Search

Shopping cart

Saved articles

You have not yet added any article to your bookmarks!

Browse articles
Advertisement

हर एक घर में दीया भी जले, अनाज भी हो

दीपावली रोशनी का त्योहार है। घरों में दीप जलते हैं, बाजार सजते हैं, मिठाइयों की खुशबू फैलती है और लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं। लेकिन इस उत्सव के बीच एक सवाल ऐसा भी है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। क्या रोशनी का यह पर्व हर घर तक पहुंचता है? क्या उन घरों में भी दीपावली की खुशियां पहुंचती हैं, जहां दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल है? क्या उस परिवार के लिए दीपावली का कोई अर्थ है, जिसके घर में दीप जलाने से पहले बच्चों के लिए भोजन की चिंता करनी पड़ती है? मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली की गजल की दो पंक्तियां इसी सामाजिक विडंबना को हमारे सामने रखती हैंकृ

हर एक घर में दिया भी जले अनाज भी हो

अगर न हो कहीं ऐसा तो एहतिजाज भी हो।

इन पंक्तियों में दीपावली के उत्सव को देखने की एक व्यापक सामाजिक दृष्टि छिपी है। यहां दीप जलाने की खुशी के साथ पेट भरने की बुनियादी जरूरत को भी समान महत्व दिया गया है। शायर केवल यह कामना नहीं करते कि हर घर रोशन हो, बल्कि यह भी चाहते हैं कि हर घर में अनाज हो। यदि ऐसा नहीं है तो समाज को इस असमानता के विरुद्ध आवाज उठानी चाहिए। उर्दू का शब्द एहतिजाज विरोध और प्रतिवाद का भाव व्यक्त करता है। यानी जहां भूख और अभाव हैं, वहां केवल उत्सव मनाना पर्याप्त नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल उठाना भी जरूरी है, जो खुशहाली को सबके जीवन तक नहीं पहुंचा पाती।

दीपावली का सांस्कृतिक अर्थ अंधकार पर प्रकाश और असत्य पर सत्य की विजय से जुड़ा है। भारतीय परंपरा में यह पर्व आशा, उल्लास और नए आरंभ का प्रतीक है। लेकिन किसी भी त्योहार की सार्थकता केवल उसकी धार्मिक मान्यताओं और बाहरी सजावट से तय नहीं होती। उसका वास्तविक महत्व इस बात से भी तय होता है कि वह समाज के कमजोर, वंचित और जरूरतमंद लोगों के जीवन में कितनी खुशी और उम्मीद लेकर आता है। यदि किसी शहर के बाजार लाखों बिजली की रोशनियों से जगमगा रहे हों, लेकिन उसी शहर की झुग्गियों में रहने वाले परिवार भोजन और बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हों, तो उस चमक के भीतर एक गहरा सामाजिक अंधेरा मौजूद है।

निदा फ़ाज़ली की गजल का महत्व इसी बात में है कि वह उत्सव को सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ती है। वह खुशहाली को भविष्य के वादों में कैद रखने के बजाय वर्तमान में देखने की मांग करती है। उनकी एक और पंक्ति हैकृ

रहेगी वादों में कब तक असीर ख़ुश-हाली

हर एक बार ही कल क्यूँ कभी तो आज भी हो।

यह सवाल आज भी हमारे सामाजिक और आर्थिक जीवन के सामने खड़ा है। विकास, गरीबी उन्मूलन और समृद्धि के अनेक वादे किए जाते हैं। योजनाएं बनती हैं, घोषणाएं होती हैं और उपलब्धियों के आंकड़े प्रस्तुत किए जाते हैं। लेकिन आम आदमी के जीवन में इनका वास्तविक असर कितना पहुंचता है, इसकी कसौटी उसका रोजमर्रा का जीवन है। किसी परिवार के लिए खुशहाली का अर्थ केवल बढ़ती अर्थव्यवस्था के आंकड़े नहीं, बल्कि नियमित रोजगार, पर्याप्त भोजन, बच्चों की शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और सम्मानजनक जीवन है।

