Shopping cart
Your cart empty!
Terms of use dolor sit amet consectetur, adipisicing elit. Recusandae provident ullam aperiam quo ad non corrupti sit vel quam repellat ipsa quod sed, repellendus adipisci, ducimus ea modi odio assumenda.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Sequi, cum esse possimus officiis amet ea voluptatibus libero! Dolorum assumenda esse, deserunt ipsum ad iusto! Praesentium error nobis tenetur at, quis nostrum facere excepturi architecto totam.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Inventore, soluta alias eaque modi ipsum sint iusto fugiat vero velit rerum.
Sequi, cum esse possimus officiis amet ea voluptatibus libero! Dolorum assumenda esse, deserunt ipsum ad iusto! Praesentium error nobis tenetur at, quis nostrum facere excepturi architecto totam.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Inventore, soluta alias eaque modi ipsum sint iusto fugiat vero velit rerum.
Dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Sequi, cum esse possimus officiis amet ea voluptatibus libero! Dolorum assumenda esse, deserunt ipsum ad iusto! Praesentium error nobis tenetur at, quis nostrum facere excepturi architecto totam.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Inventore, soluta alias eaque modi ipsum sint iusto fugiat vero velit rerum.
Sit amet consectetur adipisicing elit. Sequi, cum esse possimus officiis amet ea voluptatibus libero! Dolorum assumenda esse, deserunt ipsum ad iusto! Praesentium error nobis tenetur at, quis nostrum facere excepturi architecto totam.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Inventore, soluta alias eaque modi ipsum sint iusto fugiat vero velit rerum.
Do you agree to our terms? Sign up
नरक चतुर्दशी छोटी दीवाली पर विशेष
कार्तिक कृष्ण पक्ष में मनाए जाने वाले पांच दिवसीय दीपोत्सव का दूसरा पर्व नरक चतुर्दशी है, जिसे छोटी दीपावली, रूप चतुर्दशी और काली चौदस के नाम से भी जाना जाता है। धनतेरस के अगले दिन मनाया जाने वाला यह पर्व धार्मिक आस्था, पौराणिक मान्यताओं और आध्यात्मिक संदेशों का अनूठा संगम है। ‘नरक चतुर्दशी’ नाम से ही स्पष्ट होता है कि इसका संबंध मृत्यु के देवता यमराज और नरक से मुक्ति की मान्यता से जुड़ा है। धार्मिक विश्वास है कि इस दिन यमराज की पूजा, व्रत और दीपदान करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है तथा मनुष्य को नरक की यातनाओं से मुक्ति मिलती है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई, अत्याचार पर न्याय और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है। इस पर्व पर अभ्यंग स्नान का विशेष महत्व है। मान्यता है कि सूर्याेदय से पूर्व शरीर पर तिल का तेल लगाकर उबटन करने और स्नान करने से रूप, सौंदर्य तथा आरोग्य की प्राप्ति होती है। इसी कारण इसे रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है। इस दिन घरों की साफ-सफाई, दीप प्रज्वलन, हनुमान जी की पूजा और यमराज के निमित्त दीपदान करने की परंपरा भी प्रचलित है। विशेष रूप से घर के बाहर दक्षिण दिशा में दीपक जलाकर यमराज से परिवार की सुख-समृद्धि और दीर्घायु की कामना की जाती है।
इस वर्ष चतुर्दशी तिथि दो दिन रहने के कारण पर्व की तिथि को लेकर असमंजस की स्थिति है। कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी 7 नवंबर को सुबह 10 बजकर 47 मिनट से प्रारंभ होकर 8 नवंबर को सुबह 11 बजकर 27 मिनट तक रहेगी। प्रदोष काल में चतुर्दशी तिथि होने के कारण यम दीपदान, हनुमान पूजा और काली चौदस की पूजा 7 नवंबर को की जाएगी जबकि उदयातिथि के अनुसार 8 नवंबर की सुबह अभ्यंग स्नान होगा। नरक चतुर्दशी केवल धार्मिक कर्मकांड का पर्व नहीं है बल्कि जीवन से नकारात्मकता, अहंकार और बुराइयों को दूर कर सद्गुणों का प्रकाश फैलाने की प्रेरणा भी देता है। इसका संदेश है कि जिस प्रकार दीपक अंधकार को मिटाता है, उसी प्रकार सदाचार, विवेक और सकारात्मकता मनुष्य के जीवन से अज्ञान तथा विकारों के अंधकार को दूर कर सकते हैं।
