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शांति और लंबित मुद्दों के समाधान की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं भारत-चीन

नई दिल्ली। भारत और चीन के बीच लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद के बावजूद रिश्तों में धीरे-धीरे सकारात्मक बदलाव दिखाई देने लगे हैं। नई दिल्ली में आयोजित भारत-चीन सीमा मामलों पर परामर्श एवं समन्वय तंत्र की 36वीं बैठक ने साफ संकेत दिया है कि दोनों देश बातचीत के जरिए सीमा पर शांति बनाए रखने और लंबित मुद्दों के समाधान की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं। 

हालांकि भारत ने एक बार फिर साफ कर दिया कि द्विपक्षीय संबंधों में वास्तविक प्रगति तभी संभव है, जब एलएसी पर पूरी तरह शांति और स्थिरता बनी रहे। यही वजह है कि सीमा प्रबंधन, सैन्य समन्वय, सीमा निर्धारण, ट्रांस-बॉर्डर नदियों और पारंपरिक व्यापार जैसे सभी अहम मुद्दों पर भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वाेच्च प्राथमिकता के साथ मजबूती से रखा। बता दें नई दिल्ली में आयोजित बैठक में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव सुजीत घोष ने किया, जबकि चीनी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व चीन के विदेश मंत्रालय के सीमा एवं समुद्री मामलों की महानिदेशक होउ यानची ने किया। रिपोर्ट के मुताबिक दोनों देशों ने एलएसी की मौजूदा स्थिति की समीक्षा करते हुए इस बात पर सहमति जताई कि सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता ही द्विपक्षीय संबंधों के समग्र विकास की सबसे अहम आधारशिला है। दोनों पक्षों ने यह भी तय किया कि किसी भी गलतफहमी या सैन्य गलत आकलन से बचने के लिए राजनयिक और सैन्य स्तर पर स्थापित सभी संवाद तंत्रों का निरंतर इस्तेमाल किया जाएगा। स्थानीय कमांडर स्तर की बैठकों और डब्ल्यूएमसीसी जैसे मंचों को आगे भी सक्रिय बनाए रखने पर सहमति बनी।

यह बैठक ऐसे समय हुई है जब दोनों देशों के बीच सीमा पर व्यावहारिक सहयोग भी धीरे-धीरे बहाल हो रहा है। छह सालों के अंतराल के बाद उत्तराखंड के लिपुलेख और हिमाचल प्रदेश के शिपकी ला दर्रे से पारंपरिक सीमा व्यापार दोबारा शुरू होना इसी दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। चीन ने शुरुआती चरण में सीमित संख्या में व्यापारियों को अनुमति दी है, लेकिन यह पहल दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली की प्रक्रिया का प्रतीक मानी जा रही है। इससे पहले दोनों देश नाथू ला समेत तीन अधिकृत व्यापारिक मार्गों को चरणबद्ध तरीके से खोलने पर भी सहमत हो चुके हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक विदेश सचिव विक्रम मिसरी की हालिया चीन यात्रा ने भी इस कूटनीतिक प्रक्रिया को नई गति दी। बीजिंग में उन्होंने चीन के वरिष्ठ नेताओं के साथ व्यापक वार्ता कर पीएम मोदी और राष्ट्रपति शी चिनफिंग की उस साझा सोच को आगे बढ़ाने पर चर्चा की, जिसके मुताबिक भारत और चीन प्रतिस्पर्धी होने के साथ-साथ विकास के अवसरों में साझेदार भी बन सकते हैं। उल्लेखनीय है कि पिछले साल पीएम मोदी भी एससीओ शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए चीन गए थे, जहां दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संवाद को आगे बढ़ाने की दिशा में अहम चर्चा हुई थी। सामरिक दृष्टि से देखें तो भारत की नीति अब पहले से कहीं ज्यादा संतुलित और परिपक्व दिखाई देती है। एक ओर भारत सीमा पर सैन्य तैयारियों, आधारभूत ढांचे और निगरानी क्षमता को लगातार मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर वह संवाद के सभी वैध माध्यम खुले रखकर यह संदेश भी दे रहा है कि शांति उसकी प्राथमिकता है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई समझौता स्वीकार नहीं होगा। यही संतुलित रणनीति भारत को वैश्विक मंच पर एक जिम्मेदार और आत्मविश्वासी शक्ति के रूप में स्थापित करती है।


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