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लोकतंत्र में आंदोलन के मायने

मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ देशभर के कई शहरों में सड़कों पर प्रदर्शन हो रहे हैं। ये प्रदर्शन किसी एक पार्टी या विचारधारा से जुड़े हुए लोगों द्वारा आयोजित नहीं होकर, इसमें कई पार्टियां और आम जनमानस शामिल है। इंटरनेट मीडिया के जमाने में जब हर विरोध को हैशटैग और ट्रॉलिंग तक सीमित कर दिया जाता है वहाँ लोगों और विशेषकर नौजवानों का सड़कों पर उतरना किसी आश्चर्य से कम नहीं है। इतिहास गवाह है कि जो सरकार जितने लम्बे वक़्त तक गद्दी पर रहती है उसका अभिमान उसी अनुपात में बढ़ता जाता है समय के साथ वे जनता द्वारा दिए गए प्रतिनिधित्व की जिम्मेदारी भूलकर सर्वेसर्वा की भूमिका में आ जाती है। 

सत्ता को यह सोचने की जरूरत है कि सड़कों पर उतरे लोग केवल एक समस्या को लेकर नहीं उतरे हैं। यह समस्या तो तात्कालिक कारण भर है। उसके पीछे उन सवालों की एक लम्बी कतार है जिनके उतर दिए बिना उन्हें ढक देने का प्रयास किया गया था। विपक्ष एसआईआर प्रक्रिया और वोट चोरी को लेकर शुरू से ही दबाव बना रहा था लेकिन जनता तब तक इस मसले पर सक्रिय नहीं हुई जब तक नीट पेपर लीक जैसी घटनाओं ने उनमें अपने भविष्य को लेकर असुरक्षा नहीं उत्पन्न कर दी। किसान आंदोलन हो या नीट परीक्षा के खिलाफ आंदोलन, अंततः सभी विरोध संस्थाओं और संसद पर घटते भरोसे के प्रतीक हैं। जब संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगते हैं तो असंतोष को महज उपद्रव कहके टालना आसान नहीं रह जाता।

कोई भी आंदोलन एक समस्या को प्राथमिक बनाकर चलता है किन्तु उसके पीछे ऐसी कई समस्याएँ जुड़ी होती हैं जिनसे आम जनता की रोजमर्रा की जिन्दगी प्रभावित होती है। इन आंदोलनों के सिरे असुरक्षा, बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा के निजीकरण और बढ़ते चिकित्सा खर्चों से जुड़ते हैं। ये जन के भविष्य से जुड़े हैं जब भरोसा डगमगाता है तो असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है, सभी आंदोलन इस भरोसे के छीजते जाने के संकट की ही अभिव्यक्ति हैं। 

जब कोई सत्ता युवाओं को एक निश्चित फ्रेम में फिट करने की कोशिश करती है तब उसके खिलाफ उबाल आना स्वाभाविक है। जब जनता सत्ता की दिशा पहचान ले तो फिर उसे गुमराह करना आसान नहीं रह जाता। ऐसे में सत्ता को सड़क की लड़ाई के लिए तैयार रहना चाहिए। युवाओं ने जब परीक्षा की ईमानदारी को लेकर प्रश्न किए तो भले ही केन्द्रीय शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा हो लेकिन आंदोलन के तुरंत बाद ही सत्ता के प्रचार तन्त्र द्वारा आंदोलन करने वाली पीढ़ी को मूर्खता के पर्याय की तरह प्रचारित किया गया। क्या यह सब देश देख नहीं रहा था या सत्ता यह समझती है कि उनकी मंशा आजकल के नौजवान को कतई समझ नहीं आती? किसी छोटी लड़की द्वारा अपशब्द कहने पर उसे माफ़ी मांगने को बाध्य करने वाले परिस्थिति इससे पहले कभी देखने में नहीं आई। लोग तो ईश्वर को भी भरपूर गालियाँ देते हैं फिर उन्हीं लोगों के वोट द्वारा चुनी सरकार क्या ईश्वर से भी बड़ी हो गई है? एक आंदोलन जिसमें युवाओं ने लाठियाँ खाकर शिक्षामंत्री को इस्तीफा देने को विवश किया था उन्हीं मंत्री जी का इस्तीफे के बाद सत्ता पक्ष द्वारा पगड़ी पहनाकर स्वागत किया जाना कैसी नैतिकता है उसकी माफी कहाँ मिलेगी? 

मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण का मामला केवल किसी पार्टी की सत्ता आने तक सीमित नहीं है। यह इस देश के नागरिकों को उपलब्ध एकमात्र अधिकार है जिससे पूरी व्यस्क जनता जुड़ी हुई है। नागरिक अपने वोट को लेकर चिंता में हैं। मताधिकार पर आघात उनके बुनियादी अधिकारों पर आघात है। उनकी प्रतीक्षा और उम्मीदों पर आघात है। एकमात्र वोट ही है जिसके सहारे लोकतंत्र में जनता पाँच साल बाद निर्णय बदलने की स्थिति में होती है। मत पुनरीक्षण का प्रश्न शुरू से विवादास्पद ही रहा किन्तु इसे हारे हुए विपक्ष की कुंठा कहकर टाला जाता रहा। अब जब युवा छात्र संगठन आंदोलनरत हैं तब सरकार जवाब देने की बजाय उन्हें हिरासत में लेने में अपनी सुरक्षा क्यों देख रही है। अब प्रश्न केवल मतदाता सूची की अनियमितताओं का नहीं रहकर सत्ता की जवाबदेही का हो गया है। लन्दन में हुए विरोध के बाद एनआरआई के माध्यम से यह अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भी मुद्दा बन रहा है। अब आंदोलनकारी आर-पार के मूड में आ गए हैं।

लोकतंत्र सिर्फ शासन चलाने की बहुमत आधारित प्रणाली भर नहीं है, यह व्यक्ति के सम्मान, स्वतन्त्रता और गरिमा की अवधारणा पर आधारित है। संविधान में मूल अधिकारों का प्रावधान इसीलिए किया गया कि कोई भी व्यवस्था बहुमत के नाम पर किसी व्यक्ति की बुनियादी स्वतन्त्रता का अपहरण न कर सके।लोकतंत्र का अर्थ सत्ता में प्रत्येक नागरिक की भागीदारी से बनता है। जब प्रत्येक नागरिक का मताधिकार ही सुनिश्चित न हो तब यह भागीदारी किस आधार पर बनेगी? लोकतंत्र एक राजनीतिक विचारधारा मात्र न होकर एक जीवन-दर्शन है। प्रत्येक व्यक्ति द्वारा इस व्यवस्था में अपने विवेक का प्रयोग करने के लिए समान मताधिकार का प्रावधान किया गया है। जब किसी लोकतंत्र में जनता की भागीदारी का बुनियादी प्रश्न ही संशय के घेरे में हो, तो आक्रोश होना स्वाभाविक है। मतदान लोकतंत्र के प्राण होते हैं। लोकतंत्र की पूरी प्रक्रिया मत और मतदान पर ही टिकी होती है।

वोट के अधिकार से लोगों को महरूम करना उन्हें सरकार चुनने की प्रक्रिया से बाहर करना होता है। बेवजह वोट काटकर चुनी हुई सरकार, पूरी तरह लोगों के प्रतिनिधित्व पर नहीं टिकी होती। इस तरह सरकार स्वयं सवालों के घेरे में आ जाती है। ऐसे सवालों से घिरी सरकार प्रदर्शनकारियों पर जिस तरह की कार्रवाइयाँ कर रही है उससे सरकार की बौखलाहट ही अधिक प्रकट हो रही है। प्रदर्शनकारियों की रोज-रोज की गिरफ्तारी आखिर क्या साबित करती है? हजारों लोगों को गिरफ्तार करके देश को काबू में नहीं किया जा सकता। जब सत्ता एक आंदोलन को दबाने के लिए ऐसे निर्णय करने लगती है तब राष्ट्र का हर कोना जंतर-मंतर बन जाता है। 

जन आंदोलन सड़क पर तभी आते हैं जब सत्ता बहरी हो जाती है। दूसरों से प्रश्न करने की आदी रही बड़बोली सरकारें अपने से पूछें प्रश्नों को सुनना नहीं सीख पाती हैं। वह भूल जाती है कि सड़क पर आयी जनता का मुकाबला हिंसा से नहीं संवाद से ही किया जा सकता है। हिंसा तो अपने आप में ही ज़्यादती का प्रतीक है। सवाल केवल चुनाव आयुक्त के इस्तीफे का नहीं, व्यवस्था पर भरोसे का है। जो सरकारें असहमति और प्रश्न पूछने को गुनाह मानकर हर सवाल का जवाब पुलिस की लाठी, इंटरनेट बंदी और यातायात बंद करके देना चाहती हैं उनको जनता समय आने पर सही जवाब दे देती है। 

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