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हॉर्मुज संकट के बीच भारत ने गैस से 80 फीसदी बिजली उत्पादन बढ़ाया

नई दिल्ली। एक तरफ यूएस और ईरान के बीच चल रहे युद्ध जैसे हालात की वजह से हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर फिर तनाव बढ़ गया है, जिससे दुनियाभर को गैस और बिजली की आपूर्ति की चिंता सताने लगी है। ऐसे नाजुक समय में भारत ने अपनी बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण तरीका अपनाया है, जिससे देश में बिजली का उत्पादन काफी बढ़ा है। देशभर में सितंबर की शुरुआत से बिजली की मांग तेजी से बढ़ी है, खासकर शाम के समय जब लोग काम से घर लौटते हैं और बिजली की खपत अचानक बढ़ जाती है। इसी समय सोलर पावर का उत्पादन भी कम हो जाता है, जिससे बिजली की कमी और बढ़ जाती है। इस स्थिति से निपटने के लिए बिजली कंपनियां अब गैस से चलने वाले पावर प्लांट्स का ज्यादा इस्तेमाल कर रही हैं। 1 से 9 सितंबर के बीच गैस आधारित बिजलीघरों ने रिकॉर्ड 1,088.64 मिलियन यूनिट बिजली बनाई, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह उत्पादन 603.70 मिलियन यूनिट था। इसका मतलब है कि एक साल में गैस से बिजली उत्पादन में करीब 80 फीसदी की वृद्धि हुई है।

सितंबर में भी कई इलाकों में गर्मी और उमस बनी हुई है, जिससे घरों और कारोबारों में बिजली की खपत बढ़ी है। 9 सितंबर को देश में बिजली की अधिकतम मांग 267 गीगावॉट तक पहुंच गई, इस दौरान रात में करीब 7.7 गीगावॉट बिजली की कमी दर्ज हुई। अगले दिन यानी 10 सितंबर को मांग और बढ़कर 269 गीगावॉट हो गई, हालांकि उस दिन बिजली की कमी घटकर करीब 6.1 गीगावॉट रह गई। शाम के समय यह समस्या इसलिए ज्यादा गंभीर होती है क्योंकि सूरज ढलने के साथ सोलर पावर का उत्पादन तेजी से कम हो जाता है, जबकि घरों में पंखे, एसी, लाइट और दूसरे उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ जाता है।

गैस से चलने वाले बिजलीघरों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें जरूरत के हिसाब से जल्दी चालू किया जा सकता है और इनका उत्पादन भी तेजी से बढ़ाया या घटाया जा सकता है। यही वजह है कि बिजली की अचानक बढ़ी मांग के समय ये प्लांट काफी काम आते हैं। देश में गैस आधारित बिजली उत्पादन की कुल क्षमता करीब 20.1 गीगावॉट है, और एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के मुताबिक, फिलहाल शाम के समय बिजली की कमी को संभालने के लिए करीब 4.5 से 5.5 गीगावॉट गैस आधारित बिजली का इस्तेमाल किया जा रहा है। बिजली की बढ़ती जरूरत के बीच कोयला आधारित पावर प्लांट भी लगभग अपनी पूरी क्षमता से चल रहे हैं, ऐसे में उनसे अचानक और ज्यादा बिजली पैदा करवाना आसान नहीं है। वहीं, बारिश की कमी का असर हाइड्रो पावर यानी पानी से बनने वाली बिजली पर भी पड़ा है। दक्षिण और पश्चिम भारत के कई इलाकों में जलाशयों का जलस्तर कम है, जिससे आने वाले दिनों में हाइड्रो पावर का उत्पादन और घटने की आशंका है। ऐसे में बिजली की पीक डिमांड को पूरा करने के लिए गैस पावर की भूमिका और अहम हो गई है।


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