Search

Shopping cart

Saved articles

You have not yet added any article to your bookmarks!

Browse articles
Advertisement
Advertisement Banner

भगत सिंह - शहादत की मिट्टी से महकता रहेगा वतन

(भगत सिंह की जयंती (28 सितम्बर) पर विशेष)

भारत को ब्रिटिश शासन की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए स्वतंत्रता संग्राम में अनेक क्रांतिकारियों ने अपना जीवन बलिदान कर दिया था। भारत के ऐसे ही सबसे महान स्वतंत्रता सेनानियों में से एक हैं शहीद-ए-आजम भगत सिंह, जो केवल 23 वर्ष की अल्पायु में ही भारत को आजाद कराने के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए थे। भगत सिंह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे महान क्रांतिकारी थे, जिन्होंने अपने अदम्य साहस और विचारधारा से देश की आजादी के आंदोलन को नई दिशा दी। उन्होंने न केवल अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया बल्कि लोगों में स्वतंत्रता और समानता का संदेश भी फैलाया। बहुत कम उम्र में देश के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले भगत सिंह युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बन गए। उनके बलिदान और साहस ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को प्रेरित किया। उन्होंने एक ओर जहां अपनी देशभक्ति से विदेशी हुकूमत को घुटनों पर लाने का काम किया, वहीं दूसरी ओर अपने क्रांतिकारी विचारों से स्वतंत्रता संघर्ष में अलग-अलग बंटे भारत को एक करने का महत्वपूर्ण कार्य भी किया। उनके प्रेरणादायी विचारों से पूरे भारत में स्वाधीनता की लहर और तेज हो गई थी।

28 सितंबर को शहीद भगत सिंह की 119वीं जयंती मनाई जा रही है। 28 सितंबर 1907 को पंजाब के लायपुर जिले में जन्मे भगत सिंह ने महज 11 वर्ष की आयु में ही स्वतंत्रता संग्राम में कूदने का निश्चय कर लिया था। दरअसल 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग में सभा के दौरान जो नरसंहार हुआ था, उसका भगत सिंह के दिलोदिमाग पर इतना गहरा असर पड़ा था कि उन्होंने तभी ठान लिया था कि वे अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आजादी की लड़ाई लड़ेंगे। उसके बाद उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी और ‘नौजवान भारत सभा’ की स्थापना की और देश को आजादी दिलाने के लिए अंग्रेजों के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल दिया। फांसी के फंदे पर चढ़ने से पहले भगत सिंह ने नारा लगाया था ‘इंकलाब जिंदाबाद’, जो आज भी भारत में स्वतंत्रता और न्याय के लिए संघर्ष का प्रतीक है। इस नारे ने उनकी शहादत के बाद लोगों में क्रांतिकारी भावनाओं को जगाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई। अपने अंतिम क्षणों में भगत सिंह ने अपने साथियों को एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि वह अपने देश के लिए मरने के लिए तैयार हैं और उन्हें कोई पछतावा नहीं है। वह प्रायः एक शेर गुनगुनाया करते थेरू-

जब से सुना है मरने का नाम जिंदगी है,

सर पे कफन लपेटे कातिल को ढूंढ़ते हैं।

भगत सिंह जब पांच साल के थे, तब एक दिन अपने पिता के साथ खेत में गए और वहां कुछ तिनके चुनकर जमीन में गाड़ने लगे। पिता ने उनसे पूछा कि यह क्या कर रहे हो तो मासूमियत से भगत सिंह ने जवाब दिया कि मैं खेत में बंदूकें बो रहा हूं। जब ये उगकर बहुत सारी बंदूकें बन जाएंगी, तब इनका उपयोग अंग्रेजों के खिलाफ करेंगे। भगत सिंह ने स्वतंत्रता सेनानी चन्द्रशेखर आजाद से अपनी पहली मुलाकात के समय ही जलती मोमबती की लौ पर हाथ रखकर कसम खाई थी कि उनका समस्त जीवन वतन पर ही कुर्बान होगा। भगत सिंह ने राजगुरु और सुखदेव के साथ मिलकर काकोरी कांड को अंजाम दिया। उसके बाद उन्होंने 17 दिसंबर 1928 को राजगुरु के साथ मिलकर चंद्रशेखर आजाद की मदद से लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे जेपी सांडर्स को मार डाला।

