टूटी है। अब जब फिर से उम्मीद की किरण दिखाई दे रही है, तब सियासी टकराव इस फिर से अधर में लटका सकता है।
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