Search

Shopping cart

Saved articles

You have not yet added any article to your bookmarks!

Browse articles
Advertisement

सामाजिक जवाबदेही से दूर होता सिनेमा

सिनेमा कला का एक दृश्य और चलित माध्यम है। सिनेमा का समाज और सामाजिक चलन दोनों पर बेहद गहरा प्रभाव रहा है। कोई भी कला भले ही उसका रूप, रंग और अवधारणा कुछ भी हो समाज से बिल्कुल विलग नहीं रह सकती। कला सामाजिक और सांस्कृतिक संवाद को स्थापित करने और जारी रखने का कार्य करती है, किसी राष्ट्र, जाति और समुदाय की सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखने में कला की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। कला व्यक्ति के अनुभवों को विस्तारित करते हुए उसकी संवेदना को नई दिशा देती है। 

सिनेमा समाज और संस्कृति से बहुत गहराई से जुड़ा होता है। वह समाज के मूल्यों, मान्यताओं और रहन-सहन को दिखाता है। इस तरह सिनेमा बहुत से व्यक्तियों के लिए स्वयं और अपने परिवेश को नए सिरे से समझने का माध्यम रहा है। किन्तु पिछले सालों में देखें तो कई अलग प्रवृत्तियाँ सिनेमा में ट्रेंड कर रही है। अब हमें यह सोचना पड़ रहा है कि सिनेमा अगर समाज का आईना है तो समाज बहुत नकारात्मक हो रहा है और अगर सिनेमा समाज को प्रभावित करने वाला एक गंभीर माध्यम है तो वह बहुत नकारात्मक आदर्श समाज के समक्ष रख रहा है। पिछले सालों में फिल्मों की प्रसिद्धि और सफलता के मानदण्डों को विश्लेषित करने से पता चलता है कि सिनेमा नकारात्मक भावनाओं और स्थितियों को लगातार भुना रहा है। वह समाज में अपवाद के रूप में उपस्थित गलत सोच और हिंसा को सामान्य की तरह पेश कर रहा है। वह व्यक्ति में नकारात्मक सपनों के बीज बो रहा है। समाज जिन तत्त्वों से दूर रहने की शिक्षा अब तक देता आया है वह उन सभी अपराधों और उनसे जुड़े व्यक्तियों के जीवन को गलेमराइज़ करके प्रस्तुत रहा है।

इस फिल्मी चकाचौंध से अर्द्ध शिक्षित जनता का बहुत बड़ा तबका प्रभावित होता है। इससे कम उम्र के अनेक लोग एक ऐसी दुनिया के सपने देख रहे हैं जिसके बारे में सोचने-समझने की सामर्थ्य उनमें नहीं होती। वे देखे हुए को ही सच मानकर इनमें से अपने आदर्श चुनते हैं और एक आभासी दुनिया में रहने लगते हैं। सिनेमा समाज में व्याप्त विसंगतियों और असमानताओं की ओर ध्यान दिलाने की बजाय एक चरम सोच को विकसित कर रहा है जहाँ हर व्यक्ति को सब कुछ ही चाहिए। और इन सब-कुछ को पाने के लिए वह हर जायज-नाजायज तरीकों का इस्तेमाल कर सकता है। सिनेमा अब सामाजिक मुद्दों और समस्याओं को प्रतिबिम्बित नहीं करता बल्कि उसका व्यावसायीकरण हो गया है। वह अब पूँजीवादी सपनों को रोपने का एक औजार भर रह गया है और फिल्मों से जुड़े सभी उद्योग विज्ञापन उद्योग बनकर रह गए हैं। वे जनमानस के सामने समाज और परिवार से कटे ऐसे व्यक्ति का खाका खींचते हैं जो कुछ भी हासिल कर सकता है और इनसे कुछ भी खरीद सकता है। किन्तु हम ध्यान नहीं देते कि पैसा कमाने और अपनी इच्छाएँ पूरी करने के बावजूद इतनी कुंठा कहाँ से आ रही है? क्यों सिनेमा के नायक गुस्से और अपराधों से भरे हैं, वे खुश क्यों नहीं हैं, उनके जीवन में दूसरे की भूमिका क्यों नहीं है? 