‘नरक चतुर्दशी’ पर्व को ‘नरक चौदस’, ‘रूप चतुर्दशी’, ‘काल चतुर्दशी’ तथा ‘छोटी दीवाली’ के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन मृत्यु के देवता यमराज और धर्मराज चित्रगुप्त का पूजन किया जाता है और यमराज से प्रार्थना की जाती है कि उनकी कृपा से हमें नरक के भय से मुक्ति मिले। इसी दिन रामभक्त हनुमान का भी जन्म हुआ था और इसी दिन वामन अवतार में भगवान विष्णु ने राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगते हुए तीनों लोकों सहित बलि के शरीर को भी अपने तीन पगों में नाप लिया था। हनुमान जयंती वैसे तो चौत्र मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है, लेकिन उत्तर भारत के कई भागों में यह दीवाली से एक दिन पहले भी मनाई जाती है। यम को मृत्यु का देवता और संयम के अधिष्ठाता देव माना गया है। नरक चतुर्दशी के दिन सूर्याेदय से पहले उठकर स्नान करना शुभ माना गया है और सायंकाल के समय यम के लिए दीपदान किया जाता है। आशय यही है कि संयम-नियम से रहने वालों को मृत्यु से जरा भी भयभीत नहीं होना चाहिए। इस दिन सूर्याेदय से पहले स्नान करने का आशय ही आलस्य का त्याग करने से है और इसका सीधा संदेश यही है कि संयम और नियम से रहने से उनका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा और उनकी अपनी साधना ही उनकी रक्षा करेगी।
नरक चतुर्दशी के साथ भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध की पौराणिक कथा भी जुड़ी हुई है। नरक चतुर्दशी मनाए जाने के संबंध में मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन प्रागज्योतिषपुर के राजा ‘नरकासुर’ नामक अधर्मी राक्षस का वध किया था और ऐसा करके उन्होंने न केवल पृथ्वीवासियों को बल्कि देवताओं को भी उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी। उसके आतंक से पृथ्वी के समस्त शूरवीर और सम्राट भी थर-थर कांपते थे। अपनी शक्ति के घमंड में चूर नरकासुर शक्ति का दुरूपयोग करते हुए स्त्रियों पर भी अत्याचार करता था। उसने 16000 मानव, देव एवं गंधर्व कन्याओं को बंदी बना रखा था। देवों और ऋषि-मुनियों के अनुरोध पर भगवान श्रीकृष्ण ने सत्यभामा के सहयोग से नरकासुर का संहार किया था और उसके बंदीगृह से 16000 कन्याओं को मुक्ति दिलाई थी। नरकासुर से मुक्ति पाने की खुशी में देवगण व पृथ्वीवासी बहुत आनंदित हुए और उन्होंने यह पर्व मनाया गया। माना जाता है कि तभी से इस पर्व को मनाए जाने की परम्परा शुरू हुई।
धनतेरस, नरक चतुर्दशी तथा दीवाली के दिन दीपक जलाए जाने के संबंध में एक मान्यता यह भी है कि इन दिनों में वामन भगवान ने अपने तीन पगों में सम्पूर्ण पृथ्वी, पाताल लोक, ब्रह्माण्ड व महादानवीर दैत्यराज बलि के शरीर को नाप लिया था और इन तीन पगों की महत्ता के कारण ही लोग यम यातना से मुक्ति पाने के उद्देश्य से तीन दिनों तक दीपक जलाते हैं तथा सुख, समृद्धि एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति हेतु मां लक्ष्मी का पूजन करते हैं। यह भी कहा जाता है कि बलि की दानवीरता से प्रभावित होकर भगवान विष्णु ने बाद में पाताल लोक का शासन बलि को ही सौंपते हुए उसे आशीर्वाद दिया था कि उसकी याद में पृथ्वीवासी लगातार तीन दिन तक हर वर्ष उनके लिए दीपदान करेंगे। नरक चतुर्दशी का संबंध स्वच्छता से भी है। इस दिन लोग अपने घरों का कूड़ा-कचरा बाहर निकालते हैं। इसके अलावा यह भी मान्यता है कि इस दिन प्रातःकाल सूर्याेदय से पूर्व तेल एवं उबटन लगाकर स्नान करने से पुण्य मिलता है।
Leave a Comment