8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह ने बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर अलीपुर रोड में मौजूद ब्रिटिश इंडिया की इमरजेंसी सेंट्रल असेंबली के सभागार में अंग्रेजी हुकूमत को जगाने के लिए बम और पर्चे फैंके और इसके जरिये आजादी की मांग की आवाज को हर देशवासी के कानों तक पहुंचा दिया। ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बम विस्फोट में भाग लेने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन जेल में अंग्रेजी हुकूमत की प्रताड़ना झेलने के बाद भी भगत सिंह ने आजादी की मांग को जारी रखा। उनका आंदोलन जेल की सलाखों के पीछे भी जारी रहा और उन्होंने कई लेख लिखकर अपने क्रांतिकारी विचारों से समूचे देश के जनमानस को जगाया। वह हिंदी, पंजाबी, उर्दू, बांग्ला और अंग्रेजी के अच्छे जानकार थे, ऐसे में उन्होंने देशभर में आजादी की लड़ाई के लिए अपने संदेश पहुंचाने के प्रयास जारी रखे। अदालती कार्यवाही के दौरान जब कोर्ट में पत्रकार होते तो भगत सिंह आजादी की मांग को लेकर जोशीली बातें किया करते, जो प्रायः अगले दिन अखबारों के पहले पन्ने पर नजर आती, जिन्हें पढ़कर देश की आजादी के लिए हर नागरिक का खून खौल उठता। कैद की सजा के दौरान भगत सिंह के साथ ही उनके साथियों राजगुरु और सुखदेव को भी अदालत ने 7 अक्टूबर 1930 को फांसी की सजा सुनाई और फांसी के लिए 24 मार्च 1931 के दिन को चुना गया लेकिन देशवासियों के आक्रोश से डरकर अंग्रेजों द्वारा एक दिन पहले ही 23 मार्च 1931 को उन्हें गुपचुप तरीके से फांसी दे दी गई।

अपने 23 वर्ष के छोटे से जीवनकाल में भगत सिंह ने वैचारिक क्रांति की ऐसी मशाल जलाई थी, जिससे आज के दौर में भी युवा काफी प्रभावित हैं। उनकी शहादत भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ थी और उनके बलिदान ने भारत के लोगों को ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित किया। उनके जीने के तरीके और विचारों से आज भी प्रत्येक भारतीय प्रेरणा लेता है और खासकर देश के नौजवानों को तो उनका व्यक्तित्व सदैव प्रेरित करता रहेगा। छोटी सी उम्र में ही उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी और अपने क्रांतिकारी विचारों तथा आदर्शों से युवाओं को भी स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। शहीद भगत सिंह की जयंती के अवसर पर उनके कुछ प्रेरणादायी विचारों का उल्लेख करना भी प्रासंगिक होगा। वह कहते थे, ‘क्रांति मानव जाति का अपरिहार्य हक है और आजादी सभी का कभी न खत्म होने वाला जन्मसिद्ध अधिकार है। बम और पिस्तौल से क्रांति नही लाई जा सकती बल्कि क्रांति की तलवार विचारों से ही तेज होती है। किसी भी व्यक्ति को ‘क्रांति’ शब्द की व्याख्या शाब्दिक अर्थ में नहीं करनी चाहिए, जो लोग इसका दुरुपयोग करते हैं, वे अपने फायदे के हिसाब से इसे अलग अर्थ और मतलब दे देते हैं। कोई भी अत्याचारी साधारण व्यक्तियों को कुचलकर उनके विचारों को नहीं मार सकते। मैं दुनिया में न्याय और समानता देखना चाहता हूं। मैं भारत को एक स्वतंत्र और प्रगतिशील राष्ट्र बनाना चाहता हूं।’ देशभक्ति, समानता और न्याय के लिए भगत सिंह देशवासियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बने रहेंगे। भारत माता के वीर सपूत और महान क्रांतिकारी भगत सिंह को शहीद हुए आज भले ही 95 वर्ष से भी ज्यादा बीत चुके हैं लेकिन भगत सिंह और उनके क्रांतिकारी विचार हम सभी के जेहन में आज भी जिंदा हैं और हमेशा रहेंगे।

Comments (0)

Leave a Comment