Shopping cart
Your cart empty!
Terms of use dolor sit amet consectetur, adipisicing elit. Recusandae provident ullam aperiam quo ad non corrupti sit vel quam repellat ipsa quod sed, repellendus adipisci, ducimus ea modi odio assumenda.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Sequi, cum esse possimus officiis amet ea voluptatibus libero! Dolorum assumenda esse, deserunt ipsum ad iusto! Praesentium error nobis tenetur at, quis nostrum facere excepturi architecto totam.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Inventore, soluta alias eaque modi ipsum sint iusto fugiat vero velit rerum.
Sequi, cum esse possimus officiis amet ea voluptatibus libero! Dolorum assumenda esse, deserunt ipsum ad iusto! Praesentium error nobis tenetur at, quis nostrum facere excepturi architecto totam.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Inventore, soluta alias eaque modi ipsum sint iusto fugiat vero velit rerum.
Dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Sequi, cum esse possimus officiis amet ea voluptatibus libero! Dolorum assumenda esse, deserunt ipsum ad iusto! Praesentium error nobis tenetur at, quis nostrum facere excepturi architecto totam.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Inventore, soluta alias eaque modi ipsum sint iusto fugiat vero velit rerum.
Sit amet consectetur adipisicing elit. Sequi, cum esse possimus officiis amet ea voluptatibus libero! Dolorum assumenda esse, deserunt ipsum ad iusto! Praesentium error nobis tenetur at, quis nostrum facere excepturi architecto totam.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Inventore, soluta alias eaque modi ipsum sint iusto fugiat vero velit rerum.
Do you agree to our terms? Sign up
(संन्यास दिवस 12 सितंबर पर विशेष)
12 सितंबर 1947। भारत आजादी की पहली सुबह के उल्लास और विभाजन की विभीषिका के बीच खड़ा था। इतिहास बाहर राजनीतिक स्वतंत्रता का नया अध्याय लिख रहा था और भीतर मनुष्य अपने अस्तित्व, भय और भविष्य के सवालों से जूझ रहा था। उसी समय ऋषिकेश में गंगा के तट पर एक युवा साधक अपने जीवन की ऐसी स्वतंत्रता की ओर बढ़ रहा था, जिसका अर्थ राजनीतिक मुक्ति से कहीं गहरा था। उस दिन स्वामी शिवानंद सरस्वती ने उन्हें दशानामी संन्यास परंपरा में दीक्षित किया और नाम दियाकृस्वामी सत्यानंद सरस्वती। गंगा की धारा के सामने लिया गया वह संकल्प आगे चलकर एक व्यक्ति की निजी आध्यात्मिक यात्रा भर नहीं रहा। उसने योग को आश्रमों और साधना-केंद्रों की सीमाओं से निकालकर सामान्य मनुष्य के जीवन तक पहुंचाने वाले एक व्यापक आंदोलन का रूप लिया।
इसलिए 12 सितंबर को केवल एक संन्यासी की दीक्षा की तारीख मानना उनके जीवन के अर्थ को छोटा कर देना होगा। यह वह दिन था, जब एक मनुष्य ने अपने जीवन को अपने लिए नहीं, एक बड़े उद्देश्य के लिए समर्पित करने का संकल्प लिया। संन्यास को हम अक्सर संसार से विरक्ति और पलायन के अर्थ में समझते हैं। लेकिन स्वामी सत्यानंद का जीवन इस सामान्य धारणा को उलट देता है। उनका संन्यास संसार छोड़ने का नहीं, अपने छोटे ‘मैं’ से निकलकर व्यापक ‘हम’ में प्रवेश करने का मार्ग बना। गुरु-सेवा से योग-प्रसार, योग-प्रसार से संस्थान-निर्माण, संस्थान-निर्माण के बाद स्वयं संस्थाओं से विरक्ति और अंततः गहन साधना से लोकसेवा तक उनकी यात्रा इसी अर्थ को विस्तार देती है।