दीपावली के अवसर पर बाजारों की रौनक बढ़ जाती है। खरीदारी, उपहार और सजावट पर खूब खर्च होता है। उपभोग की संस्कृति ने इस पर्व को एक बड़े कारोबारी आयोजन में भी बदल दिया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि त्योहारों से व्यापार, रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति मिलती है। कुम्हारों के मिट्टी के दीये, मिठाई बनाने वाले कारीगरों, छोटे दुकानदारों, फूल विक्रेताओं और असंख्य श्रमिकों की आजीविका भी इन अवसरों से जुड़ी होती है। लेकिन चिंता तब पैदा होती है, जब त्योहार की खुशी केवल क्रयशक्ति और प्रदर्शन से मापी जाने लगती है। जिनके पास अधिक धन है, उनके लिए उत्सव के साधन बढ़ते जाते हैं, जबकि सीमित आय वाले परिवार अपनी जरूरतों और इच्छाओं के बीच संतुलन बनाने में लगे रहते हैं।

हमें यह भी देखना चाहिए कि दीपावली की चमक के पीछे कितने लोगों का श्रम छिपा है। बाजारों को सजाने वाले मजदूर, घरों और दुकानों में रंग-रोगन करने वाले कामगार, दीये बनाने वाले कुम्हार, मिठाइयां तैयार करने वाले कारीगर और सफाई कर्मचारी त्योहार की तैयारी में अपना योगदान देते हैं। लेकिन क्या उनकी अपनी दीपावली भी उतनी ही खुशहाल होती है? क्या उन्हें उनके श्रम का उचित मूल्य और सम्मान मिलता है? जिस समाज में उत्सव का आनंद लेने वाले और उत्सव को संभव बनाने वाले लोगों के बीच इतनी दूरी हो, वहां सामाजिक समानता का प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है।

दीपावली का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि यह अंधकार से मुक्ति का प्रतीक है। लेकिन अंधकार केवल रात का नहीं होता। भूख, बेरोजगारी, अशिक्षा, बीमारी, जातिगत भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार और आर्थिक शोषण भी समाज के अंधकार हैं। इनसे मुक्ति के बिना प्रकाश का उत्सव अधूरा है। मिट्टी का एक छोटा-सा दीप भी तभी अधिक अर्थवान बनता है, जब वह किसी जरूरतमंद के जीवन में आशा का उजाला पैदा करे। किसी गरीब परिवार को भोजन उपलब्ध कराना, किसी बच्चे की पढ़ाई में मदद करना, किसी बुजुर्ग की जरूरत पूरी करना और किसी बेरोजगार व्यक्ति को आजीविका का अवसर दिलाना भी दीपावली की भावना को व्यवहार में उतारना है।

यहां गांधीजी के विचार भी याद आते हैं। गांधीजी के लिए समाज की प्रगति का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि विकास का लाभ सबसे कमजोर व्यक्ति तक कितना पहुंचा है। उनका अंतिम व्यक्ति का विचार हमें याद दिलाता है कि किसी भी व्यवस्था की नैतिक सफलता का पैमाना समाज का सबसे वंचित नागरिक होना चाहिए। दीपावली के अवसर पर इस विचार की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। जब तक समाज का अंतिम व्यक्ति सम्मान और सुरक्षा के साथ जीवन जीने की स्थिति में नहीं आता, तब तक समृद्धि का दावा अधूरा रहेगा।

इस संदर्भ में किसानों और ग्रामीण समाज की स्थिति को भी समझना जरूरी है। भारत की बड़ी आबादी आज भी कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियों पर निर्भर है। किसान अन्न पैदा करता है, लेकिन अनेक किसानों के सामने लागत, कर्ज, मौसम की अनिश्चितता और उपज के उचित मूल्य की चुनौतियां बनी रहती हैं। खेतों में अन्न उगाने वाले परिवारों के घरों में भी आर्थिक अभाव हो सकता है। यह विरोधाभास हमें सोचने पर विवश करता है कि अन्न उत्पादन करने वाले हाथों को ही यदि अपनी आजीविका के लिए संघर्ष करना पड़े, तो खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण खुशहाली के दावों की वास्तविक कसौटी क्या होनी चाहिए?

