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मानहानि के मुकदमे में राहुल गांधी बरी, भाजपा की रणनीति पर सवाल

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर की एमपी-एमएलए अदालत से राहुल गांधी को मानहानि के मामले में राहत मिलना, भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक रणनीति पर सवाल खड़े करता है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के खिलाफ टिप्पणी से जुड़े इस मामले में जिला सहकारी बैंक के पूर्व अध्यक्ष और भाजपा नेता विजय मिश्रा ने 4 अगस्त 2018 को शिकायत दर्ज कराई थी। कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान दिए गए भाषण से जुड़े इस प्रकरण में राहुल गांधी लंबे समय से कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे। अदालत के फैसले ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है, राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ मानहानि एवं अन्य मुकदमों का इस्तेमाल, आखिर किस हद तक और कितने समय तक राजनीतिक लाभ दे सकता है? राहुल गांधी के खिलाफ देश के विभिन्न राज्यों में कई मामले दर्ज हुए। पुणे में सावरकर के परपोते द्वारा दायर मानहानि का मामला भी चर्चित है। राहुल गांधी ने दर्ज मामलों में माफी मांगने के बजाय कानूनी लड़ाई लड़ने का रास्ता चुना। गुजरात की एक अदालत से दो साल की सजा मिलने के बाद उनकी लोकसभा सदस्यता चली गई थी। उन्हें सरकारी बंगला खाली करना पड़ा था। बाद में सुप्रीम कोर्ट से सजा पर रोक मिलने के बाद उनकी सदस्यता बहाल हुई। 

इन घटनाओं ने राहुल गांधी को राजनीतिक संघर्ष के लिए नई ताकत दे दी। 2014 से 2019 के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता चरम पर थी। भाजपा ने अच्छे दिन, रोजगार, विकास और बेहतर जीवन के बड़े-बड़े वादे किए। समय के साथ इन वादों के क्रियान्वयन, बेरोजगारी, महंगाई और सामाजिक चुनौतियों को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। दूसरी ओर, राहुल गांधी ने पिछले कुछ वर्षों में संसद से लेकर सड़कों तक सरकार को चुनौती दी जा रही है। भारत जोड़ो यात्रा और जनहित के मुद्दों पर उनकी सक्रियता ने उनकी राजनीतिक छवि को पूरी तरह से बदलने का काम किया है। जिस नेता को भाजपा के समर्थक लंबे समय तक पप्पू कहकर उपहास का विषय बनाते रहे, वही अब विपक्ष के प्रमुख चेहरे के रूप में प्रधानमंत्री मोदी को सशक्त चुनौती दे रहा है। विरोधियों पर लगातार निशाना साधने की रणनीति समय के साथ उलटा असर भी डालती है। मुकदमों और राजनीतिक हमलों के बीच राहुल गांधी की सक्रियता ने उनके समर्थकों के साथ-साथ कुछ अन्य वर्गों में राहुल गांधी के प्रति सहानुभूति एवं सशक्त नेता की छवि बना दी है। 

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर देश में बहस चल रही है। इससे लगभग 40 करोड़ मतदाता प्रभावित हुए हैं. जिन्हें मतदाता सूची में नाम बनाए रखने के लिए चुनाव आयोग के दफ्तर में बार-बार चक्कर काटने पड़े हैं। मतदाता सूची की शुद्धता लोकतंत्र के लिए आवश्यक है, लेकिन प्रक्रिया में पारदर्शिता, दस्तावेजों की जांच और पात्र मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इस प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रहे सवालों ने सरकार भाजपा और चुनाव आयोग की निष्पक्षता और उनकी लोकप्रियता पर गहरा आघात किया है। युवा पीढ़ी, विशेषकर जेनरेशन जेड, अब राजनीतिक दावों को आंख मूंदकर स्वीकार करने के बजाय सवाल पूछ रही है। धार्मिक ध्रुवीकरण को पूरी तरह से नकार रही है। रोजगार, शिक्षा, महंगाई और नागरिक अधिकारों को लेकर समाज के विभिन्न वर्गों की सक्रियता सरकार और भाजपा के लिए नई चुनौती बन गई है। 

भाजपा को यह समझना होगा, हर राजनीतिक विवाद को भावनात्मक मुद्दा बनाकर या विरोधियों पर व्यक्तिगत हमले करके हमेशा चुनावी लाभ नहीं पाया जा सकता है। लोकतंत्र में जनता का विश्वास काम, जवाबदेही और विश्वसनीयता से बनता है। जिस दांव से पहलवान एक बार जीतता है, जरूरी नहीं कि हर बार उसी दांव से जीत हासिल हो। सामने वाला पहलवान भी दांव-पेच पहचानकर अपनी रणनीति बदलता है। राहुल गांधी की राजनीतिक चुनौती को केवल उपहास या मुकदमों के नजरिये से देखना भाजपा की बड़ी भूल हो सकती है। बदलते राजनीतिक माहौल में भाजपा को अपनी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना होगा। अन्यथा, जिस राजनीति से विरोधियों को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है, वही राजनीति विपक्ष को मजबूत बना रही है। 


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