1923 में अल्मोड़ा में जन्मे सत्यानंद के भीतर बचपन से ही आध्यात्मिक जिज्ञासा थी। जीवन के सामान्य अनुभव उनके भीतर ऐसे प्रश्न पैदा करते थे जिनका उत्तर केवल बाहरी दुनिया में नहीं था। संतों का सान्निध्य मिला और अंततः गुरु की खोज उन्हें ऋषिकेश तक ले गई। 1943 में उनकी भेंट स्वामी शिवानंद से हुई। यही भेंट उनके जीवन की दिशा बदलने वाली थी।
गुरु के आश्रम में उन्होंने जाना कि साधना केवल ध्यान में आंखें बंद कर लेने का नाम नहीं है। सेवा भी साधना है और श्रम भी। आश्रम के छोटे-बड़े कामों में स्वयं को लगाना, शारीरिक श्रम करना और गुरु की सेवा करना उनके व्यक्तित्व को भीतर से गढ़ने की प्रक्रिया थी। संन्यास की दीक्षा के बाद भी उनके सामने कोई तैयार रास्ता नहीं था। गुरु ने उन्हें योग को जनसामान्य तक ले जाने की जिम्मेदारी दी। 1956 के बाद उन्होंने परिव्राजक जीवन अपनाया और भारत में घूमते हुए योग तथा आध्यात्मिक साधनाओं का अनुभव व्यापक बनाया। परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती के मुताबिक इसी क्रम में 6 मई को मुंगेर आए।आगे चलकर मुंगेर उनकी कर्मभूमि बना। 1960 के दशक में इंटरनेशनल योग फेलोशिप मूवमेंट और फिर बिहार स्कूल ऑफ योग के माध्यम से योग को व्यवस्थित ढंग से सिखाने और प्रसारित करने का काम शुरू हुआ।
मुंगेर केवल एक आश्रम या योग-शिक्षण का केंद्र नहीं बना। वह उस प्रयोग की भूमि बना जिसमें प्राचीन योग को आधुनिक मनुष्य की आवश्यकताओं के साथ संवाद करने की कोशिश की गई। स्वामी सत्यानंद ने योग को केवल आसन तक सीमित नहीं किया। शरीर, श्वास, मन, चेतना और जीवन-पद्धतिकृइन सबको उन्होंने योग की व्यापक परिधि में रखा। योगनिद्रा, प्राणायाम, ध्यान, मुद्रा, बंध, प्रत्याहार और अनेक साधनाओं को उन्होंने ऐसी व्यवस्थित शैली में प्रस्तुत किया जिसे आधुनिक मनुष्य अपने जीवन में अपना सके।
उनकी दृष्टि में योग शरीर को मोड़ने की कला नहीं था। वह मनुष्य को स्वयं को देखने और बदलने की प्रक्रिया था। यही कारण है कि उनके यहां हठयोग के साथ राजयोग, कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग भी एक समग्र दृष्टि में दिखाई देते हैं। आज जब योग विश्वभर में जीवनशैली का हिस्सा बन चुका है, तब यह याद रखना जरूरी है कि कभी योग को रहस्य, तप और संन्यास की सीमित दुनिया से बाहर निकालना आसान नहीं था। सत्यानंद ने योग को सामान्य गृहस्थ, विद्यार्थी, कर्मचारी और आधुनिक मनुष्य के जीवन से जोड़ने का प्रयास किया। योग को जीवन से जोड़ना ही उनके कार्य की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक था।
उनके शिष्य और आध्यात्मिक उत्तराधिकारी परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने उनके इस योगदान का मूल्यांकन करते हुए कहा है
स्वामी सत्यानंद ने योग को नया जीवन, नया जन्म दिया। उन्होंने योग को पुनर्जीवित कियाकृअन्यथा वह खो जाता। इसलिए स्वामी सत्यानंद आज के पतंजलि हैं।”»
यह कथन किसी गुरु की प्रशंसा भर नहीं है। इसके भीतर आधुनिक योग के इतिहास की एक व्याख्या भी छिपी है। पतंजलि ने योग को सूत्रबद्ध किया था; सत्यानंद ने आधुनिक समय में योग की विविध परंपराओं को एक व्यावहारिक, शिक्षणीय और जीवनोपयोगी स्वरूप देने का प्रयास किया। उनकी कृति फोर चौप्टर्स ऑन फ्रीडम पतंजलि के योगसूत्र पर उनकी विस्तृत व्याख्या का उदाहरण है। लेकिन सत्यानंद के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय शायद उनके द्वारा बनाई गई संस्थाओं से जुड़ा नहीं, बल्कि उन संस्थाओं से स्वयं को अलग कर लेने के निर्णय से जुड़ा है। 1988 में जब उनका योग-अभियान व्यापक पहचान प्राप्त कर चुका था, उन्होंने संगठनात्मक जिम्मेदारियों से स्वयं को अलग किया और स्वामी निरंजनानंद सरस्वती को आगे की जिम्मेदारी सौंपी। यह निर्णय उनके संन्यास को एक नया अर्थ देता है। संस्था बनाना एक उपलब्धि हो सकती है, लेकिन अपनी बनाई संस्था से मोह छोड़ देना एक दूसरी तरह की साधना है। मनुष्य अक्सर त्याग की बात करता है, लेकिन अपनी उपलब्धियों पर अधिकार छोड़ना कठिन होता है। सत्यानंद ने यहां भी अपने जीवन को परीक्षा में रखा।
