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साझा संस्कृति और मनुष्यता के पक्षधर थे मुंशी प्रेमचंद

मुंशी प्रेमचंद की पुण्यतिथि पर विशेष

मैंने अपने जीवनकाल में हिन्दी-उर्दू उपन्यास-कथा लेखन विधा के जिस महान साहित्यकार को सबसे ज्यादा पढ़ा है, वह हैं मुंशी प्रेमचंद।  8 अक्टूबर को पुण्यतिथि पर साहित्य का यह पुरोधा बड़ा याद आ रहा है। मैंने गोदान, कर्मभूमि, रंगभूमि, गबन जैसे उपन्यासों से लेकर ईदगाह, पंच परमेश्वर, कफन, नमक का दरोगा, सद्गति तक उनकी लिखीं अनगिनत कहानियां पढ़ीं, या कहें 8 भागों वाले मानसरोवर के कथा संग्रह की कई कहानियों को कई-कई बार पढ़ा, क्योंकि उनमें मुझे विसंगतियों, विविधताओं और अनुभूति से भरे समाज का अक्स दिखता था। बच्चे, महिला, किसान, मजदूर, हिन्दू-मुसलमान और हाशिये पर जीवन जीने वाले वंचित समुदाय के लोग एक ही ज़मीन यानी सामाजिक यथार्थ में रहते दिखते थे। वह मनुष्य दिखता है, जो भूख, गरीबी, शोषण, छूआछूत, अन्याय, अपमान से जूझता है, जो यह चाहत रखता है कि उसे भी गरिमा और समानता भरी जिंदगी मिले। मैंने प्रेमचंद की कहानियों में किसी जाति या धर्म की पहचान को मनुष्य की पूरी पहचान बनते नहीं देखा। 

दरअसल ये सब लिखने का मकसद यह है कि 31 जुलाई 1880 को लमही में जन्मे धनपत राय श्रीवास्तव, जिन्हें दुनिया प्रेमचंद के नाम से जानती है, उनका साहित्य किसी एक धर्म, जाति या वर्ग की दुनिया नहीं रचता। उनके यहां भारत की पहचान उसकी विविधता और साझा जीवन से बनती है। यही भारत की समावेशी संस्कृति है, जिसमें सब धर्म-जाति पहचान, भाषा, खानपान, पहनावे के साथ रहते हैं।

संस्कृति खतरे  में है, इन दिनों बार-बार यह वाक्य सुनाई देता है या कहें कि इस दौर में कुछ ज़्यादा ही शोर है।  कभी भाषा, कभी खान-पान, कभी पहनावे, कभी धार्मिक परंपरा और कभी इतिहास के नाम पर संस्कृति बचाने के नाम पर झंडा उठाया जाता है, लेकिन इस शोर के बीच एक बुनियादी सवाल अक्सर छूट जाता है कि संस्कृति की रक्षा आखिर किससे और किसके लिए? दिलचस्प यह है कि आज से 92 वर्ष पहले प्रेमचंद ने लगभग यही सवाल उठाया था। 

8 अक्टूबर 1936 को अपने निधन से पहले 15 जनवरी 1934 को प्रकाशित अपने प्रसिद्ध लेख ‘साम्प्रदायिकता और संस्कृति’ में प्रेमचंद ने लिखा था कि “साम्प्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है।” यह वाक्य आज पढ़ें तो लगता है, जैसे प्रेमचंद जी ने अपने समय से आगे निकलकर इस दौर को देख या भांप लिया था। फर्क सिर्फ इतना है कि वह जब लिख कर रहे थे, तब अंग्रेजों का शासन था, गुलामी का दौर था, तब सांप्रदयाकिता भारत की राजनीतिक परिस्थितियों में आकार ले रही थी। अब हम आजाद हैं, हमारे पास लोकतंत्र है, संविधान है, तो सांप्रदायिकता भी नए रूप, नई तकनीक के साथ हमारे सामने है। 

प्रेमचंद को जितना पढ़ा, जाना-समझा, उसके मुताबिक उनकी चिंता किसी एक धर्म या समुदाय को लेकर नहीं थी। वे उस मानसिकता के विरोधी थे, जो अपने समुदाय की पहचान को संकट में बताकर दूसरे समुदाय को उसके सामने खड़ा करती है। उनके लिए हिन्दू साम्प्रदायिकता और मुस्लिम साम्प्रदायिकता एक-दूसरे का समाधान नहीं, बल्कि एक ही समस्या के दो रूप थे। वास्तव में यहीं से प्रेमचंद को आज पढ़ने की जरूरत पैदा होती है। इसीलिए प्रेमचंद की साम्प्रदायिकता पर लिखी बातें उनके साहित्य से अलग नहीं हैं। वे जिस समाज को कहानी में देखते थे, उसी समाज को निबंध में समझने की कोशिश करते थे।

‘साम्प्रदायिकता और संस्कृति’ में उनका सबसे महत्वपूर्ण तर्क यह था कि संस्कृति कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे किसी एक समुदाय ने बनाकर तिजोरी में बंद कर दिया हो। सदियों के साथ रहने से भाषाएं बदली हैं, खान-पान बदला है, पहनावे बदले हैं, संगीत और कलाएं एक-दूसरे से प्रभावित हुई हैं। बंगाल का हिन्दू और बंगाल का मुसलमान धार्मिक रूप से अलग हो सकता है, लेकिन उसकी भाषा और बहुत-सी सांस्कृतिक स्मृतियां साझा हैं। यही भारत की वास्तविकता है।

