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जब न्याय की कुर्सी से कोई बेबाक आवाज आती है

लोकतंत्र में सबसे मुश्किल काम शायद सत्ता से असहमति जताना नहीं, बल्कि उस असहमति को सुनने की जगह बचाए रखना है। सत्ता बदलती रहती है, सरकारें आती-जाती रहती हैं, संस्थाओं के पदाधिकारी बदलते रहते हैं, लेकिन लोकतंत्र की असली परीक्षा इस बात से होती है कि सवाल पूछने वाले नागरिक के लिए कितनी जगह बची है। सवाल पूछने वाला विद्यार्थी हो, पत्रकार हो, किसान हो, प्रदर्शनकारी हो या मतदाताकृलोकतंत्र में उसकी आवाज को सुनने की गुंजाइश जितनी बड़ी होगी, लोकतंत्र उतना ही जीवंत होगा।

इसीलिए इन दिनों सर्वाेच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की बेबाक टिप्पणियां चर्चा में हैं। उनकी बातों को केवल किसी एक तात्कालिक विवाद के संदर्भ में पढ़ना शायद उनके व्यापक आशय को छोटा करना होगा। पिछले कुछ महीनों में उन्होंने अलग-अलग मंचों से असहमति, शांतिपूर्ण प्रदर्शन, सवाल पूछने की स्वतंत्रता, नागरिक स्वतंत्रता और अब मताधिकार जैसे सवालों पर जो कहा है, उसमें एक साझा सूत्र दिखाई देता हैकृसंविधान नागरिक को केवल शासन का विषय नहीं मानता, उसे लोकतंत्र का सक्रिय भागीदार मानता है।

हाल की उनकी टिप्पणी सबसे अधिक इसलिए महत्वपूर्ण है कि उन्होंने मतदाता सूची और मताधिकार के सवाल को नागरिकता की गरिमा से जोड़ दिया। हैदराबाद में राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि यदि कोई प्रक्रिया लाखों नागरिकों को मतदान के अधिकार से वंचित करती है और उन्हें अपने ही देश में बिना मताधिकार वाले नागरिकों की स्थिति में पहुंचाती है, तो ऐसी प्रक्रिया मनमानी होगी और संविधान के अनुच्छेद 14 तथा 326 की कसौटी पर सवाल खड़े करेगी। उन्होंने यह भी कहा कि मतदाता सूची में शामिल होने के अधिकार को नागरिक की पहचान से अलग नहीं किया जा सकता।

यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर राजनीतिक और कानूनी विवाद चल रहा है। लेकिन यहां सावधानी जरूरी है। न्यायमूर्ति भुइयां ने अपने भाषण में सीधे चुनाव आयोग की एसआईआर प्रक्रिया का नाम नहीं लिया था। उनके शब्दों को मौजूदा विवाद से जोड़कर देखा जा रहा है। इसलिए उनकी टिप्पणी का अर्थ निकालते समय यह अंतर बनाए रखना जरूरी है कि एक संवैधानिक सिद्धांत क्या है और किसी खास प्रशासनिक प्रक्रिया पर उसका अनुप्रयोग क्या होगा।

फिर भी उनका सवाल मामूली नहीं है। मतदाता सूची लोकतंत्र की वह कागजी बुनियाद है, जिस पर चुनाव का पूरा भवन खड़ा होता है। सूची में नाम है तो नागरिक मतदान केंद्र तक पहुंच सकता है। नाम नहीं है तो संविधान की लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसकी आवाज का एक महत्वपूर्ण रास्ता बंद हो जाता है। इसलिए मतदाता सूची का शुद्धिकरण जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी यह भी है कि किसी वास्तविक मतदाता का नाम हटाने की प्रक्रिया पारदर्शी, न्यायसंगत और सुधार का अवसर देने वाली हो।

यहीं न्यायमूर्ति भुइयां की बेबाकी एक बड़े प्रश्न की ओर ले जाती हैकृक्या लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम है या मतदाता के अधिकार की रक्षा करना भी उसकी उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है?इस प्रश्न का उत्तर संविधान में खोजा जाना चाहिए, राजनीतिक नारों में नहीं।

यह पहली बार नहीं है जब न्यायमूर्ति भुइयां ने लोकतांत्रिक असहमति के पक्ष में खुलकर बात की है। अगस्त में दिल्ली के राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में उन्होंने कहा था कि लोकतंत्र में सवाल पूछना अवज्ञा नहीं है। उनके अनुसार विश्वविद्यालय ऐसी जगह होनी चाहिए जहां विद्यार्थी स्थापित विचारों पर सवाल उठा सकें और कठिन प्रश्न पूछने से न डरें।