संन्यास का अर्थ केवल वस्तुओं का त्याग नहीं, उपलब्धियों पर अपने अधिकार-बोध का त्याग भी है।
मुंगेर से निकलने के बाद उनकी यात्रा रिखिया की ओर हुई। यहां उनका जीवन गहन साधना और तपस्या की ओर मुड़ा। लेकिन उनकी साधना फिर भी मनुष्य से अलग नहीं हुई। आसपास के ग्रामीण और आदिवासी समाज की जीवन-स्थितियां उनकी चिंता का हिस्सा बनीं। आवास, पेयजल, चिकित्सा, शिक्षा और आजीविका जैसे क्षेत्रों में सेवा-कार्य आगे बढ़े। यहां उनके जीवन की यात्रा एक पूरा वृत्त बनाती है। शुरुआत गुरु-सेवा से हुई थी। फिर योग के माध्यम से मनुष्य तक पहुंचने का प्रयास हुआ। और अंततः साधना फिर मनुष्य के पास लौट आई।
आत्मबोध और लोकमंगल के बीच कोई दीवार नहीं रही।
यही वह बिंदु है जहां सत्यानंद की आध्यात्मिकता आज के समय के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि आध्यात्मिकता मनुष्य के दुख से मुंह मोड़ ले तो वह केवल निजी अनुभव रह जाती है। लेकिन यदि साधना हमें दूसरे के दुख को समझने, उसके जीवन को बेहतर बनाने और उसके सम्मान की रक्षा करने की प्रेरणा दे, तब वह सामाजिक अर्थ ग्रहण करती है। आज योग के सामने सबसे बड़ा प्रश्न शायद यही है कि वह बाजार में बिकने वाली जीवनशैली बनकर रह जाएगा या मनुष्य के भीतर और समाज के बीच कोई गहरा परिवर्तन पैदा करेगा।
योग यदि केवल शरीर को स्वस्थ रखने तक सीमित है तो वह व्यायाम बन सकता है। यदि वह मन को शांत करता है तो ध्यान बन सकता है। लेकिन जब वह मनुष्य को अपने भीतर झांकने के साथ-साथ दूसरे मनुष्य के दुःख को देखने की दृष्टि देता है, तब वह करुणा और सेवा बन जाता है। परमहंस स्वामी निरंजनानंद का एक अन्य संदेश इस संदर्भ में आज विशेष अर्थ रखता है। आधुनिक जीवन में योग को बहुत जटिल बनाने के बजाय उसे रोजमर्रा के जीवन में उतारने की बात करते हुए उन्होंने सजग भोजन, मधुर वाणी, एकाग्र कर्म, विश्राम, करुणापूर्ण संबंध, साहस और जिम्मेदारी को व्यावहारिक योग से जोड़ा है। उनके अनुसार योग का लक्ष्य जीवन से भागना नहीं, जीवन को बेहतर बनाना है।
यह बात सत्यानंद की संपूर्ण जीवन-यात्रा को समझने की कुंजी भी है।
उनका संन्यास जीवन से भागने का रास्ता नहीं था। वह जीवन को अधिक गहराई से समझने का रास्ता था। उनका योग शरीर से शुरू होकर मन तक गया, मन से चेतना तक पहुंचा और चेतना से समाज तक लौटा। 1947 में गंगा के तट पर लिया गया संन्यास अंततः किसी एक व्यक्ति की मुक्ति की कथा नहीं बना। वह ‘मैं’ से ‘हम’ और साधना से सेवा तक की यात्रा बन गया। आज जब हम उनके संन्यास दिवस पर उन्हें स्मरण करते हैं, तब प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए कि उन्होंने योग के लिए क्या किया। प्रश्न यह भी होना चाहिए कि उनके जीवन ने हमें संन्यास का कौन-सा अर्थ दिया।
क्या संन्यास वस्त्र बदल लेना है?
क्या संन्यास संसार से दूर हो जाना है?
या फिर अपने भीतर के लोभ, अहंकार और अधिकार-बोध को छोड़कर अपने जीवन को व्यापक हित के लिए समर्पित करना है?
स्वामी सत्यानंद का जीवन तीसरे उत्तर की ओर संकेत करता है।
12 सितंबर 1947 को गंगा के किनारे आरंभ हुई वह यात्रा अंततः गंगा की तरह ही फैलती चली गईकृपहले गुरु की ओर, फिर योग की ओर, फिर संसार की ओर और अंततः उस मनुष्य की ओर, जिसके जीवन में साधना का अर्थ सेवा बन सकता है।
यही उनके संन्यास की सबसे बड़ी सार्थकता है।
और शायद आज के समय में उनके जीवन को याद करने का सबसे जरूरी कारण भी यही हैकृसच्चा संन्यास संसार से दूरी नहीं बनाता; वह मनुष्य के दुःख के और करीब ले जाता है।
अपने लिए कम होते जाना और समष्टि के लिए अधिक होते जान
शायद संन्यास का यही सबसे कठिन और सबसे सुंदर अर्थ है।
Leave a Comment