पारिवारिक आदर्श तो कब के लुप्त हो गए किन्तु व्यक्तिगत प्रेम में भी नैतिक मर्यादा और चाहत सर्वस्व होती थी। पिछले सालों में प्रेम की जगह प्रेम के नाम पर लोलुपता परोसी जा रही है। किसी शरीर को प्राप्त करने की लोलुपता से भरी जो भावनाएँ दिखाई जा रही है, वे किशोरों को कैसे आदर्श दिखा रही हैं? संतुलित व्यक्तित्वों की जगह विकृत मानसिकता वाले चरित्रों को ऐसे प्रस्तुत किया जा रहा है कि उनकी कमियाँ ही उनका व्यक्तित्व लगती हैं। यह कैसा दौर है कि कहीं कोई चीज संतुलित नहीं दिखती, हमारे स्वप्नों पर नशेड़ी और गुंडा मानसिकता का प्रभाव होता जा रहा है। हम उन नायकों पर कोई सवाल नहीं कर रहे हैं, बल्कि उनकी नकल कर रहे हैं। उनकी तरह आत्महत्याएं, हत्याएं और लड़कियों पर आक्रमण करने के प्रयास कर रहे हैं। उनकी तरह अवसाद के नाटक कर रहे हैं, बदले लेने की प्रवृत्ति में फंस रहे हैं। 

सिनेमा अब कला नहीं रह गई है, जिसका काम समाज और व्यक्ति को संवेदनशील मनुष्य बनाना है। सिनेमा अब पूँजीवाद का दृश्य माध्यम भर रह गया है। वह मानवीय जीवन में संबंधों को महत्त्व देने से बहुत दूर निकल आया है। सकारात्मक मानवीय भावनाएँ अब उसे टीआरपी नहीं देते। सिनेमा अब नफ़रत और हिंसा को उत्तेजित करने का माध्यम बनता जा रहा है। जो जितनी अधिक हिंसा का रस लेता है, जो नफ़रत से आनंदित होता है और बदले की भावना को जीने की एकमात्र शर्त बताकर उसे व्यावसायिक सफलता में तब्दील कर सकता है वही आज सबसे बड़ा नायक है, बड़ा फिल्म निर्माता है। दर्शक अब हिंसा का आनन्द लेने लगे हैं, क्या यह दृष्टिकोण समाज से आया है या यह संदेश के रूप में समाज में प्रसारित किया जा रहा है? सिनेमा अब कला नहीं, राजनीति और बाज़ार की अनेक तरह की नीतियों को प्रसारित करने का साधन भर रह गया है।

कला के एक माध्यम के रूप में अपनी जवाबदेही के प्रति सिनेमा लापरवाह होता जा रहा है। वीडियो माध्यम के आमजन तक पहुँचने के बाद से सिनेमा के लिए बहुत कुछ बदल गया है। मार्केटिंग के लिए बनाई गई फार्मूला फिल्में जितना मुनाफा देती हैं उतना सामाजिक और घरेलू रिश्तों को दिखाने वाली फिल्में किसी तरह नहीं कमा सकती। एक बड़े मुनाफे के लालच ने सिनेमा को कला से दूर धकेल दिया है। मारकाट, हिंसा, व्यभिचार और नफ़रत को दिखाने वाली फिल्में अधिक सफल रहती है तो हर निर्माता इसी भावना को क्यों न भुनाएगा? समाज और सामाजिक के रूप में दर्शकों की जवाबदेही भी होती है, जब तक वे स्वयं सही और गलत का निर्णय नहीं करेंगे तब तक ऊपर से इसी तरह उन पर फार्मूले थोपे जाते रहेंगे। हमारे समाज और सामाजिक ने फिल्मों को कभी भी मनोरंजन से अधिक महत्त्व नहीं दिया है। फिल्में अक्सर समय बिताने के लिए देखी जाती है। फिल्मों का जितना प्रभाव आमजन पर पड़ता रहा है उसकी तुलना में उन पर गंभीरतापूर्वक विचार का अभाव रहा है। एक कला माध्यम के रूप में सिनेमा को अधिकांश नागरिक नहीं लेते। हमें इस पर आलोचकीय दृष्टिकोण से सोचने की जरूरत है। जो माध्यम समाज और उसकी चेतना को बनाने-बिगाड़ने में अहम भूमिका निभाता हो, उसकी जवाबदेही के बारे में सोचने का समय आ गया है।


Comments (0)

Leave a Comment