तो फिर वह कौन-सी ‘शुद्ध’ संस्कृति है जिसकी रक्षा के नाम पर समाज को अलग-अलग खांचों में बांटा जाता है? प्रेमचंद का सवाल यहीं खत्म नहीं होता। वे साम्प्रदायिकता के पीछे धर्म से ज्यादा सत्ता और हितों को देखते हैं। उनका मानना था कि साम्प्रदायिक राजनीति आम आदमी की वास्तविक समस्याओं को पीछे धकेल सकती है। जब गरीब के सामने रोटी, रोजगार और जीवन की सुरक्षा का सवाल हो, तब संस्कृति के नाम पर खड़े किए गए विवाद आखिर किसके काम आते हैं? यह सवाल आज भी उतना ही असुविधाजनक है। जब संस्कृति के नाम पर बहस होती है, तो क्या हम यह भी पूछते हैं कि उस बहस के बीच बेरोजगार युवा कहां है? किसान की समस्या कहां है? शिक्षा और स्वास्थ्य का सवाल कहां है? महंगाई और रोजी-रोटी की चिंता कहां है? प्रेमचंद की खासियत यही है कि वे सांप्रदायिकता को केवल धार्मिक भावना की समस्या नहीं बनाते। वे पूछते हैं कि इससे किसे राजनीतिक लाभ मिलता है और इसकी कीमत कौन चुकाता है।

यह दृष्टि आज के भारत में संविधान की कसौटी पर और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। भारतीय संविधान ने नागरिक को उसकी धार्मिक पहचान से पहले समान अधिकारों वाला नागरिक माना है। अनुच्छेद 14 समानता की बात करता है, अनुच्छेद 15 धर्म, जाति, नस्ल, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव को रोकता है और अनुच्छेद 25 अंतःकरण तथा धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। संविधान की प्रस्तावना में ‘बंधुता’ का उल्लेख इसलिए महत्वपूर्ण है कि भारत की विविधता केवल सहन करने की चीज नहीं, बल्कि समान नागरिकता के भीतर साथ रहने की संवैधानिक प्रतिबद्धता है।

वास्तव में देखें तो पाएंगे कि प्रेमचंद की समस्या धर्म से नहीं थी। समस्या उस क्षण शुरू होती थी जब धर्म मनुष्यता से बड़ा, समुदाय नागरिकता से बड़ा और पहचान व्यक्ति के अधिकार से बड़ी हो जाती है।

आज के भारत में यह फर्क समझना और भी जरूरी है। किसी धर्म की परंपरा का सम्मान करना और उस परंपरा को राज्य की शक्ति से दूसरों पर लागू करना एक बात नहीं है। अपनी संस्कृति से प्रेम करना और दूसरी संस्कृति को कमतर मानना एक बात नहीं है। धार्मिक आस्था रखना और धार्मिक पहचान को नागरिक अधिकारों की कसौटी बना देना एक बात नहीं है। यही वह महीन रेखा है जिसे प्रेमचंद ने 1934 में पहचान लिया था।

बेशक, 1934 और 2026 का भारत एक नहीं है, लेकिन कुछ सवाल समय से बड़े होते हैं। क्या संस्कृति साझा विरासत है या किसी एक समुदाय की संपत्ति? क्या धार्मिक पहचान नागरिक पहचान से ऊपर हो सकती है? क्या बहुसंख्यक की सांस्कृतिक संवेदना अल्पसंख्यक की नागरिक स्वतंत्रता की कसौटी बन सकती है? और सबसे बड़ा सवाल कि क्या संस्कृति की रक्षा के नाम पर हम उस मनुष्य को ही कमजोर तो नहीं कर रहे, जिसने संस्कृति को जन्म दिया है?

प्रेमचंद का साहित्य इन सवालों का कोई सरकारी आदेश जैसा उत्तर नहीं देता। वह उससे अधिक कठिन काम करता है, वह हमें मनुष्य के जीवन की ओर वापस ले जाता है। उनकी मृत्यु 8 अक्टूबर 1936 को हुई। वे स्वतंत्र भारत को नहीं देख सके। लेकिन उनके साहित्य में जिस भारत की छवि है, उसमें कोई एक समुदाय अकेला भारत नहीं है। वहां खेत है, बाजार है, गांव है, शहर है; हिन्दू है, मुसलमान है; गरीब है, अमीर है; शोषित है और शोषक भी। भारत उनके लिए किसी एक पहचान का नाम नहीं, बल्कि अनेक पहचानों के साथ रहने वाले मनुष्यों का समाज है।

इसलिए प्रेमचंद को उनकी पुण्यतिथि पर याद करने का अर्थ केवल उनके साहित्य की महानता दोहराना नहीं है। शायद अधिक जरूरी है कि उनके पुराने सवाल को आज के सामने फिर से रख दिया जाए। संस्कृति बचानी है, तो किस संस्कृति को? वह संस्कृति जो हमें एक-दूसरे से अलग करती है, या वह संस्कृति जो हमें एक साथ मनुष्य बनाती है? प्रेमचंद जो सोचते थे, उनके मन में जो सवाल थे, वह  उन्होंने 1934 में अभिव्यक्त कर दिया था। शायद यही उनके विचार का संदेश है कि संस्कृति के नाम पर मनुष्य को मत भूलिए।  

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