यह बात सुनने में सामान्य लग सकती है, लेकिन आज के समय में इसका महत्व असाधारण है। विश्वविद्यालय यदि केवल सहमति पैदा करने वाली जगह बन जाएं तो वे विश्वविद्यालय नहीं रहेंगे। शिक्षा का अर्थ केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं है। शिक्षा का अर्थ हैकृतर्क करना, प्रश्न करना, असहमति व्यक्त करना और फिर भी दूसरे के विचार के अस्तित्व को स्वीकार करना।

न्यायमूर्ति भुइयां ने यह भी कहा था कि सवाल पूछने वाले विद्यार्थियों को सजा की धमकी देना सत्ता का दुरुपयोग है। यह टिप्पणी किसी सरकार या दल की आलोचना भर नहीं है। यह उस मानसिकता पर सवाल है जो असहमति को अवज्ञा समझती है। लोकतंत्र में हर असहमति विद्रोह नहीं होती और हर सवाल व्यवस्था के खिलाफ साजिश नहीं होता।

दरअसल, लोकतंत्र का जन्म ही असहमति से हुआ है। संविधान सभा में भी हर बात पर सहमति नहीं थी। बहस हुई, मतभेद हुए, तर्क हुए और फिर संविधान बना। अगर असहमति को ही देशविरोध या व्यवस्था-विरोध मान लिया जाता तो संविधान जैसा दस्तावेज कभी बन ही नहीं सकता था। मार्च में भी न्यायमूर्ति भुइयां ने विकसित भारत की चर्चा के दौरान असहमति के लिए अधिक जगह की जरूरत बताई थी और कहा था कि विभिन्न विचारों के प्रति अधिक सहिष्णुता होनी चाहिए। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई थी कि प्रदर्शन और आंदोलनों जैसी गतिविधियों पर भी आपराधिक मामले दर्ज हो रहे हैं।

जुलाई में उन्होंने सार्वजनिक असहमति के लिए सिकुड़ती जगह, शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और जमानत की शर्तों को लेकर भी चिंता व्यक्त की थी। उन्होंने कहा था कि बहस और असहमति लोकतंत्र का सार हैं। इन तमाम टिप्पणियों को एक साथ रखकर देखें तो न्यायमूर्ति भुइयां का सवाल व्यक्ति विशेष से बड़ा दिखाई देता है। वह सवाल हैकृक्या हम ऐसा लोकतंत्र बना रहे हैं जिसमें नागरिक केवल पांच साल में एक बार वोट दे, या ऐसा लोकतंत्र जिसमें वह पांच साल तक भी सवाल पूछ सके?

यह फर्क बहुत महत्वपूर्ण है।

चुनाव लोकतंत्र का उत्सव हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र केवल चुनाव नहीं है। चुनाव के बाद नागरिक की भूमिका समाप्त नहीं हो जाती। वह सरकार की नीतियों पर सवाल करता है, संसद से जवाब मांगता है, अदालत का दरवाजा खटखटाता है, सड़क पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करता है, विश्वविद्यालय में बहस करता है, अखबार में लिखता है और सामाजिक माध्यमों पर अपनी राय रखता है। यही लोकतांत्रिक नागरिकता है। इसलिए मताधिकार को केवल मतदान केंद्र तक सीमित करके देखना भी उचित नहीं होगा। मतदाता सूची में नाम होना नागरिक के राजनीतिक अस्तित्व की सार्वजनिक स्वीकृति है। नाम हटता है तो केवल एक पंक्ति नहीं मिटती, नागरिक की लोकतांत्रिक भागीदारी प्रभावित होती है।

लेकिन इसी जगह न्यायपालिका की भूमिका भी कठिन हो जाती है। न्यायाधीशों की सार्वजनिक टिप्पणियों को लेकर भी सवाल उठ सकते हैं। हाल में पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई सहित कुछ पूर्व न्यायाधीशों ने यह आपत्ति जताई कि विचाराधीन मामले से जुड़े विषय पर किसी वर्तमान न्यायाधीश की सार्वजनिक टिप्पणी न्यायिक मर्यादा के सवाल खड़े कर सकती है। इस मतभेद को भी लोकतंत्र की बहस का हिस्सा मानना चाहिए। न्यायपालिका की स्वतंत्रता जितनी जरूरी है, उसकी संस्थागत मर्यादा भी उतनी ही जरूरी है। किसी न्यायाधीश की बेबाकी का सम्मान करते हुए यह प्रश्न पूछना भी गलत नहीं कि सार्वजनिक मंच पर कही गई बात और अदालत के निर्णय के बीच दूरी कैसे कायम रखी जाए।

लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। न्यायपालिका केवल कानून की धाराओं का यांत्रिक पाठ करने वाली संस्था नहीं है। संविधान की आत्मा नागरिक स्वतंत्रता, समानता और गरिमा में बसती है। जब कोई न्यायाधीश इन मूल्यों की याद दिलाता है तो समाज के लिए यह विचार का अवसर भी है।

न्यायमूर्ति भुइयां की बेबाकी का महत्व शायद इसी दोहरे संतुलन में हैकृएक तरफ संस्थागत मर्यादा, दूसरी तरफ संवैधानिक चेतना।

आज जरूरत किसी न्यायाधीश को नायक बनाने की नहीं है। लोकतंत्र को नायकों से ज्यादा मजबूत संस्थाओं की जरूरत होती है। जरूरत यह समझने की है कि जो सवाल उन्होंने उठाए हैं, वे केवल उनके सवाल नहीं हैं। मतदाता सूची की पारदर्शिता, असहमति की स्वतंत्रता, विश्वविद्यालयों में बहस, शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार और नागरिक स्वतंत्रताकृये सभी लोकतांत्रिक जीवन के सवाल हैं। और इन सवालों का उत्तर किसी एक संस्था से नहीं मिलेगा। चुनाव आयोग को पारदर्शी होना होगा, राजनीतिक दलों को संयम रखना होगा, प्रशासन को जवाबदेह होना होगा, न्यायपालिका को स्वतंत्र और संवेदनशील रहना होगा और मीडिया को सवाल पूछने का अपना धर्म निभाना होगा।

सबसे बढ़कर नागरिक को यह विश्वास होना चाहिए कि सवाल पूछना अपराध नहीं है।

लोकतंत्र में सत्ता से सवाल करना सत्ता का अपमान नहीं, बल्कि सत्ता को संविधान की सीमा याद दिलाना है। विद्यार्थी का प्रश्न विश्वविद्यालय का अपमान नहीं, विश्वविद्यालय की आत्मा है। पत्रकार का सवाल व्यवस्था के खिलाफ षड्यंत्र नहीं, सार्वजनिक जवाबदेही का हिस्सा है। मतदाता का नाम सूची में होना केवल चुनाव आयोग की तकनीकी उपलब्धि नहीं, लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है।

न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की बेबाकी हमें इसी बुनियादी बात पर लौटाती है।लोकतंत्र की असली ताकत यह नहीं कि वहां सब लोग एक जैसा सोचते हैं। ताकत यह है कि अलग सोचने वाले लोग भी सुरक्षित रहते हैं। वहां सवाल करने वाला नागरिक दुश्मन नहीं बनता, आलोचक देशद्रोही नहीं बनता और असहमति व्यवस्था के लिए खतरा नहीं मानी जाती। क्योंकि जिस दिन सवाल पूछना मुश्किल हो जाता है, उसी दिन लोकतंत्र का सबसे जरूरी संवाद कमजोर होने लगता है।और जिस दिन किसी नागरिक का नाम मतदाता सूची से गायब होने पर उसे यह साबित करने के लिए दर-दर भटकना पड़े कि वह लोकतंत्र का हिस्सा है, उस दिन सवाल केवल एक नाम का नहीं रह जाता। सवाल यह बन जाता है कि लोकतंत्र नागरिक को पहचानता कैसे है।

इसलिए आज जरूरत न्यायमूर्ति भुइयां की बात से सहमत या असहमत होने से पहले उस सवाल को सुनने की है जो उनकी बात के पीछे खड़ा है।

लोकतंत्र में नागरिक की आवाज कितनी सुरक्षित है?

इसका उत्तर चुनाव के दिन नहीं, हर दिन देना होगा।क्योंकि संविधान केवल सरकार चलाने की किताब नहीं है। वह नागरिक को यह भरोसा देने का दस्तावेज भी है कि उसकी स्वतंत्रता, उसकी गरिमा, उसका सवाल और उसका वोटकृकिसी भी सत्ता से बड़े हैं।और शायद न्याय की कुर्सी से आई बेबाक आवाज का सबसे बड़ा अर्थ यही हैकृलोकतंत्र में अदालतें केवल कानून नहीं सुनातीं, कभी-कभी समाज को उसके अपने संवैधानिक वादे की याद भी दिलाती हैं।


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