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एससी-एसटी एक्ट मुआवजे में गड़बड़ी की आशंक

अब पूरे उत्तर प्रदेश में होगी जांच 

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 (एससी-एसटी एक्ट) के तहत पीड़ितों को दी जाने वाली आर्थिक राहत राशि से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने न केवल पीड़ितों के अधिकारों की पुष्टि की, बल्कि योजना के संभावित दुरुपयोग को लेकर पूरे उत्तर प्रदेश में जांच के आदेश भी दिए हैं। जस्टिस संतोष राय की एकल पीठ ने झांसी के अरविंद कुमार व दो अन्य और संतोष कुमार धोहरे की आपराधिक अपीलों की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। ये दोनों मामले झांसी की विशेष न्यायाधीश (एससी-एसटी एक्ट, अत्याचार निवारण) अदालत के 23 जुलाई 2024 के फैसले के खिलाफ दाखिल किए गए थे। कोर्ट के संज्ञान में आया कि संतोष कुमार धोहरे के एक ही परिवार को विभिन्न आपराधिक मामलों में अब तक 23 लाख 36 हजार 250 रुपये से अधिक का मुआवजा दिया जा चुका है, जबकि लगभग 10 से 12 और मामले जिला स्तरीय समिति के समक्ष लंबित हैं।

अपीलकर्ताओं का कहना था कि विवेचक द्वारा प्रत्येक पीड़ित को 2 लाख रुपये की राहत राशि का प्रस्ताव भेजा गया था, जिसके तहत चार्जशीट दाखिल होने तक 75 प्रतिशत यानी 1 लाख 50 हजार रुपये मिलने चाहिए थे, लेकिन जिला समाज कल्याण अधिकारी, झांसी ने मनमाने ढंग से केवल 37.5 प्रतिशत यानी 75 हजार रुपये ही जारी किए। बार-बार प्रत्यावेदन देने के बावजूद बकाया राशि नहीं दी गई, जिसके बाद अपीलकर्ताओं ने विशेष न्यायाधीश की अदालत में आवेदन दिया था, जिसे निचली अदालत ने खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने नियम 12(7) की व्याख्या में गलती की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह नियम विशेष न्यायालय को केवल औपचारिकता निभाने वाला निकाय नहीं बनाता, बल्कि उसे यह अधिकार भी देता है कि वह जांच करे कि पीड़ित को समय पर पर्याप्त राहत मिली या नहीं, और यदि नहीं मिली तो बकाया राशि के भुगतान का आदेश दे। कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत का यह मानना गलत था कि उसे अपराध की प्रकृति तय करने या राशि बढ़ाने का अधिकार नहीं है।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से संतोष कुमार धोहरे के परिवार को मिली 23 लाख रुपये से अधिक की राहत राशि और लंबित मामलों की जानकारी दी गई। इस पर कोर्ट ने कहा कि बार-बार मामले दर्ज कराना अपने आप में दुरुपयोग साबित नहीं करता, लेकिन इतनी बड़ी संख्या और राशि को अनदेखा भी नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने इसे जांच योग्य पैटर्न बताया। हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि झांसी के जिलाधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के साथ मिलकर संतोष कुमार धोहरे और उनके परिवार द्वारा दर्ज कराए गए मामलों तथा प्राप्त राहत राशि की तीन महीने में निष्पक्ष जांच पूरी करेंगे। यदि जांच में योजना के दुरुपयोग की पुष्टि होती है, तो दोषी व्यक्तियों के साथ-साथ जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी। 

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