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बादलों में कितनी बिजली जमा है, अब धरती से चलेगा इसका पता

नई दिल्ली। आसमान में घने बादलों के बीच कितनी बिजली जमा है, इसका पता अब धरती से ही लगाया जा सकेगा। वैज्ञानिकों ने इसके लिए ऊटी स्थित ग्रेप्स-3 टेलीस्कोप की मदद से एक नई तकनीक तैयार की है। इस तकनीक की खासियत यह है कि इसके जरिए तूफानी बादलों के अंदर मौजूद विद्युत क्षेत्र का अध्ययन करने के लिए न तो विमान को बादलों के बीच भेजने की जरूरत होगी और न ही किसी रॉकेट की मदद लेनी पड़ेगी। वैज्ञानिकों ने इसके लिए अंतरिक्ष से पृथ्वी तक पहुंचने वाले सूक्ष्म कणों को आधार बनाया है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक बादलों में बिजली बनने और उसके जमा होने की प्रक्रिया को समझना मौसम विज्ञान के लिए अहम है। सामान्य तौर पर बादलों के अंदर मौजूद विद्युत क्षेत्र का प्रत्यक्ष अध्ययन करना मुश्किल होता है। इसके लिए विशेष उपकरणों को विमान या अन्य माध्यमों से बादलों के करीब ले जाना पड़ सकता है। खराब मौसम और तेज तूफान में ऐसा करना जोखिम भरा भी होता है। नई तकनीक इस चुनौती को काफी हद तक दूर कर सकती है। इस तकनीक में म्यूऑन नाम के सूक्ष्म कणों का इस्तेमाल किया गया है। 

रिपोर्ट के मुताबिक म्यूऑन अंतरिक्ष से लगातार पृथ्वी की ओर आते हैं और वायुमंडल से गुजरने के बाद जमीन तक पहुंचते हैं। जब ये कण बिजली से भरे बादलों के बीच से गुजरते हैं तो वहां मौजूद मजबूत विद्युत क्षेत्र उनके व्यवहार को प्रभावित करता है। जमीन पर पहुंचने वाले म्यूऑन की संख्या और उनके वितरण में होने वाले बदलावों का अध्ययन करके वैज्ञानिक बादलों के अंदर मौजूद विद्युत क्षेत्र की ताकत का अनुमान लगा सकते हैं। ऊटी में स्थापित ग्रेप्स-3 टेलीस्कोप इस तरह के कणों का लगातार अध्ययन करने में सक्षम है। इसके जरिए वैज्ञानिकों को पृथ्वी की सतह से ही बादलों के अंदर चल रही विद्युत गतिविधियों के बारे में अहम जानकारी मिल सकती है। 

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तरीका भविष्य में मौसम की निगरानी और बिजली गिरने जैसी घटनाओं के अध्ययन में उपयोगी साबित हो सकता है। बादलों में जमा विद्युत ऊर्जा की बेहतर जानकारी मिलने से गरज-चमक वाले तूफानों को समझने और उनके प्रभाव का आकलन करने की क्षमता भी बढ़ सकती है। इस खोज से वायुमंडलीय बिजली और अंतरिक्ष से आने वाले कणों के बीच संबंधों के अध्ययन के लिए भी नई संभावनाएं खुली हैं।

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