शहरों में काम करने वाले असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। निर्माण श्रमिक, रिक्शा चालक, घरेलू कामगार, ठेला लगाने वाले और छोटे कारोबार से जुड़े लोग अक्सर अनिश्चित आय पर निर्भर रहते हैं। त्योहार उनके लिए अतिरिक्त खर्च का अवसर भी बन जाता है। बच्चों की इच्छाएं, परिवार की उम्मीदें और सामाजिक परंपराएं उन्हें अपनी सीमित आमदनी में अधिक खर्च करने के लिए प्रेरित करती हैं। ऐसे में जरूरी है कि त्योहारों का सामाजिक स्वरूप ऐसा बने, जिसमें दिखावे की जगह साझेदारी और संवेदना को महत्व मिले।

निदा फ़ाज़ली की गजल की एक और पंक्ति समाज की भूमिका को स्पष्ट करती है

हुकूमतों को बदलना तो कुछ मुहाल नहीं

हुकूमतें जो बदलता है वो समाज भी हो।

इसमें केवल सत्ता परिवर्तन की बात नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और सामूहिक जिम्मेदारी का संदेश भी है। समाज में बदलाव केवल सरकारों की नीतियों से नहीं आता। उसके लिए नागरिकों की सोच, व्यवहार और सहभागिता भी जरूरी है। भूख, गरीबी और असमानता को दूर करना केवल सरकारी योजनाओं का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व भी है। सरकार को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और सामाजिक न्याय के लिए जवाबदेह होना चाहिए। वहीं नागरिक समाज को भी जरूरतमंदों के प्रति संवेदनशील और सक्रिय रहना होगा।

दीपावली हमें अपने भीतर झांकने का अवसर देती है। हम अपने घरों में कितने दीप जलाते हैं, इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि हमारे आसपास कितने घर ऐसे हैं, जहां खुशी का एक दीप जलाने की जरूरत है। यह अवसर उन लोगों को याद करने का भी है, जिनकी मेहनत से हमारे उत्सव संभव होते हैं, लेकिन जिनके हिस्से में अक्सर अभाव और उपेक्षा आती है। त्योहार की असली आत्मा तभी प्रकट होती है, जब खुशियां बांटी जाएं और समाज में किसी को अकेला न छोड़ा जाए।

दीपावली पर मिट्टी के दीये खरीदना केवल परंपरा निभाना नहीं, बल्कि स्थानीय कारीगरों और छोटे उत्पादकों की आजीविका को सहयोग देना भी है। जरूरतमंद परिवारों के साथ मिठाइयां और भोजन साझा करना, सफाई कर्मचारियों और श्रमिकों के योगदान का सम्मान करना तथा बच्चों को समानता और संवेदना का संस्कार देना भी इस पर्व को अधिक अर्थपूर्ण बना सकता है। पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी निभाना और आतिशबाजी के शोर तथा प्रदूषण से बचना भी सामूहिक हित का हिस्सा है।

दरअसल, दीपावली का असली उजाला तभी व्यापक होगा, जब वह केवल संपन्न घरों की खिड़कियों से बाहर न झांके, बल्कि गरीब की झोपड़ी तक भी पहुंचे। जब किसी परिवार को त्योहार के दिन भोजन की चिंता न हो, जब किसी बच्चे की खुशी आर्थिक अभाव के कारण अधूरी न रह जाए और जब मेहनतकश व्यक्ति को अपने श्रम का उचित सम्मान मिले, तभी रोशनी का यह उत्सव सामाजिक अर्थों में भी सार्थक होगा।निदा फ़ाज़ली की पंक्तियां हमें उत्सव के बीच एक जरूरी सवाल से रूबरू कराती हैं। दीप जलाना हमारी परंपरा है, लेकिन हर घर में अनाज और हर चेहरे पर मुस्कान सुनिश्चित करना हमारी सामाजिक जिम्मेदारी है। जहां भूख है, वहां केवल रोशनी का प्रदर्शन नहीं, बल्कि बदलाव की जरूरत है। इसलिए इस दीपावली हमारा संकल्प केवल अपने घर को रोशन करने का न हो, बल्कि उस समाज को भी रोशन करने का हो, जिसमें कोई भूखा न सोए, कोई अभाव में उत्सव से वंचित न रहे और खुशहाली कुछ घरों की संपत्ति बनकर न रह जाए।

आखिर दीपावली का अर्थ केवल अंधेरे में दीप जलाना नहीं, बल्कि उस व्यवस्था और सोच को बदलना भी है, जो किसी के घर में रोशनी और किसी के हिस्से में भूख छोड़ देती है। हर एक घर में दिया भी जले और अनाज भी होकृयही दीपावली का सबसे बड़ा सामाजिक संदेश और सच्चे अर्थों में लोकमंगल का उत्सव है।


Comments (0)

Leave a Comment